
पश्चिम एशिया में तनाव के कारण
जब भी हम अख़बार खोलते हैं, एक खबर तय होती है — पश्चिम एशिया (West Asia) में धमाके, युद्ध, ड्रोन हमले या कूटनीतिक तनाव। इस क्षेत्र को दुनिया मध्य पूर्व (Middle East) भी कहती है। भौगोलिक रूप से यह एशिया, यूरोप और अफ्रीका का मिलन बिंदु है। इसमें सीरिया, लेबनान, इज़राइल, फिलिस्तीन, जॉर्डन, इराक, ईरान, सऊदी अरब, यमन, ओमान, UAE, कतर और मिस्र जैसे देश शामिल हैं।
यहाँ की धरती जितनी पुरानी और ऐतिहासिक है, यहाँ के विवाद भी उतने ही गहरे हैं। आखिर ऐसा क्या है इस ज़मीन में? क्यों यहाँ इज़राइल (Israel), ईरान (Iran), सऊदी अरब (Saudi Arabia) और दुनिया की महाशक्तियां हमेशा आमने-सामने रहती हैं? इस मेगा ब्लॉग में हम हर एक दृष्टिकोण (Point of View) को गहराई से डिकोड करेंगे।
1. इतिहास के पन्ने: धोखे, वादे और नक्शे की लकीरें (Historical Roots)
पश्चिम एशिया की आज की परेशानी को समझने के लिए हमें इतिहास में जाना होगा। आज की सीमाएं (Borders) वहां के लोगों ने नहीं, बल्कि यूरोपीय साम्राज्यवाद (European Imperialism) ने खींची थीं।
- ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) का पतन: प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) से पहले, पूरे मध्य पूर्व पर 400 सालों तक तुर्की के ‘ऑटोमन साम्राज्य’ का राज था। युद्ध में तुर्की की हार हुई और ब्रिटेन-फ्रांस को यहाँ घुसने का मौका मिल गया।
- मैकमोहन-हुसैन पत्राचार (1915 – पहला धोखा): प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, ब्रिटेन ने अरब के नेताओं से वादा किया था कि अगर वे तुर्की (ऑटोमन) के खिलाफ विद्रोह करेंगे, तो युद्ध के बाद ब्रिटेन उन्हें एक “स्वतंत्र और विशाल अरब देश” देगा। अरबों ने विद्रोह किया, लेकिन ब्रिटेन मुकर गया।
- साइक्स-पिकोट समझौता (1916 – दूसरा धोखा): ब्रिटेन ने अरबों से आज़ादी का वादा किया था, लेकिन छुपकर फ्रांस के साथ एक गुप्त समझौता कर लिया। दोनों ने पूरे मध्य पूर्व को आपस में बांट लिया। उन्होंने वहां के कबीलों और धर्मों का कोई ध्यान नहीं रखा और नक्शे पर सीधी लाइनें (Artificial Borders) खींच दीं। नतीजा यह हुआ कि एक-दूसरे के दुश्मन माने जाने वाले लोग एक ही देश में रहने को मजबूर हो गए (जैसे इराक और सीरिया में)।
- बाल्फोर घोषणा (Balfour Declaration – 1917 – तीसरा वादा): ब्रिटिश सरकार ने एक पत्र जारी करके यहूदियों (Jews) के लिए फिलिस्तीन की ज़मीन पर एक ‘राष्ट्रीय घर’ बनाने का वादा किया। लेकिन वहाँ सदियों से अरब (Arab) लोग रह रहे थे। एक ही ज़मीन के दो दावेदार बन गए, और यहीं से इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद (Israel-Palestine Conflict) का बीज बोया गया।
2. ‘काला सोना’ और जियो-इकॉनॉमिक्स की बिसात (The Politics of Oil)
अगर पश्चिम एशिया में रेत के नीचे तेल न होता, तो शायद दुनिया की महाशक्तियों को यहाँ कोई दिलचस्पी नहीं होती। यहाँ दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल (Crude Oil) और प्राकृतिक गैस का भंडार मौजूद है।
