
जलवायु परिवर्तन और भारत: एक गहरा संकट, प्रभाव और हमारी ज़िम्मेदारी (Climate Change & India)
जब हम कहते हैं कि आज बहुत गर्मी है या आज बारिश हो रही है, तो वह मौसम (Weather) है। लेकिन जब किसी जगह का मौसम लंबे समय (30-40 साल) के लिए अपना पुराना रूप छोड़कर पूरी तरह से एक नया, खतरनाक रूप लेने लगे, तो उसे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) कहते हैं।
ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) और ग्लोबल वार्मिंग:
हमारी पृथ्वी के चारों ओर गैसों की एक प्राकृतिक चादर है जो सूरज की गर्मी को रोककर पृथ्वी को गर्म रखती है (ताकि हम जम न जाएं)। इसे ग्रीनहाउस प्रभाव कहते हैं। लेकिन औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के बाद से इंसानों ने अंधाधुंध कोयला, पेट्रोल और गैस जलाकर वायुमंडल में इतनी ज़्यादा ‘ग्रीनहाउस गैसें’ (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड – CO2, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड) भर दी हैं कि यह चादर बहुत मोटी हो गई है। अब पृथ्वी की गर्मी अंतरिक्ष में वापस नहीं जा पा रही है और पृथ्वी एक ‘गर्म भट्टी’ में बदल रही है। इसे हम ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) कहते हैं。
वैज्ञानिकों की सर्वोच्च संस्था IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change) की चेतावनी है कि यदि पृथ्वी का तापमान औद्योगिक काल से पहले के मुकाबले 1.5°C से ज़्यादा बढ़ गया, तो इसके परिणाम विनाशकारी और अपरिवर्तनीय (Irreversible) होंगे। हम वर्तमान में लगभग 1.1°C से 1.2°C की वृद्धि पहले ही पार कर चुके हैं।
1. भारत के लिए जलवायु परिवर्तन ‘टाइम-बम’ क्यों है?
पूरी दुनिया में भारत (जर्मनवॉच की ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स के अनुसार) जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे संवेदनशील (Vulnerable) देशों की सूची में शीर्ष पर आता है। इसके मुख्य कारण हैं:
- विशाल समुद्र तट: भारत की तटरेखा (Coastline) लगभग 7,516 किलोमीटर लंबी है। भारत की एक बड़ी आबादी (मुंबई, चेन्नई, कोलकाता) समुद्र के किनारे बसती है। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से करोड़ों लोगों की जान और ज़मीन खतरे में है।
- कृषि पर भारी निर्भरता: भारत की लगभग 50% से अधिक आबादी आज भी खेती पर निर्भर है, और हमारी खेती सिंचाई के बजाय पूरी तरह से मानसून (Monsoon) के जुए पर टिकी है। थोड़ा सा भी बदलाव सीधे भुखमरी ला सकता है।
- हिमालय के ग्लेशियर: उत्तर भारत की प्यास बुझाने वाली सदाबहार नदियां (गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र) हिमालय के ग्लेशियरों (बर्फ के पहाड़ों) से निकलती हैं। गर्मी बढ़ने से ये बर्फ के भंडार तेज़ी से पिघल रहे हैं।
- घनी आबादी और गरीबी: भारत की विशाल आबादी और गरीबी के कारण, प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, सूखा, चक्रवात) से निपटने और दोबारा खड़े होने (Resilience) की आर्थिक क्षमता विकसित देशों के मुकाबले कम हो जाती है।
2. भारत पर जलवायु परिवर्तन के सीधे और भयानक प्रभाव
जलवायु परिवर्तन अब कोई ‘भविष्य’ की बात नहीं है, यह आज की कड़वी सच्चाई है। इसके प्रभाव भारत के कोने-कोने में देखे जा सकते हैं:
