
महात्मा गांधी के आंदोलन: भारत की आज़ादी का महासंग्राम (विस्तृत और ऐतिहासिक गाइड)
जब भी भारत की आज़ादी के इतिहास की बात होती है, तो एक नाम पूरी दुनिया में सबसे ऊपर आता है—मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें हम सम्मान से ‘बापू’, ‘महात्मा’ या ‘राष्ट्रपिता’ कहते हैं। 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद, गांधी जी ने भारत की आज़ादी की लड़ाई की पूरी दिशा ही बदल दी। उन्होंने इस संघर्ष को सिर्फ कुछ पढ़े-लिखे वकीलों और नेताओं के ड्राइंग रूम से निकालकर भारत के लाखों गांवों, खेतों, कारखानों और सड़कों की धूल तक पहुंचा दिया।
इस मेगा-ब्लॉग में हम महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए हर एक आंदोलन का एक ऐतिहासिक और अत्यंत विस्तृत ‘पोस्टमॉर्टम’ करेंगे। यह जानकारी इतिहास के छात्रों (UPSC/State PCS) और हर उस हिंदुस्तानी के लिए एक ‘मास्टरक्लास’ है जो अपने देश की आज़ादी की असली कीमत और कहानी को गहराई से समझना चाहता है।
गांधीजी के वैचारिक अस्त्र: हिंद स्वराज से सत्याग्रह तक
गांधीजी के आंदोलनों को गहराई से समझने के लिए उनकी सोच को समझना ज़रूरी है। उनके आंदोलन कभी भी सिर्फ अंग्रेजों को भगाने के लिए नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज को अंदर से शुद्ध करने के लिए भी थे।
- हिंद स्वराज (1909): लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते समय जहाज़ पर लिखी गई इस पुस्तक में गांधीजी ने आधुनिक पश्चिमी सभ्यता (Modern Civilization) की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘सच्चा स्वराज’ सिर्फ अंग्रेज़ों का जाना नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण है।
- सत्याग्रह (Satyagraha): इसका अर्थ है ‘सत्य के लिए आग्रह’। गांधी जी मानते थे कि अगर आपका उद्देश्य सच्चा है और संघर्ष अन्याय के खिलाफ है, तो आपको अत्याचारी से लड़ने के लिए शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है। सत्याग्रही अपने कष्ट सहकर अत्याचारी के हृदय को परिवर्तित करता है।
- अहिंसा (Ahimsa): गांधी जी की अहिंसा कायरता (Cowardice) नहीं थी, बल्कि यह वीरों का आभूषण थी। उनका कहना था, “जहां कायरता और हिंसा में से किसी एक को चुनना हो, वहां मैं हिंसा को चुनूंगा, लेकिन अहिंसा हमेशा हिंसा से असीम रूप से श्रेष्ठ है।”
- ट्रस्टीशिप का सिद्धांत (Trusteeship): गांधी जी का मानना था कि पूंजीपतियों को अपनी संपत्ति का मालिक नहीं, बल्कि समाज की ओर से उसका ‘ट्रस्टी’ (रखवाला) मानना चाहिए और अतिरिक्त धन का उपयोग गरीबों की भलाई के लिए करना चाहिए।
1. सत्याग्रह की जन्मस्थली: दक्षिण अफ्रीका का महा-संघर्ष (1893-1914)
भारत में आज़ादी का बिगुल फूंकने से पहले, गांधी जी ने अपने राजनीतिक और आध्यात्मिक हथियारों का परीक्षण दक्षिण अफ्रीका की प्रयोगशाला में किया था। 1893 में ‘दादा अब्दुल्ला एंड कंपनी’ के एक साधारण वकील के रूप में वे वहां गए थे, लेकिन वहां के श्वेत रंगभेद (Apartheid) ने उनके भीतर के ‘महात्मा’ को जगा दिया।
