
राष्ट्रीय आंदोलन का उदय: उदारवादी चरण (1885-1905)
1. भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के कारण
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (Second half) में भारत में एक अभूतपूर्व राजनीतिक चेतना का जन्म हुआ। अचानक से पूरे देश में “हम एक राष्ट्र हैं” की भावना जागृत हुई। इस महान राष्ट्रवाद के उदय के पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण थे:
(i) भारत का राजनीतिक और प्रशासनिक एकीकरण
अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ (व्यापार और नियंत्रण) के लिए पूरे भारत को एक ही शासन व्यवस्था, एक ही कानून प्रणाली (IPC/CRPC), और एक जैसी न्याय व्यवस्था के अधीन कर दिया। रेलवे, टेलीग्राफ (1853) और डाक सेवाओं के विकास ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक के लोगों को आपस में जोड़ दिया। जो रेलवे अंग्रेजों ने भारत को लूटने के लिए बनाई थी, उसी रेलवे ने भारतीय नेताओं को पूरे देश में घूमकर राष्ट्रवाद फैलाने का साधन दे दिया।
(ii) पाश्चात्य शिक्षा और चिंतन (Western Education)
लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति (1835) के बाद भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार हुआ। जब भारतीय युवाओं ने अंग्रेजी सीखी, तो उन्होंने रूसो, वॉल्टेयर, जॉन स्टुअर्ट मिल, और मैज़िनी जैसे महान पश्चिमी विचारकों को पढ़ा। उन्हें स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र और मानवाधिकारों (Human Rights) का असली अर्थ समझ में आया। इसी अंग्रेजी शिक्षित मध्यम वर्ग (Elites) ने राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया।
(iii) प्रेस और समाचार पत्रों की भूमिका
प्रेस ने राष्ट्रवाद के बीज बोने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। द हिंदू, द बंगाली, अमृत बाज़ार पत्रिका, केसरी और मराठा जैसे अखबारों ने ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी नीतियों की धज्जियां उड़ा दीं। प्रेस के माध्यम से देश के एक कोने का दर्द दूसरे कोने तक पहुँचने लगा।
(iv) भारत के गौरवशाली अतीत की खोज
अंग्रेज भारतीयों को यह कहकर चिढ़ाते थे कि “तुम असभ्य और जाहिल हो, हम तुम्हें सभ्य बनाने आए हैं (White Man’s Burden)।” लेकिन सर विलियम जोंस, मैक्स मूलर, और अलेक्जेंडर कनिंघम जैसे विदेशी विद्वानों और स्वामी विवेकानंद जैसे भारतीय संतों ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अनुवाद किया और दुनिया को बताया कि जब यूरोप जंगलों में घूमता था, तब भारत में महान सिंधु घाटी सभ्यता और वेद लिखे जा चुके थे। इससे भारतीयों में आत्म-सम्मान और आत्मविश्वास का भारी संचार हुआ।
(v) लॉर्ड लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियां (Reactionary Policies)
लॉर्ड लिटन (1876-1880) के घमंड और क्रूर फैसलों ने भारतीयों के गुस्से को ज्वालामुखी में बदल दिया:
- ICS आयु सीमा कम करना (1876): भारतीयों को सिविल सेवा (ICS) से दूर रखने के लिए उसने अधिकतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी।
- दिल्ली दरबार (1877): जब पूरा दक्षिण भारत भयंकर अकाल (Famine) से मर रहा था, तब लिटन ने महारानी विक्टोरिया को ‘कैसर-ए-हिंद’ की उपाधि देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करके दिल्ली दरबार का आयोजन किया। (नीरो बंसी बजा रहा था, जब रोम जल रहा था)।
- वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878): देसी भाषाओं के अखबारों का गला घोंटने के लिए यह ‘गैगिंग एक्ट’ (Gagging Act) लाया गया।
- आर्म्स एक्ट (1878): भारतीयों के लिए हथियार रखना गैर-कानूनी कर दिया गया, जबकि अंग्रेजों पर यह लागू नहीं था।
(vi) इल्बर्ट बिल विवाद (1883) – नस्लवाद का नंगा नाच