- हर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz): यह ओमान और ईरान के बीच समुद्र का एक संकरा रास्ता है। दुनिया का लगभग 20% से 30% तेल हर दिन इसी रास्ते से गुज़रता है। ईरान अक्सर धमकी देता है कि अगर उस पर हमला हुआ, तो वह इसे बंद कर देगा। अगर ऐसा हुआ, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था (Economy) ठप पड़ जाएगी और भयंकर महँगाई आएगी।
- 1973 का तेल संकट (Oil Shock): अरब-इज़राइल युद्ध के दौरान, जब अमेरिका ने इज़राइल का साथ दिया, तो अरब देशों (OPEC) ने अमेरिका और पश्चिमी देशों को तेल बेचना बंद कर दिया (Oil Embargo)। तेल की कीमतें 400% बढ़ गईं। तब से महाशक्तियों को समझ आ गया कि जो तेल को कंट्रोल करेगा, वह दुनिया को कंट्रोल करेगा।
- कार्टर सिद्धांत (Carter Doctrine – 1980): अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने साफ घोषणा कर दी थी कि अगर कोई भी बाहरी शक्ति फारस की खाड़ी (Persian Gulf) के तेल पर कब्ज़ा करने की कोशिश करेगी, तो अमेरिका सैन्य ताकत (Military Force) का इस्तेमाल करेगा। यही कारण है कि अमेरिका आज तक वहां अपनी सेनाएं रखे हुए है।
3. धर्म और साम्प्रदायिकता का महा-टकराव (Religious & Sectarian Divide)
यह भूमि दुनिया के तीन सबसे बड़े धर्मों—इस्लाम, ईसाई धर्म और यहूदी धर्म—का जन्मस्थान है। धार्मिक जुड़ाव यहाँ तनाव का सबसे बड़ा भावनात्मक कारण है।
A. यरुशलम (Jerusalem) का मुद्दा:
यरुशलम दुनिया का अकेला ऐसा शहर है जिसके लिए सदियों से खून बह रहा है।
यहाँ यहूदियों के लिए ‘टेंपल माउंट’, मुसलमानों के लिए ‘अल-अक्सा मस्जिद’ (मक्का-मदीना के बाद तीसरा सबसे पवित्र स्थल), और ईसाइयों के लिए ‘चर्च ऑफ द होली सेपल्कर’ स्थित हैं। इस एक शहर पर नियंत्रण को लेकर इज़राइल और अरब देशों के बीच अनगिनत युद्ध हुए हैं। आज इज़राइल पूरे यरुशलम को अपनी राजधानी मानता है, जबकि फिलिस्तीनी पूर्वी यरुशलम को अपनी भविष्य की राजधानी बनाना चाहते हैं।
B. 1979 का वो साल जिसने सब बदल दिया (The Turning Point):
आधुनिक पश्चिम एशिया के तनाव को समझने के लिए साल 1979 सबसे महत्वपूर्ण है। इसी साल तीन ऐसी घटनाएँ हुईं जिन्होंने आज के छद्म युद्धों (Proxy Wars) की नींव रखी:
- ईरान की इस्लामी क्रांति: ईरान में अमेरिका समर्थित राजा (शाह) को हटाकर अयातुल्ला खुमैनी ने एक कट्टर शिया इस्लामी गणराज्य की स्थापना की। ईरान ने पूरे अरब जगत में अपनी क्रांति फैलाने की कसम खाई, जिससे सऊदी अरब घबरा गया।
- मक्का की घेराबंदी (Siege of Mecca): सऊदी अरब में सुन्नी चरमपंथियों ने मक्का की पवित्र मस्जिद पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद सऊदी सरकार ने अपनी सत्ता बचाने के लिए कट्टरपंथी वहाबी (Wahhabi) विचारधारा को दुनिया भर में फैलाना शुरू कर दिया।
- अफगानिस्तान में सोवियत आक्रमण: रूस (सोवियत संघ) ने अफगानिस्तान पर हमला किया। उसे रोकने के लिए अमेरिका और सऊदी अरब ने मिलकर कट्टर मुजाहिदीनों (लड़ाकों) को पैसा और हथियार दिए, जिनसे बाद में ‘अल-कायदा’ का जन्म हुआ।
1979 के बाद से ही सऊदी अरब (सुन्नी बहुल) और ईरान (शिया बहुल) खुद को मुस्लिम दुनिया का निर्विवाद नेता साबित करने के लिए एक शीत युद्ध (Cold War) लड़ रहे हैं। ये सीधे नहीं लड़ते, बल्कि यमन, सीरिया और लेबनान में अपने गुटों को लड़वाते हैं।
4. कुर्द संकट: एक राष्ट्रहीन समुदाय का संघर्ष (The Kurdish Issue)