- पीटरमैरिट्ज़बर्ग स्टेशन की घटना (7 जून 1893): गांधी जी के पास फर्स्ट-क्लास का वैद्य टिकट था, फिर भी उन्हें सिर्फ उनके ‘काले’ रंग और भारतीय होने के कारण कड़कड़ाती ठंड में ट्रेन से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया गया। यह रात उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
- नटाल इंडियन कांग्रेस (1894): उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों और गिरमिटिया मज़दूरों (Indentured labourers) को एकजुट करने के लिए इस संस्था की स्थापना की।
- बोअर युद्ध (1899) और ज़ुलु विद्रोह (1906): शुरुआत में गांधीजी ब्रिटिश साम्राज्य के वफादार थे। उन्होंने इन युद्धों में घायलों की मदद के लिए ‘इंडियन एम्बुलेंस कोर’ (Indian Ambulance Corps) की स्थापना की, जिसके लिए अंग्रेज़ों ने उन्हें मेडल भी दिया था।
- पहला सत्याग्रह (1906): दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने ‘एशियाटिक रजिस्ट्रेशन एक्ट’ (Black Act) पास किया। इसमें हर भारतीय को हर समय अपना फिंगरप्रिंट वाला पहचान पत्र साथ रखना अनिवार्य था। यहीं गांधी जी ने पहली बार ‘सत्याग्रह’ शब्द गढ़ा और शांतिपूर्ण सविनय अवज्ञा की।
- टॉलस्टॉय फार्म (1910) और फीनिक्स आश्रम: आंदोलनकारियों और उनके परिवारों को आश्रय देने के लिए उन्होंने अपने जर्मन मित्र हरमन कालेनबाख की मदद से इन आश्रमों की स्थापना की।
2. भारत में वापसी और शुरुआती क्षेत्रीय आंदोलन (1915-1918)
9 जनवरी 1915 को गांधी जी हमेशा के लिए भारत लौट आए (इसी दिन को आज ‘प्रवासी भारतीय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है)। उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें सलाह दी थी कि 1 साल तक अपना मुंह बंद रखें और सिर्फ आंख-कान खुले रखकर पूरे भारत का भ्रमण करें।
साबरमती आश्रम और बीएचयू का ऐतिहासिक भाषण (1916)
कोई भी आंदोलन शुरू करने से पहले, 1915 में गांधी जी ने अहमदाबाद में ‘कोचरब आश्रम’ (जो बाद में 1917 में साबरमती आश्रम बना) की स्थापना की। फरवरी 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के उद्घाटन समारोह में उन्होंने अपना पहला बड़ा सार्वजनिक भाषण दिया। वहां राजा-महाराजाओं और एनी बेसेंट जैसे दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में उन्होंने भारतीय अभिजात वर्ग (Elites) की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि जब तक भारत के अमीर अपने आभूषणों का त्याग कर किसानों से नहीं जुड़ते, तब तक कोई आज़ादी नहीं मिल सकती। इस भाषण ने स्पष्ट कर दिया कि गांधी जी की राजनीति आम आदमी की राजनीति होगी।
A. चंपारण सत्याग्रह (1917) – भारत में पहला सविनय अवज्ञा
बिहार के चंपारण ज़िले में यूरोपीय बागान-मालिक किसानों का भारी आर्थिक शोषण कर रहे थे। वहां ‘तिनकठिया प्रणाली’ (Tinkathia System) लागू थी, जिसके तहत किसानों को अपनी ज़मीन के सबसे उपजाऊ 3/20 हिस्से पर ज़बरदस्ती ‘नील’ (Indigo) की खेती करनी पड़ती थी। जर्मनी में सिंथेटिक रंग (Chemical dyes) बनने के बाद नील की मांग घट गई थी, फिर भी अंग्रेज़ किसानों से भारी कर (Taxes) वसूल रहे थे।
- राजकुमार शुक्ल नामक एक किसान के ज़िद करने पर गांधी जी चंपारण गए। वहां डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जे.बी. कृपलानी और मज़हर-उल-हक़ जैसे नेता उनके साथ जुड़े।