लॉर्ड रिपन के समय एक कानून लाया गया—‘इल्बर्ट बिल’। इसके तहत भारतीय जजों को भी यूरोपीय (अंग्रेज) अपराधियों के मुकदमे सुनने का अधिकार दिया गया। लेकिन भारत में रह रहे अंग्रेजों ने इसका भयंकर विरोध किया (इसे श्वेत विद्रोह / White Mutiny कहते हैं)। अंततः अंग्रेजों के दबाव में बिल को वापस लेना पड़ा। इस घटना ने भारतीयों की आँखें खोल दीं कि अंग्रेज उन्हें कभी अपने बराबर का इंसान नहीं मानेंगे और बिना संगठन बनाए कोई हक नहीं मिलेगा।
2. कांग्रेस से पूर्व की राजनीतिक संस्थाएं
1885 में कांग्रेस की स्थापना अचानक नहीं हुई थी, इससे पहले ही क्षेत्रीय स्तर पर कई संस्थाएं काम कर रही थीं:
- बंगाल में: लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838 – भारत की पहली राजनीतिक संस्था), ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (1851), इंडिया लीग (1875 – शिशिर कुमार घोष), इंडियन एसोसिएशन ऑफ कलकत्ता (1876 – सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस द्वारा स्थापित, यह कांग्रेस की पूर्वगामी संस्था थी)।
- बंबई में: पूना सार्वजनिक सभा (1870 – एम.जी. रानाडे), बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (1885 – फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयबजी, के.टी. तैलंग)।
- मद्रास में: मद्रास नेटिव एसोसिएशन (1852), मद्रास महाजन सभा (1884 – पी. आनंदचार्लू और वीरराघवाचारी)।
- विदेश में: ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (1866 – लंदन में दादाभाई नौरोजी द्वारा स्थापित)।
3. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885)
अलग-अलग क्षेत्रों में बिखरी हुई राजनीतिक ऊर्जा को एक अखिल भारतीय (All-India) मंच देने की ज़रूरत थी। यह काम एक रिटायर्ड अंग्रेज सिविल सेवक एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A.O. Hume) ने किया।
प्रथम अधिवेशन (First Session): कांग्रेस का पहला अधिवेशन पुणे में होना था, लेकिन वहां प्लेग/कॉलरा फैलने के कारण इसे बंबई स्थानांतरित कर दिया गया। 28 दिसंबर 1885 को बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में इसका पहला अधिवेशन हुआ।
- अध्यक्ष (President): व्योमेश चंद्र बनर्जी (W.C. Bonnerjee)।
- संस्थापक/महासचिव: ए.ओ. ह्यूम।
- कुल प्रतिनिधि: पूरे भारत से 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
- उस समय का वायसराय: लॉर्ड डफरिन (Lord Dufferin)।
2. तड़ित चालक का सिद्धांत (Lightning Conductor Theory): गोपाल कृष्ण गोखले (और बिपिन चंद्र जैसे इतिहासकारों) का मानना है कि शुरुआती भारतीय नेताओं ने जानबूझकर ह्यूम (एक अंग्रेज) का इस्तेमाल एक ‘तड़ित चालक’ (Lightning Conductor) के रूप में किया, ताकि ब्रिटिश सरकार शुरुआत में ही इस संस्था को कुचल न दे।
- 1885 (बंबई): व्योमेश चंद्र बनर्जी (प्रथम अध्यक्ष)
- 1886 (कलकत्ता): दादाभाई नौरोजी (प्रथम पारसी अध्यक्ष)
- 1887 (मद्रास): बदरुद्दीन तैयबजी (प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष)
- 1888 (इलाहाबाद): जॉर्ज यूल (प्रथम अंग्रेज़ अध्यक्ष)
- 1896 (कलकत्ता): रहीमतुल्ला सयानी (इसी अधिवेशन में पहली बार ‘वंदे मातरम’ गाया गया था)
4. उदारवादी चरण (1885-1905) : विचारधारा और कार्यप्रणाली
कांग्रेस के शुरुआती 20 वर्षों पर जिन नेताओं का दबदबा रहा, उन्हें ‘उदारवादी’ (Moderates) कहा गया। इनमें दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, दिनशॉ वाचा, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, डब्ल्यू.सी. बनर्जी, और गोपाल कृष्ण गोखले प्रमुख थे। इनकी सोच और काम करने का तरीका निम्नलिखित था:
- ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास: उदारवादियों को लगता था कि अंग्रेज स्वभाव से न्यायप्रिय हैं। भारतीयों की गरीबी और दुर्दशा का कारण भारत में बैठा ब्रिटिश प्रशासन है, न कि लंदन की ब्रिटिश सरकार। अगर महारानी को भारत की असली स्थिति पता चल जाए, तो वे सब ठीक कर देंगी।