पश्चिम एशिया में अरबों, तुर्कों और फारसियों (ईरानियों) के बाद कुर्द (Kurds) चौथा सबसे बड़ा जातीय समूह हैं। इनकी आबादी लगभग 3 से 4 करोड़ है, लेकिन इनका अपना कोई देश नहीं है।
ये मुख्य रूप से तुर्की, इराक, सीरिया और ईरान के पहाड़ी इलाकों में बंटे हुए हैं। कुर्द लोग एक आज़ाद देश ‘कुर्दिस्तान’ की मांग करते हैं। इस वजह से तुर्की की सेना, सीरियाई सरकार और इराक के साथ इनका हमेशा खूनी संघर्ष चलता रहता है। जब अमेरिका को सीरिया में ISIS को हराना था, तो उसने कुर्द लड़ाकों का ही इस्तेमाल किया था, जिससे नाटो (NATO) सदस्य तुर्की अमेरिका से बहुत नाराज़ हो गया था।
5. प्रमुख युद्ध जिन्होंने क्षेत्र को लहूलुहान कर रखा है (Decades of Bloodshed)
इस क्षेत्र के तनाव को इन प्रमुख युद्धों के चश्मे से समझना ज़रूरी है:
A. इज़राइल-अरब के विनाशकारी युद्ध
- 1948 का युद्ध: जब संयुक्त राष्ट्र (UN) ने फिलिस्तीन को यहूदी और अरब राज्यों में बांटने का प्रस्ताव रखा, तो अरबों ने इसे नामंजूर कर दिया। 1948 में इज़राइल (Israel) ने खुद को आज़ाद घोषित कर दिया। 5 अरब देशों ने मिलकर इज़राइल पर हमला किया, लेकिन इज़राइल जीत गया और उसने काफी अरब ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया। लाखों फिलिस्तीनी बेघर हो गए, जिसे वे ‘नकबा’ (Nakba) कहते हैं।
- 1967 का सिक्स-डे वॉर (Six-Day War): सिर्फ 6 दिन चले इस भयंकर युद्ध में इज़राइल ने मिस्र, सीरिया और जॉर्डन को हरा दिया। इज़राइल ने गाजा पट्टी, वेस्ट बैंक, गोलान हाइट्स और सिनाई प्रायद्वीप पर कब्ज़ा कर लिया।
- आज की स्थिति: आज गाजा में हमास (Hamas) जैसे संगठनों के उदय ने इसे और भी हिंसक बना दिया है, जिसका ताज़ा उदाहरण 7 अक्टूबर 2023 का हमास का हमला और उसके बाद इज़राइल का गाजा पर विनाशकारी सैन्य अभियान है।
B. ईरान-इराक युद्ध (1980-1988)
इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने ईरान की कमज़ोरी का फायदा उठाने के लिए उस पर हमला कर दिया। यह 20वीं सदी के सबसे लंबे और खूनी युद्धों में से एक था, जिसमें लगभग 10 लाख लोग मारे गए। इस युद्ध में रासायनिक हथियारों (Chemical Weapons) का भी इस्तेमाल हुआ। इस युद्ध ने ईरान और अरब देशों के बीच दुश्मनी की खाई को हमेशा के लिए गहरा कर दिया।
C. खाड़ी युद्ध (Gulf War) और अमेरिका का इराक पर हमला (2003)
1990 में सद्दाम हुसैन ने कुवैत के तेल पर कब्ज़ा करने के लिए उस पर हमला कर दिया। अमेरिका ने अपनी सेना भेजकर कुवैत को आज़ाद कराया। इसके बाद, 2003 में अमेरिका ने इस झूठे दावे पर इराक पर हमला कर दिया कि सद्दाम के पास “सामूहिक विनाश के हथियार” (WMD) हैं। सद्दाम को तो मार दिया गया, लेकिन इराक पूरी तरह तबाह हो गया। इसी तबाही और अस्थिरता के मलबे से दुनिया के सबसे खूंखार आतंकी संगठन ISIS (इस्लामिक स्टेट) का जन्म हुआ।
D. अरब स्प्रिंग और सीरिया-यमन का पतन (Arab Spring – 2011)
2011 में पूरे अरब जगत में तानाशाहों के खिलाफ जनता सड़कों पर उतर आई। इसे ‘अरब स्प्रिंग’ कहा गया। लेकिन यह शांति नहीं लाया।
- सीरिया का गृहयुद्ध: सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के खिलाफ विरोध हुआ। असद को बचाने रूस और ईरान आ गए, जबकि विद्रोहियों का साथ अमेरिका और खाड़ी देशों ने दिया। आज सीरिया एक खंडहर बन चुका है।