- सरकार ने उन्हें तुरंत चंपारण छोड़ने का ‘धारा 144’ का नोटिस दिया, पर उन्होंने अदालत में शांति से इसे मानने से इंकार कर दिया। यह भारत में उनकी पहली सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience) थी।
- अदालत और अंग्रेज़ सरकार गांधी जी की लोकप्रियता देखकर घबरा गई। एक जांच कमिटी (चंपारण एग्रेरियन कमिटी) बनी, जिसमें गांधी जी भी सदस्य थे। अंततः चंपारण कृषि कानून (Champaran Agrarian Bill) पास हुआ, तिनकठिया प्रणाली हमेशा के लिए समाप्त कर दी गई और किसानों से अवैध रूप से वसूले गए धन का 25% उन्हें वापस कर दिया गया।
B. अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) – पहली भूख हड़ताल
अहमदाबाद के कपड़ा मिल मालिकों और मज़दूरों के बीच ‘प्लेग बोनस’ (Plague Bonus) को लेकर भारी विवाद था। प्रथम विश्व युद्ध के कारण महंगाई चरम पर थी। मज़दूर 50% बोनस मांग रहे थे, जबकि मिल मालिक (जिनमें गांधी जी के मित्र अंबालाल साराभाई भी थे) इसे पूरी तरह खत्म करके सिर्फ 20% वृद्धि देना चाहते थे।
- गांधी जी ने अनुसुइया साराभाई (अंबालाल की बहन) के साथ मिलकर मज़दूरों का नेतृत्व किया और उन्हें 35% की मांग पर अड़े रहने और शांतिपूर्ण हड़ताल करने को कहा।
- जब कुछ हफ्तों बाद मज़दूरों का मनोबल टूटने लगा और वे भूख से तड़पने लगे, तब गांधी जी ने भारत में अपनी पहली भूख हड़ताल (First Fast unto Death) शुरू कर दी।
- इस अनशन ने मिल मालिकों पर भारी नैतिक और सामाजिक दबाव डाला। एक ट्रिब्यूनल का गठन हुआ और अंततः मज़दूरों को 35% बोनस मिल गया।
C. खेड़ा सत्याग्रह (1918) – पहला पूर्ण असहयोग
गुजरात के खेड़ा ज़िले में भीषण सूखा पड़ा था, फसलें बर्बाद हो गई थीं और ‘प्लेग’ एवं ‘कॉलरा’ फैला हुआ था। रेवेन्यू कोड के अनुसार, यदि फसल सामान्य उपज का 25% (4 आना) से कम हो, तो किसानों का लगान (Tax) पूरी तरह माफ़ होना चाहिए था। लेकिन क्रूर अंग्रेज़ अधिकारी ज़बरदस्ती पूरा टैक्स वसूल रहे थे।
- गांधी जी और सरदार वल्लभभाई पटेल (जो इसी आंदोलन से वकालत छोड़कर गांधी जी के सबसे बड़े सिपहसालार बने) ने गांव-गांव घूमकर किसानों को लगान न देने की शपथ दिलाई। यह भारत में पहला असहयोग (Non-Cooperation) प्रयोग था।
- सरकार ने किसानों की ज़मीन, मवेशी और घरों का सामान तक कुर्क (ज़ब्त) कर लिया, पर किसान अपने निश्चय से डिगे नहीं।
- अंत में सरकार को झुकना पड़ा और एक गुप्त आदेश निकालना पड़ा कि उस वर्ष और अगले वर्ष का टैक्स निलंबित (Suspend) कर दिया जाए, और केवल उन्हीं से वसूला जाए जो स्वेच्छा से दे सकें।
3. रॉलेट सत्याग्रह और जलियांवाला बाग का रक्तपात (1919)
प्रथम विश्व युद्ध में लाखों भारतीयों ने अंग्रेज़ों का साथ इस उम्मीद में दिया था कि युद्ध जीतने के बाद ब्रिटेन भारत को ‘स्वशासन’ (Dominion Status) देगा। लेकिन इनाम के तौर पर अंग्रेज़ों ने मार्च 1919 में सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में रॉलेट एक्ट (Anarchical and Revolutionary Crimes Act) पास कर दिया।