A. ‘वेट-बल्ब तापमान’ (Wet-Bulb Temp) और उबलते शहर
गर्मियां अब सिर्फ गर्म नहीं रहीं, वे जानलेवा हो गई हैं। उत्तर और मध्य भारत (दिल्ली, राजस्थान, यूपी) में अब तापमान 50°C को छूने लगा है।
- वेट-बल्ब तापमान: यह वह स्थिति है जब हवा में भयंकर गर्मी और अत्यधिक उमस (Humidity) दोनों एक साथ मिल जाती हैं। इस स्थिति में इंसानी शरीर का पसीना नहीं सूखता और शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता। यदि वेट-बल्ब तापमान 35°C के पार चला जाए, तो एक स्वस्थ इंसान भी छांव में बैठे-बैठे कुछ घंटों में दम तोड़ सकता है। भारत के तटीय शहर इस खतरे के मुहाने पर हैं।
- अर्बन हीट आइलैंड (Urban Heat Island): शहर ‘कंक्रीट के जंगल’ बन गए हैं। कांच की इमारतों, डामर की सड़कों और एसी (AC) की गर्म हवाओं के कारण शहर अपने आस-पास के ग्रामीण इलाकों से 3 से 4 डिग्री ज़्यादा गर्म रहते हैं।
B. मानसून का ‘पागलपन’ (Erratic Monsoon)
पहले मानसून एक भरोसेमंद दोस्त की तरह था, लेकिन अब यह एक सनकी मेहमान बन गया है।
- बाढ़ और सूखा एक साथ: अब बारिश कई दिनों तक आराम से नहीं होती। इसके बजाय, कुछ ही घंटों में पूरे महीने की बारिश हो जाती है (Cloudbursts)। इससे शहरों (जैसे मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई) में अचानक अर्बन फ्लड (Urban Flooding) आ जाता है। वहीं दूसरी ओर, बुंदेलखंड और मराठवाड़ा जैसे इलाके बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं।
- मानसून के आने और जाने का समय पूरी तरह से बिगड़ चुका है, जिससे किसानों की बुवाई का पूरा चक्र (Sowing cycle) बर्बाद हो गया है।
C. पिघलते ग्लेशियर और नदियों का संकट
हिमालय को ‘दुनिया का तीसरा ध्रुव’ (Third Pole) कहा जाता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे ग्लेशियर तेज़ी से सिकुड़ रहे हैं।
- शुरुआत में बर्फ पिघलने से नदियों में अचानक बहुत ज़्यादा पानी आएगा, जिससे भयंकर बाढ़ आएगी (जैसे 2013 की केदारनाथ त्रासदी या सिक्किम की ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड – GLOF’)।
- लेकिन कुछ दशकों बाद, जब ग्लेशियर खत्म होने लगेंगे, तो हमारी सदाबहार (Perennial) नदियां सूख जाएंगी। इससे पूरे उत्तर भारत में भयानक जल संकट (Water Crisis) पैदा हो जाएगा।
D. डूबते तटीय शहर और उग्र चक्रवात (Cyclones)
समुद्र का पानी गर्म होने से वह फैलता है और ग्लेशियरों का पानी भी समुद्र में गिर रहा है। इससे समुद्र का जलस्तर (Sea Level) बढ़ रहा है।
- भारत के सुंदरबन डेल्टा (पश्चिम बंगाल) के कई द्वीप (जैसे घोरामारा) पहले ही पानी में समा चुके हैं। असम का माजुली द्वीप कट रहा है। मुंबई और कोच्चि जैसे तटीय शहरों के कुछ दशकों में डूबने का भारी खतरा है।
- समुद्र गर्म होने से अरब सागर (जो पहले शांत रहता था) और बंगाल की खाड़ी में उठने वाले चक्रवाती तूफानों (Cyclones) की ताक़त और संख्या बहुत बढ़ गई है (जैसे फानी, अम्फान, ताउते और बिपरजॉय)।
E. स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था (Health & Economy) पर प्रहार
- खाद्य सुरक्षा: मार्च के महीने में अचानक तापमान बढ़ने से गेहूं की फसल पकने से पहले ही सूखने लगी है (इसे ‘Terminal Heat’ कहते हैं)। कृषि उत्पादन गिरने से महंगाई बढ़ेगी और खाद्य सुरक्षा को खतरा होगा। इसके अलावा CO2 बढ़ने से फसलों में प्रोटीन और ज़रुरी पोषक तत्वों (Nutrition) की भारी कमी आ रही है।