- संवैधानिक तरीका (Constitutional Agitation): वे कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहते थे। वे हिंसा या जन-आंदोलन के सख्त खिलाफ थे।
- 3P की नीति (Prayer, Petition, Protest): उनका काम करने का तरीका था—प्रार्थना पत्र देना, याचिकाएं सौंपना और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध (भाषण और लेख) दर्ज कराना। (गर्म दल वालों ने इसे ‘राजनीतिक भिक्षावृत्ति’ / Political Mendicancy कहा था)।
- सीमित लक्ष्य: ये शुरुआत में पूर्ण आज़ादी (स्वतंत्रता) नहीं मांगते थे, बल्कि प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी और संवैधानिक सुधार चाहते थे।
5. उदारवादियों का ऐतिहासिक योगदान और सफलताएं
भले ही गर्म दल वालों ने इनकी आलोचना की हो, लेकिन इन उदारवादियों ने जो नींव रखी, उसी पर आगे चलकर स्वतंत्रता की इमारत खड़ी हुई। इनके प्रमुख योगदान इस प्रकार हैं:
(A) ब्रिटिश साम्राज्यवाद की ‘आर्थिक समीक्षा’ (Economic Critique)
यह उदारवादियों की सबसे महान और ऐतिहासिक सफलता थी। दादाभाई नौरोजी (The Grand Old Man of India), आर.सी. दत्त (रमेश चंद्र दत्त), और दिनशॉ वाचा ने अपनी किताबों और लेखों से साबित कर दिया कि भारत की भयंकर गरीबी किस्मत का खेल नहीं, बल्कि अंग्रेजों की सोची-समझी लूट का नतीजा है।
दादाभाई नौरोजी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Poverty and Un-British Rule in India” (1901) में ‘धन के निष्कासन का सिद्धांत’ (Drain of Wealth Theory) दिया। उन्होंने जनता को समझाया कि कैसे भारत का पैसा कर (Tax) के रूप में वसूला जाता है, और फिर उसी पैसे से भारत का कच्चा माल खरीदकर लंदन भेज दिया जाता है। आर.सी. दत्त ने भी अपनी पुस्तक ‘Economic History of India’ में इसका विस्तार से वर्णन किया। इस ‘आर्थिक राष्ट्रवाद’ ने अंग्रेजों के इस झूठे दावे को नंगा कर दिया कि वे भारत का विकास कर रहे हैं।
उदारवादियों के भारी दबाव के कारण ही ब्रिटिश सरकार को 1895 में भारतीय व्यय की जांच के लिए वेलबी आयोग (Welby Commission) का गठन करना पड़ा, जिसमें गोखले जी ने भारत की ओर से गवाही दी थी।
(B) व्यवस्थापिका सभाओं (Councils) में सुधार
उदारवादियों ने नारा दिया—“प्रतिनिधित्व नहीं, तो कर नहीं” (No Taxation without Representation)। उनके लगातार दबाव के कारण ही ब्रिटिश सरकार को ‘भारतीय परिषद अधिनियम, 1892’ (Indian Councils Act 1892) पास करना पड़ा।
हालांकि यह कानून बहुत कमज़ोर था (इसमें अप्रत्यक्ष चुनाव था और बजट पर वोट देने का अधिकार नहीं था), लेकिन फिर भी यह भारतीयों को विधान परिषदों (Legislative Councils) में प्रवेश दिलाने की दिशा में पहला बड़ा कदम था। फिरोजशाह मेहता और गोखले जैसे नेताओं ने इन परिषदों में बैठकर ब्रिटिश नीतियों की धज्जियां उड़ाईं।
(C) प्रशासनिक और नागरिक सुधारों की मांग
उदारवादियों ने लगातार निम्नलिखित मांगें उठाईं (जिनमें से कुछ को बाद में मानना पड़ा):
- इंडियन सिविल सर्विस (ICS) की परीक्षा इंग्लैंड के साथ-साथ भारत में भी आयोजित की जाए।
- कार्यपालिका (Executive) को न्यायपालिका (Judiciary) से अलग किया जाए ताकि पुलिस की मनमानी रुके।
- सेना और प्रशासन पर होने वाले भारी खर्च (Military expenditure) को कम किया जाए।
- नमक कर (Salt Tax) को खत्म किया जाए।
(D) नागरिक अधिकारों की रक्षा (Protection of Civil Rights)