इसे ‘काला कानून’ कहा गया। इसके तहत अंग्रेज़ सरकार किसी भी भारतीय पर सिर्फ शक के आधार पर, बिना कोई मुकदमा चलाए उसे 2 साल तक जेल में सड़ा सकती थी। प्रेस की आज़ादी छीन ली गई। भारतीय जनता का नारा गूंज उठा: “नो दलील, नो वकील, नो अपील।”
- गांधी जी ने ‘सत्याग्रह सभा’ बनाई और इस अत्याचार के खिलाफ 6 अप्रैल 1919 को पूरे देश में राष्ट्रव्यापी हड़ताल (Hartal) और उपवास का आह्वान किया। यह गांधी जी का पहला अखिल भारतीय (All-India) जन-आंदोलन था।
- जलियांवाला बाग नरसंहार (13 अप्रैल 1919): पंजाब में रॉलेट एक्ट का सबसे भारी विरोध हो रहा था। डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी के विरोध में बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण जनसभा हो रही थी। क्रूर जनरल डायर (Reginald Dyer) ने एकमात्र निकास द्वार बंद करके वहां निहत्थे पुरुषों, महिलाओं और बच्चों पर मशीनगनों से अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं। इसमें 1000 से अधिक निर्दोष लोग मारे गए।
- इस बर्बर घटना ने पूरे देश को दहला दिया। रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ‘नाइटहुड’ (Knighthood) की उपाधि वापस कर दी। शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारिणी परिषद से इस्तीफा दे दिया। गांधी जी की अंतरात्मा को गहरा आघात लगा और उन्होंने हमेशा के लिए ब्रिटिश साम्राज्य की न्यायप्रियता से अपना मोह भंग कर लिया।
4. खिलाफत और महान असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement)
जलियांवाला बाग की क्रूरता, हंटर कमीशन की लीपापोती और मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों से उपजी निराशा ने देश में बारूद बिछा दिया था। इसी बीच एक और बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा उठा—खिलाफत (Khilafat) का मुद्दा।
खिलाफत आंदोलन का रणनीतिक समर्थन
प्रथम विश्व युद्ध में हारने के बाद अंग्रेज़ों ने ‘सेव्रेस की संधि’ (Treaty of Sèvres) के तहत तुर्की (Ottoman Empire) के टुकड़े कर दिए और सुल्तान (जिन्हें दुनिया भर के मुसलमान अपना ‘खलीफा’ या आध्यात्मिक नेता मानते थे) की सत्ता छीन ली। इसके विरोध में भारत के मुसलमानों ने अली बंधुओं (शौकत अली और मुहम्मद अली जौहर), मौलाना आज़ाद और हसरत मोहानी के नेतृत्व में ‘खिलाफत आंदोलन’ शुरू किया। गांधी जी ने देखा कि अंग्रेज़ों के खिलाफ हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने का ऐसा स्वर्णिम अवसर अगले सौ सालों में नहीं मिलेगा, इसलिए उन्होंने कांग्रेस को इसके समर्थन के लिए राज़ी कर लिया।
नागपुर अधिवेशन (1920) और कांग्रेस का कायाकल्प
दिसंबर 1920 के कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में असहयोग के प्रस्ताव को अंतिम मंज़ूरी मिली। यहीं पर गांधीजी ने कांग्रेस के संविधान में ऐतिहासिक बदलाव किए: भाषाई आधार पर प्रांतीय कांग्रेस कमेटियां बनाई गईं, और रोज़मर्रा के काम के लिए 15 सदस्यों वाली कांग्रेस कार्य समिति (CWC) का गठन किया गया। कांग्रेस अब एलिट वर्ग की पार्टी से बदलकर एक जन-पार्टी (Mass Party) बन गई।
असहयोग आंदोलन का ऐतिहासिक विस्फोट (1921)
इस आंदोलन की आंधी में क्या-क्या हुआ?