- नई बीमारियां: तापमान और उमस बढ़ने से मच्छरों को पनपने का नया माहौल मिल रहा है। डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियां अब उन पहाड़ी इलाकों (हिमाचल, उत्तराखंड) में भी पहुँच रही हैं, जहाँ पहले कभी नहीं देखी गईं।
- GDP का नुकसान: विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भयंकर गर्मी के कारण मज़दूर काम नहीं कर पा रहे हैं (Labour productivity loss), जिससे भारत की GDP को अरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है।
F. जैव विविधता (Biodiversity) और प्राकृतिक धरोहरों का विनाश
इंसानों के साथ-साथ बेजुबान जानवर और पेड़-पौधे भी इस विनाश का शिकार हो रहे हैं:
- प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching): समुद्र के गर्म होने से लक्षद्वीप और अंडमान में मौजूद खूबसूरत मूंगे की चट्टानें (Coral Reefs) मर रही हैं और सफेद पड़ रही हैं। इससे समुद्री जीवों का पूरा ईकोसिस्टम (Ecosystem) खत्म हो रहा है।
- जंगलों की आग (Forest Fires): अत्यधिक गर्मी और सूखे के कारण उत्तराखंड और ओडिशा के जंगलों में भयंकर आग लगने की घटनाएं बढ़ गई हैं, जिससे लाखों वन्यजीव मारे जा रहे हैं।
G. ‘जलवायु शरणार्थी’ (Climate Refugees) का नया संकट
जब खेती बर्बाद हो जाती है या समुद्र का पानी गांवों में घुस जाता है, तो लोगों को मजबूरन अपना घर छोड़कर शहरों की तरफ पलायन करना पड़ता है। ऐसे लोगों को ‘जलवायु शरणार्थी’ (Climate Refugees) कहा जाता है। इससे शहरों (जैसे मुंबई, दिल्ली, कोलकाता) पर जनसंख्या का भारी दबाव पड़ रहा है और झुग्गी-झोपड़ियों (Slums) की समस्या विकराल हो रही है।
H. भारत के विभिन्न क्षेत्रों पर विशिष्ट प्रभाव (Regional Impacts)
भारत एक विशाल और विविध देश है, इसलिए जलवायु परिवर्तन का असर हर राज्य में अलग-अलग हो रहा है:
- हिमालयी क्षेत्र (Himalayas): हिमाचल प्रदेश और कश्मीर में सेब (Apple) की खेती ऊंचे और ठंडे इलाकों की तरफ खिसक रही है। प्राकृतिक पानी के चश्मे (Natural Springs) सूख रहे हैं, जिससे पहाड़ी गांवों में पीने के पानी का संकट आ गया है।
- तटीय क्षेत्र (Coastal Areas): गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के तटीय गांवों में समुद्र का खारा पानी (Saltwater intrusion) खेतों और मीठे पानी के कुओं में घुस रहा है, जिससे ज़मीन बंजर हो रही है और पीने का पानी ज़हरीला हो रहा है।
- मध्य और प्रायद्वीपीय भारत: विदर्भ (महाराष्ट्र), तेलंगाना और बुंदेलखंड में लगातार कई सालों तक सूखा पड़ने से मरुस्थलीकरण (Desertification) बढ़ रहा है, जिससे किसानों की आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं।
- पूर्वोत्तर भारत (North-East): असम के मशहूर चाय बागानों (Tea Gardens) में बारिश का पैटर्न बदलने और तापमान बढ़ने से चाय की गुणवत्ता (Flavor) और उत्पादन दोनों तेज़ी से गिर रहे हैं।
I. ऊर्जा और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) पर खतरा