- यमन का मानवीय संकट: यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) और सऊदी समर्थित सरकार के बीच जंग चल रही है। हूतियों ने गाजा युद्ध के समर्थन में लाल सागर (Red Sea) में व्यापारिक जहाज़ों पर मिसाइल हमले शुरू कर दिए, जिससे पूरी दुनिया का व्यापार और सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है।
6. ‘ऐक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ – गैर-राज्य ताकतों का खौफनाक उदय
आजकल पश्चिम एशिया में युद्ध सिर्फ देशों की सरकारी सेनाओं के बीच नहीं लड़े जाते। ईरान ने इज़राइल और अमेरिका को घेरने के लिए अपनी विशेष सेना (IRGC Quds Force) के ज़रिए एक ‘प्रतिरोध का अक्ष’ यानी ऐक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस (Axis of Resistance) का जाल बुना है।
- लेबनान में हिजबुल्लाह (Hezbollah)
- गाजा में हमास (Hamas) और इस्लामिक जिहाद
- यमन में हूती (Houthis)
- इराक और सीरिया में कई शिया मिलिशिया (जैसे कताइब हिजबुल्लाह)
ये संगठन इतने ताकतवर हैं कि इनके पास आज बैलिस्टिक मिसाइलें, आत्मघाती ड्रोन और एंटी-शिप मिसाइलें हैं। ये किसी भी देश की नियमित सेना को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं। चूँकि ये कोई आधिकारिक ‘देश’ नहीं हैं, इसलिए इन पर कूटनीतिक दबाव बनाना लगभग असंभव होता है।
7. बाहरी महाशक्तियों का शतरंजी खेल (Chessboard of Superpowers)
पश्चिम एशिया की आग में घी डालने का काम हमेशा बाहरी शक्तियों ने किया है।
- अमेरिका (USA): दशकों तक अमेरिका यहाँ का “पुलिसवाला” बना रहा। उसके दो लक्ष्य थे: अपने मित्र इज़राइल की सुरक्षा और तेल की निर्बाध सप्लाई। हालाँकि अब अमेरिका यहाँ से निकलकर चीन की तरफ (Indo-Pacific) फोकस करना चाहता है, लेकिन यहाँ के युद्ध उसे बार-बार वापस खींच लेते हैं।
- रूस (Russia): सीरिया युद्ध के ज़रिए राष्ट्रपति पुतिन ने इस क्षेत्र में दमदार वापसी की। रूस सीरिया (टार्टस पोर्ट) के माध्यम से भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) में अपनी ताकत बनाए रखना चाहता है। आज रूस और ईरान गहरे सैन्य मित्र बन चुके हैं।
- चीन (China) का नया खेल: चीन यहाँ का सबसे चतुर खिलाड़ी है। वह हथियारों से नहीं, पैसों से खेल रहा है। चीन इस क्षेत्र का सबसे बड़ा तेल खरीदार है। उसका फोकस बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) पर है। चीन ने सबको तब चौंका दिया जब उसने कट्टर दुश्मन माने जाने वाले ईरान और सऊदी अरब के बीच मध्यस्थता करके उनके रिश्ते बहाल करवा दिए। चीन यह दिखाना चाहता है कि ‘अमेरिका युद्ध लाता है, जबकि चीन व्यापार और शांति लाता है।’
8. छिपा हुआ दुश्मन: जलवायु परिवर्तन और पानी का संकट (Water Wars)
हम अक्सर तेल और धर्म की बात करते हैं, लेकिन यहाँ एक और संकट तेज़ी से बढ़ रहा है—पानी की कमी (Water Scarcity)।
यहाँ के ज़्यादातर देश रेगिस्तानी हैं। दजला और फरात (Tigris and Euphrates) जैसी ऐतिहासिक नदियां जो कभी जीवन रेखा थीं, तुर्की द्वारा बनाए गए विशाल बांधों के कारण सीरिया और इराक तक पहुँचते-पहुँचते सूख रही हैं। जॉर्डन नदी के पानी को लेकर इज़राइल, जॉर्डन और सीरिया में विवाद है। खेतों के सूखने से किसान शहरों की तरफ भाग रहे हैं, जिससे बेरोज़गारी और विद्रोह बढ़ रहा है (सीरिया के गृहयुद्ध का एक बड़ा कारण सूखा भी था)।