- लाखों विद्यार्थियों ने अंग्रेज़ी स्कूल-कॉलेज हमेशा के लिए छोड़ दिए। स्वदेशी शिक्षा के लिए जामिया मिल्लिया इस्लामिया, काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ और गुजरात विद्यापीठ जैसे राष्ट्रीय संस्थानों की स्थापना हुई।
- मोतीलाल नेहरू, सी.आर. दास, सी. राजगोपालाचारी, आसफ अली और राजेंद्र प्रसाद जैसे देश के सबसे बड़े वकीलों ने अपनी चलती हुई अदालती प्रैक्टिस (वकालत) छोड़ दी।
- जगह-जगह विदेशी कपड़ों की भारी होली जलाई गई। विदेशी कपड़ों का आयात ₹102 करोड़ से गिरकर ₹57 करोड़ रह गया। खादी और चरखा भारत की आज़ादी और आत्मनिर्भरता का सबसे शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक बन गए।
- ड्यूक ऑफ कनॉट और प्रिंस ऑफ वेल्स का बहिष्कार: जब ब्रिटिश राजकुमार भारत आए, तो उनका स्वागत खाली सड़कों और काले झंडों से किया गया।
चौरी चौरा कांड का झटका और आंदोलन की वापसी (1922)
पूरा देश अभूतपूर्व जोश में था, ब्रिटिश सत्ता कांपने लगी थी। लेकिन 5 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के चौरी चौरा गांव में एक शांतिपूर्ण जुलूस पर पुलिस ने बेरहमी से लाठीचार्ज और फायरिंग कर दी। जवाब में उग्र भीड़ ने पुलिस स्टेशन को बाहर से बंद करके उसमें आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी ज़िंदा जल गए।
गांधी जी के लिए अहिंसा (Non-violence) स्वराज से भी ऊपर थी। उन्हें लगा कि आंदोलन हिंसक रास्ते पर जा रहा है और जनता अभी भी सत्याग्रह के कड़े अनुशासन के लिए तैयार नहीं है। इसलिए उन्होंने 12 फरवरी 1922 को बारदोली प्रस्ताव के ज़रिए अचानक आंदोलन वापस ले लिया। सुभाष चंद्र बोस ने इसे ‘राष्ट्रीय आपदा’ (National Calamity) कहा, और जवाहरलाल नेहरू, सी.आर. दास जैसे नेता जेल के अंदर इस फैसले से बहुत क्षुब्ध हुए। 10 मार्च 1922 को गांधी जी को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और 6 साल की सज़ा सुनाई गई।
5. रचनात्मक कार्य, स्वराज्य पार्टी और नया आधार (1924-1929)
गांधी जी के जेल जाने के बाद कांग्रेस दो हिस्सों में बंट गई। सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने ‘स्वराज्य पार्टी’ (Swaraj Party) बना ली ताकि वे चुनाव लड़कर विधान परिषदों (Councils) के अंदर घुसकर अंग्रेज़ों के काम में बाधा डाल सकें। अपेंडिसाइटिस के ऑपरेशन के बाद स्वास्थ्य कारणों से गांधी जी को 1924 में रिहा कर दिया गया। उन्होंने राजनीति से कुछ समय के लिए दूरी बना ली और ‘रचनात्मक कार्यों’ (Constructive Programme) पर ध्यान केंद्रित किया।
- अखिल भारतीय चरखा संघ (1925) व ग्रामोद्योग संघ (1934): उन्होंने गांव-गांव में खादी और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया, जिससे करोड़ों गरीब महिलाओं और किसानों को पूरक रोज़गार मिला।
- हिंदू-मुस्लिम एकता: चौरी चौरा के बाद देश में भयानक सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। 1924 में कोहाट और अन्य जगहों के दंगों को रोकने और दिलों को जोड़ने के लिए उन्होंने दिल्ली में 21 दिन का कठोर उपवास रखा।
- अस्पृश्यता निवारण और बुनियादी शिक्षा: उन्होंने ‘नई तालीम’ (Basic Education) का कॉन्सेप्ट दिया जिसमें किताबी ज्ञान के साथ-साथ हाथ का हुनर (Vocational training) भी सिखाया जाए।
- बारदोली सत्याग्रह (1928): इसी रचनात्मक दौर के अंत में गुजरात के बारदोली में किसानों पर 22% लगान वृद्धि के खिलाफ वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में एक सफल सत्याग्रह हुआ। गांधी जी ने ‘यंग इंडिया’ के माध्यम से इसका पूरा समर्थन किया और आवश्यकता पड़ने पर नेतृत्व संभालने के लिए तैयार रहे। इसी आंदोलन की सफलता पर वहां की महिलाओं ने पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि दी।