भीषण गर्मी के कारण गर्मियों में बिजली की मांग (AC, Cooler) अचानक इतनी बढ़ जाती है कि पावर ग्रिड फेल होने लगते हैं (Blackouts)। वहीं, अचानक आने वाली फ्लैश फ्लड (Flash Floods) से बड़े-बड़े पुल, सड़कें और रेलवे लाइनें बह जाती हैं, जिससे हर साल देश को हज़ारों करोड़ रुपये का नुकसान होता है। पनबिजली (Hydro-power) प्रोजेक्ट्स भी नदियों में पानी कम होने से खतरे में आ गए हैं।
3. वैश्विक राजनीति और ‘जलवायु न्याय’ (Climate Justice & CBDR)
दुनिया में जलवायु परिवर्तन को लेकर जो राजनीति चल रही है, उसमें भारत का स्टैंड बिल्कुल साफ और नैतिक है।
भारत कहता है कि आज वायुमंडल में जो 80% अतिरिक्त कार्बन जमा है, वह अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों (Developed Nations) ने पिछले 200 सालों में अपने औद्योगीकरण (Industrialization) के दौरान फैलाया है। आज जब भारत जैसे विकासशील देशों की विकास करने की बारी आई है, तो उन पर कार्बन कम करने का दबाव डाला जा रहा है।
इसीलिए भारत ‘जलवायु न्याय’ (Climate Justice) और CBDR (Common But Differentiated Responsibilities – समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियां) की मांग करता है। इसका अर्थ है कि पृथ्वी को बचाना सबकी ज़िम्मेदारी है, लेकिन जिसने ज़्यादा कचरा फैलाया है (विकसित देश), उसे ज़्यादा पैसे (Climate Finance) और मुफ्त तकनीक (Technology Transfer) विकासशील देशों को देनी चाहिए।
अंतर्राष्ट्रीय संधियां और भारत का सफर (Global Treaties)
पृथ्वी को बचाने के लिए दुनिया भर के देशों ने कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक समझौते किए हैं, जिनमें भारत ने हमेशा एक सकारात्मक और ज़िम्मेदार नेता (Leader) की भूमिका निभाई है:
- रियो पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit 1992): यहीं से जलवायु परिवर्तन से लड़ने की आधिकारिक शुरुआत हुई और UNFCCC (United Nations Framework Convention on Climate Change) का जन्म हुआ। भारत इसका एक संस्थापक सदस्य है।
- क्योोटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol 1997): यह पहली ऐसी संधि थी जिसने विकसित देशों पर कार्बन कम करने का कानूनी दबाव डाला। भारत जैसे विकासशील देशों को इसमें प्रारंभिक छूट दी गई थी ताकि वे अपनी गरीबी दूर कर सकें और बुनियादी विकास कर सकें।
- पेरिस समझौता (Paris Agreement 2015): यह इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण जलवायु समझौता है। इसमें दुनिया ने लक्ष्य रखा कि पृथ्वी के तापमान को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5°C (या अधिकतम 2°C) से ज़्यादा नहीं बढ़ने देना है। इसी समझौते के तहत भारत ने स्वेच्छा से अपने राष्ट्रीय लक्ष्य (NDCs – Nationally Determined Contributions) घोषित किए।
4. भारत क्या कर रहा है? (India’s Master Solutions)
भारत ऐतिहासिक रूप से ग्लोबल वार्मिंग के लिए ज़िम्मेदार नहीं है, फिर भी एक ज़िम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में भारत ने कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं:
A. ‘पंचामृत’ का वादा (Panchamrit Targets – COP26)
प्रधानमंत्री ने 2021 में ग्लासगो (COP26) जलवायु सम्मेलन में भारत की तरफ से 5 बड़े वादे (पंचामृत) किए थे:
- 2030 तक भारत अपनी गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता (Non-fossil energy capacity) को 500 GW तक ले जाएगा।