9. भारत पर पश्चिम एशिया के तनाव का सीधा प्रभाव (Deep Impact on India)
पश्चिम एशिया हमारे घर से बहुत दूर नहीं है। भारत सरकार की ‘लुक वेस्ट (Look West)’ नीति के तहत यह क्षेत्र भारत के लिए जीवन-मरण का सवाल है।
- ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 80% से अधिक कच्चा तेल (Crude Oil) इराक, सऊदी अरब, और UAE जैसे देशों से खरीदता है। युद्ध होने पर तेल महंगा होता है, और भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं। इससे ट्रांसपोर्टेशन महंगा होता है और महँगाई (Inflation) सीधे आम आदमी की जेब काटती है।
- प्रवासी भारतीय और रेमिटेंस: लगभग 90 लाख भारतीय सऊदी अरब, UAE, कतर, ओमान और कुवैत में काम करते हैं। ये लोग हर साल लगभग 40-50 अरब डॉलर भारत भेजते हैं (Remittances), जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी है। युद्ध की स्थिति में इन लाखों भारतीयों की सुरक्षा दांव पर लग जाती है (जैसे 1990 में कुवैत एयरलिफ्ट या यमन में ऑपरेशन राहत)।
- महत्वाकांक्षी मेगा-प्रोजेक्ट्स पर ब्रेक: भारत ने G20 में IMEC (India-Middle East-Europe Economic Corridor) की घोषणा की थी। यह भारत को सीधे UAE, सऊदी अरब और इज़राइल होते हुए यूरोप से जोड़ेगा। लेकिन गाजा युद्ध और लाल सागर के संकट ने इस ड्रीम प्रोजेक्ट को फिलहाल रोक दिया है। इसके अलावा I2U2 (भारत, इज़राइल, UAE, अमेरिका का नया गुट) और चाबहार पोर्ट (ईरान) की सफलता भी इसी क्षेत्र की शांति पर निर्भर है।
- कूटनीतिक ‘सर्कस’ (Tightrope Walk): भारत की विदेश नीति के लिए यह एक ‘कांटों के ताज’ जैसा है। भारत को इज़राइल से अत्याधुनिक तकनीक और हथियार चाहिए, और अरब देशों से तेल और निवेश चाहिए। दोनों पक्षों को एक साथ खुश रखना भारत की कूटनीति की सबसे बड़ी सफलता है।
10. क्या भविष्य में कभी शांति संभव है? (The Way Forward)
पश्चिम एशिया का तनाव किसी एक बीमारी का नाम नहीं है, यह इतिहास, धर्म और तेल के लालच का एक जटिल कैंसर है। यह रातों-रात खत्म नहीं हो सकता। हालाँकि, कुछ रोशनी की किरणें (Silver Linings) भी दिख रही हैं:
- अब्राहम एकॉर्ड्स (Abraham Accords): 2020 में UAE और बहरीन जैसे अरब देशों ने इज़राइल के साथ दशकों पुरानी दुश्मनी भुलाकर राजनयिक और व्यापारिक रिश्ते शुरू किए हैं। यह एक बहुत बड़ा बदलाव है।
- तेल पर निर्भरता कम करना: सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का Vision 2030 इसका बड़ा उदाहरण है। अरब देश समझ गए हैं कि भविष्य में इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ तेल की डिमांड कम कर देंगी। इसलिए वे अब अपनी अर्थव्यवस्था को पर्यटन (Tourism), AI, खेल और तकनीक की तरफ मोड़ रहे हैं। इसके लिए उन्हें हर हाल में अपने क्षेत्र में शांति चाहिए।
लेकिन, जब तक फिलिस्तीन के मुद्दे का कोई ऐसा समाधान नहीं निकलता जो इज़राइल की सुरक्षा सुनिश्चित करे और फिलिस्तीनियों को सम्मानजनक आज़ादी (Two-State Solution) दे; और जब तक ईरान व इज़राइल के बीच का खूनी खेल खत्म नहीं होता, तब तक पश्चिम एशिया एक ऐसे ज्वालामुखी की तरह रहेगा, जो कभी भी फट सकता है।