6. सविनय अवज्ञा आंदोलन का तूफान और दांडी मार्च (1930-1934)
1928 में जब बिना किसी भारतीय सदस्य वाला ‘साइमन कमीशन’ (Simon Commission) भारत आया, तो पूरे देश में “साइमन गो बैक” के नारों से उसका बहिष्कार हुआ। इसी विरोध में लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसीं और वे शहीद हुए। 1929 के लाहौर अधिवेशन (अध्यक्ष: पंडित जवाहरलाल नेहरू) में कांग्रेस ने रावी नदी के तट पर पहली बार ‘पूर्ण स्वराज’ (Complete Independence) का ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया और 26 जनवरी 1930 को पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया।
वायसराय इरविन को 11 सूत्रीय अल्टीमेटम
सविनय अवज्ञा शुरू करने से पहले गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड इरविन को 11 सूत्रीय मांग-पत्र (11 Points Ultimatum) भेजा, जिसमें भू-राजस्व 50% कम करने, नमक कर (Salt Tax) समाप्त करने, राजनीतिक बंदियों की रिहाई और आत्मरक्षा के लिए हथियार रखने के अधिकार जैसी मांगें थीं। जब इरविन ने कोई ध्यान नहीं दिया, तो गांधीजी ने लिखा: “मैंने घुटने टेककर रोटी मांगी थी, लेकिन बदले में मुझे पत्थर मिले।”
नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च – 1930)
गांधी जी ने आंदोलन का प्रतीक ‘नमक’ (Salt) को चुना। अंग्रेज़ों का नमक के उत्पादन पर एकाधिकार था। गांधी जी का तर्क था कि नमक हवा और पानी की तरह जीवन के लिए अपरिहार्य है, इस पर टैक्स लगाना मानवता के खिलाफ अपराध है।
- 12 मार्च 1930 को गांधी जी ने अपने 78 चुने हुए अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी (गुजरात का समुद्री तट) तक 390 किमी (240 मील) लंबी ऐतिहासिक पदयात्रा शुरू की।
- 6 अप्रैल 1930 की सुबह दांडी के तट पर गांधी जी ने मुट्ठी भर नमक बनाकर और उठाकर ब्रिटिश नमक कानून को तोड़ दिया। यह ब्रिटिश साम्राज्य की सत्ता और अहंकार की जड़ों पर सीधा प्रहार था।
धरासना सत्याग्रह और लाल कुर्ती आंदोलन
नमक कानून टूटते ही पूरा देश सविनय अवज्ञा की आग में कूद पड़ा। महिलाओं की भागीदारी इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता थी।
- धरासना नमक सत्याग्रह (मई 1930): गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद, कवयित्री सरोजिनी नायडू (Sarojini Naidu) और इमाम साहब ने 2500 सत्याग्रहियों के साथ गुजरात के धरासना नमक कारखाने पर धावा बोला। पुलिस ने शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों के सिर पर लोहे की मूठ वाली लाठियों से बर्बर प्रहार किए। अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर (Webb Miller) ने इसकी ऐसी हृदय-विदारक रिपोर्टिंग की, जिसे पढ़कर पूरी दुनिया में ब्रिटिश राज की थू-थू हुई।
- लाल कुर्ती आंदोलन (Red Shirts) और सीमांत गांधी: उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में खान अब्दुल गफ्फार खान (Khan Abdul Ghaffar Khan) ने पश्तूनों को अहिंसा का पाठ पढ़ाया। उनके संगठन ‘खुदाई खिदमतगार’ को ‘लाल कुर्ती’ भी कहा जाता था। पेशावर में जब इन निहत्थे पठानों पर गोली चलाने का आदेश दिया गया, तो वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में गढ़वाल राइफल्स के हिंदू सैनिकों ने निहत्थे मुसलमानों पर गोली चलाने से साफ इंकार कर दिया।