- 2030 तक भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का 50% नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy – सौर, पवन) से पूरा करेगा।
- 2030 तक कुल प्रोजेक्टेड कार्बन उत्सर्जन में 1 अरब टन की कमी करेगा।
- 2030 तक अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता (Carbon Intensity) को 45% तक कम करेगा।
- सबसे बड़ा वादा: साल 2070 तक भारत ‘नेट ज़ीरो’ (Net Zero) का लक्ष्य हासिल करेगा (यानी जितना कार्बन हम हवा में छोड़ेंगे, उतना ही जंगल और तकनीक लगाकर वापस सोख लेंगे)।
B. अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance – ISA)
भारत और फ्रांस ने मिलकर 2015 में इस शानदार गठबंधन की शुरुआत की थी। इसका मुख्यालय गुरुग्राम (हरियाणा) में है। इसका उद्देश्य पूरी दुनिया में (खासकर कर्क और मकर रेखा के बीच वाले धूप वाले देशों में) सौर ऊर्जा (Solar Energy) को बढ़ावा देना है। हमारा नारा है: “One Sun, One World, One Grid”。
C. आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन (CDRI)
भारत ने 2019 में CDRI (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure) की शुरुआत की। इसका मकसद यह है कि हम सड़कें, पुल, बिजली ग्रिड और एयरपोर्ट ऐसे बनाएं जो भयंकर तूफानों और बाढ़ (Climate Disasters) को झेल सकें और टूटें नहीं। आज दुनिया के दर्जनों देश इस पहल में भारत के साथ जुड़ चुके हैं।
D. इथेनॉल ब्लेंडिंग, ग्रीन हाइड्रोजन और NAPCC
- ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission): भारत पानी (H2O) से हाइड्रोजन निकालकर उसे एक स्वच्छ ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने का दुनिया का सबसे बड़ा हब बनना चाहता है, जिससे धुएं की जगह सिर्फ पानी की भाप निकलेगी।
- इथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending): पेट्रोल में गन्ने या सड़े हुए अनाज से बना 20% इथेनॉल (E20) मिलाने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे पेट्रोल का आयात भी घटेगा और प्रदूषण भी कम होगा।
- NAPCC (राष्ट्रीय जलवायु कार्य योजना): इसके तहत भारत सरकार ने ‘राष्ट्रीय सौर मिशन’, ‘ग्रीन इंडिया मिशन’ और ‘राष्ट्रीय जल मिशन’ जैसे 8 बड़े राष्ट्रीय मिशन चला रखे हैं।
- पीएम-कुसुम (PM-KUSUM): इसके तहत किसानों को डीजल पंप की जगह ‘सोलर पंप’ दिए जा रहे हैं, ताकि खेती में भी प्रदूषण शून्य हो जाए।
E. राज्य स्तरीय जलवायु कार्य योजनाएं (SAPCC)
चूँकि भारत एक विशाल और संघीय (Federal) देश है, इसलिए केवल दिल्ली में बैठकर नीतियां बनाने से काम नहीं चलेगा। भारत के सभी 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपनी खुद की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार ‘राज्य स्तरीय जलवायु कार्य योजना’ (State Action Plan on Climate Change) बनाई है। उदाहरण के लिए:
- गुजरात ने देश में सबसे पहले अपना अलग ‘क्लाइमेट चेंज विभाग’ बनाया।
- सिक्किम देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जो पूरी तरह से जैविक खेती (Organic Farming) पर शिफ्ट हो गया है, ताकि मिट्टी का कार्बन सुरक्षित रहे और रसायनों का प्रयोग बंद हो।