अभिव्यक्ति की आज़ादी (Freedom of Speech), प्रेस की आज़ादी और संगठन बनाने के अधिकारों के लिए उन्होंने लंबी लड़ाई लड़ी। जब 1897 में बाल गंगाधर तिलक को उनके लेखों के लिए गिरफ्तार किया गया, तो पूरे देश के उदारवादियों ने उनके पक्ष में आवाज़ उठाई थी। इसके अलावा सुरेंद्रनाथ बनर्जी (जिन्हें ‘राष्ट्रगुरु’ भी कहा जाता है और जिनकी पुस्तक का नाम ‘A Nation in Making’ है) भारत के पहले ऐसे पत्रकार थे जिन्हें प्रेस की आज़ादी के लिए जेल जाना पड़ा था। गोपाल कृष्ण गोखले ने युवाओं को राष्ट्रीय सेवा के लिए प्रशिक्षित करने हेतु 1905 में ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी’ (Servants of India Society) की स्थापना की।
6. कांग्रेस के प्रति ब्रिटिश सरकार का बदलता रवैया
शुरुआत में लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस को एक ‘सेफ्टी वाल्व’ मानकर इसका समर्थन किया (1886 में कांग्रेस प्रतिनिधियों को कलकत्ता में एक ‘गार्डन पार्टी’ भी दी थी)। लेकिन जैसे-जैसे कांग्रेस ने अधिकारों की मांग तेज़ की, अंग्रेजों का रुख पूरी तरह शत्रुतापूर्ण (Hostile) हो गया:
- लॉर्ड डफरिन (1887): कांग्रेस को “मुट्ठी भर लोगों (Microscopic Minority) का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था” कहकर इसका मज़ाक उड़ाया और सरकारी कर्मचारियों के कांग्रेस में शामिल होने पर रोक लगा दी।
- लॉर्ड कर्जन (1900): कर्जन ने लंदन रिपोर्ट भेजी कि “कांग्रेस अपनी मौत की घड़ियाँ गिन रही है, और मेरी सबसे बड़ी इच्छा है कि मैं भारत में रहते हुए इसकी शांतिपूर्ण मौत में मदद करूँ।”
- फूट डालो और राज करो: अंग्रेजों ने कांग्रेस को कमज़ोर करने के लिए सर सैयद अहमद खान और बनारस के राजा शिवप्रसाद (सितारे-हिंद) को भड़काकर 1888 में ‘यूनाइटेड इंडियन पैट्रियोटिक एसोसिएशन’ बनवाया, जिसका एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस का विरोध करना था।
7. उदारवादियों की सीमाएं और आलोचना (Criticism)
1905 आते-आते युवाओं (तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल – लाल-बाल-पाल) का इन उदारवादियों से मोहभंग होने लगा। इनकी प्रमुख कमियां थीं:
- जनता पर अविश्वास: इन नेताओं का सामाजिक आधार बहुत संकीर्ण (Narrow) था। इनमें ज़्यादातर अमीर वकील, जमींदार और पत्रकार शामिल थे। इन्हें लगता था कि भारत की आम जनता अभी अनपढ़ और रूढ़िवादी है, इसलिए उसे सीधे राजनीति में शामिल नहीं किया जा सकता।
- प्रार्थना की राजनीति: अंग्रेजों ने इनकी याचिकाओं (Petitions) पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। लॉर्ड कर्जन ने तो यहाँ तक कह दिया था कि “कांग्रेस अपनी मौत की घड़ियाँ गिन रही है, और मेरी इच्छा है कि मैं इसकी शांतिपूर्ण मौत में मदद करूँ।”
- पूर्ण स्वतंत्रता की मांग का अभाव: ये ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासन (Dominion Status) चाहते थे, पूरी आज़ादी (Complete Independence) नहीं।
8. निष्कर्ष: उदारवादी चरण का ऐतिहासिक मूल्यांकन
भले ही ऊपरी तौर पर ऐसा लगे कि 1885 से 1905 के बीच कांग्रेस कोई बड़ा ‘क्रांतिकारी’ बदलाव नहीं ला सकी, लेकिन अगर हम गहराई से देखें तो उदारवादी भारत के राजनीतिक भवन के ‘नींव के पत्थर’ थे।
जिस समय अंग्रेज एक इशारे पर किसी को भी फांसी पर लटका सकते थे, उस समय इन नेताओं ने एक अखिल भारतीय संस्था (Congress) को जीवित रखा। उन्होंने देश के लोगों को एक मंच पर लाया, उन्हें लोकतंत्र, चुनाव, और अधिकारों की भाषा सिखाई। उन्होंने जो ‘धन की निकासी’ का सिद्धांत दिया, उसी ने आगे चलकर स्वदेशी आंदोलन और गांधीजी के असहयोग आंदोलन के लिए मानसिक ज़मीन तैयार की।
सच कहा जाए तो, उदारवादियों ने जिस बीज को बोया और सींचा था, उसी पर बाद में उग्रवादियों (Extremists) ने संघर्ष की फसल काटी और गांधीजी ने स्वतंत्रता का फल प्राप्त किया। 1905 में बंगाल के विभाजन (Partition of Bengal) के साथ ही भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन अपने दूसरे और अधिक आक्रामक चरण (उग्रवादी युग) में प्रवेश कर गया।