- ओडिशा ने चक्रवातों से निपटने के लिए दुनिया का सबसे बेहतरीन अर्ली वार्निंग सिस्टम (Early Warning System) और शेल्टर होम नेटवर्क तैयार किया है।
F. 2050 और 2100 का परिदृश्य (Future Scenarios: A Warning)
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि हमने ‘बिजनेस एज़ यूज़ुअल’ (यानी जैसे प्रदूषण चल रहा है, वैसे ही चलने दिया) का रवैया नहीं छोड़ा, तो भविष्य बहुत डरावना होगा:
- 2050 तक: भारत की लगभग 40% आबादी को पीने के पानी के गंभीर संकट का सामना करना पड़ेगा। गर्मी के कारण बाहर खुले में काम करना (जैसे कंस्ट्रक्शन, खेती) दिन के समय लगभग असंभव हो जाएगा।
- 2100 तक: अगर ग्लोबल वार्मिंग इसी तरह बढ़ती रही तो समुद्र का जलस्तर लगभग 1 मीटर तक बढ़ सकता है, जिससे भारत के 50 मिलियन (5 करोड़) से ज़्यादा तटीय लोग हमेशा के लिए अपने घर खो देंगे और ‘क्लाइमेट रिफ्यूजी’ बन जाएंगे।
5. हम आम नागरिक क्या कर सकते हैं? (Mission LiFE)
भारत सरकार ने एक बहुत ही खूबसूरत अभियान शुरू किया है—‘मिशन लाइफ़’ (Mission LiFE)। इसका मतलब है पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाना। सरकार अकेले दुनिया को नहीं बचा सकती, हम सभी को अपना योगदान देना होगा:
- बिजली बचाएं: भारत में आज भी 60% से ज़्यादा बिजली कोयला जलाकर बनती है। कमरे से बाहर निकलते समय लाइट और एसी बंद करें।
- ‘Reduce, Reuse, Recycle’: सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करें। पुरानी चीज़ों को दोबारा इस्तेमाल करें।
- सार्वजनिक परिवहन (Public Transport): पेट्रोल-डीज़ल बचाने के लिए बस, मेट्रो या कार-पूलिंग का इस्तेमाल करें। हो सके तो छोटी दूरियों के लिए साइकिल चलाएं।
- पेड़ लगाएं और बचाएं: पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने वाली सबसे बेहतरीन और प्राकृतिक मशीनें हैं। सिर्फ पेड़ लगाएं ही नहीं, बल्कि उन्हें बड़ा होने तक पालें।
- पानी की बचत और अन्न का आदर: पानी की एक-एक बूंद कीमती है। भोजन बर्बाद न करें, क्योंकि भोजन उगाने में मीथेन (ग्रीनहाउस गैस) निकलती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिसका इलाज किसी एक जादुई गोली से हो जाए। यह मानव जाति के इतिहास की सबसे बड़ी और जटिल चुनौती है। हमने सदियों तक आर्थिक विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का निर्मम दोहन (Exploitation) किया है, और अब प्रकृति ने उसका भारी बिल हमारे सामने रख दिया है।
भारत के लिए यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि हमें अपनी करोड़ों की आबादी को गरीबी से बाहर भी निकालना है, उद्योग भी लगाने हैं, और साथ ही पर्यावरण को भी बचाना है। लेकिन भारत अपनी प्राचीन संस्कृति से ही “प्रकृति की पूजा” करने वाला देश रहा है। हमारे वेदों में नदियों को माता, पहाड़ों को पिता और पेड़ों को देवता माना गया है।
अब समय आ गया है कि हम अपनी उस प्राचीन सोच को फिर से ज़िंदा करें। हमें यह याद रखना होगा कि “हमारे पास कोई ‘प्लैनेट बी’ (Planet B) नहीं है।” अगर हमने आज व्यक्तिगत, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर सख्त कदम नहीं उठाए, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा झुलसता हुआ रेगिस्तान सौंपकर जाएंगे, जहाँ सांस लेना भी मुश्किल होगा।
– महात्मा गांधी