गांधी-इरविन समझौता और कराची अधिवेशन (1931)
ब्रिटिश सरकार घुटनों पर आ गई। 90,000 लोगों को जेल में डालने के बाद भी आंदोलन नहीं रुका, तो वायसराय लॉर्ड इरविन को मजबूर होकर 5 मार्च 1931 को गांधी जी के साथ समानता के स्तर पर गांधी-इरविन समझौता (Delhi Pact) करना पड़ा। राजनीतिक कैदी रिहा किए गए (पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी माफ नहीं की गई)।
कराची अधिवेशन (1931): इस समझौते के ठीक बाद सरदार पटेल की अध्यक्षता में कराची अधिवेशन हुआ, जहाँ गांधीजी का काले झंडों से स्वागत हुआ (भगत सिंह की फांसी के कारण)। यहीं गांधीजी ने वह ऐतिहासिक वाक्य कहा था, “गांधी मर सकता है, लेकिन गांधीवाद हमेशा ज़िंदा रहेगा।” इसी अधिवेशन में पहली बार ‘मौलिक अधिकारों’ (Fundamental Rights) का प्रस्ताव भी पास हुआ।
गोलमेज सम्मेलन और ‘अर्धनग्न फकीर’ का तंज
बदले में गांधी जी लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन (Second Round Table Conference – 1931) में शामिल होने गए। लंदन की सीढ़ियों पर गांधीजी को धोती पहने चढ़ते देख, ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल (Winston Churchill) बुरी तरह चिढ़ गया और उसने गांधीजी को “एक राजद्रोही मध्य-मंदिर का वकील, जो अब एक अर्धनग्न फकीर (Half-naked fakir) के रूप में सीढ़ियां चढ़ रहा है” कहकर उनका मज़ाक उड़ाया था। लंदन में आज़ादी पर कोई बात नहीं बनी, भारत लौटकर गांधीजी ने फिर आंदोलन शुरू किया, और अंततः 1934 में इसे वापस ले लिया।
7. दलित उद्धार और ऐतिहासिक पूना पैक्ट (1932)
लंदन से लौटने के बाद गांधी जी को यरवदा जेल (पुणे) में डाल दिया गया। इसी बीच अगस्त 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री राम्से मैकडोनाल्ड ने एक खतरनाक ‘बांटो और राज करो’ की चाल चली और ‘कम्युनल अवार्ड’ (Communal Award) की घोषणा कर दी। इसके तहत दलितों को सवर्ण हिंदुओं से अलग राजनीतिक वर्ग मान लिया गया और उन्हें पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorates) दे दिया गया। गांधी जी ने तुरंत भांप लिया कि यह हिंदू समाज को हमेशा के लिए विखंडित करने की साजिश है।
- गांधी जी ने जेल के भीतर ही 20 सितंबर 1932 को ‘आमरण अनशन’ (Fast unto death) शुरू कर दिया। उनके गिरते स्वास्थ्य से पूरे देश में खलबली मच गई।
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर का मानना था कि दलितों के हक़ के लिए अलग निर्वाचन ज़रूरी है, लेकिन गांधीजी के प्राणों की रक्षा के भारी दबाव में और मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से दोनों के बीच ऐतिहासिक ‘पूना पैक्ट’ (Poona Pact – 24 सितंबर 1932) पर हस्ताक्षर हुए।
- इसमें दलितों के लिए प्रांतीय विधानमंडलों में आरक्षित सीटें (71 से बढ़ाकर 147) कर दी गईं, लेकिन वे संयुक्त हिंदू मतदाता सूची का हिस्सा बने रहे (Separate Electorate रद्द हुआ)।
- इसके बाद गांधी जी ने अपना पूरा जीवन अछूतोद्धार में लगा दिया। 1933 में उन्होंने ‘हरिजन सेवक संघ’ की स्थापना की, अपनी पत्रिका ‘यंग इंडिया’ का नाम बदलकर ‘हरिजन’ किया और पूरे देश में 20,000 किमी की ‘हरिजन यात्रा’ की।
8. द्वितीय विश्व युद्ध और व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940)
द्वितीय विश्व युद्ध (1939) शुरू होने पर अंग्रेज़ों ने भारत की प्रांतीय सरकारों (कांग्रेस) से पूछे बिना ही भारत को युद्ध में झोंक दिया। विरोध में कांग्रेस की सभी प्रांतीय सरकारों ने इस्तीफा दे दिया। गांधी जी फासीवाद (Hitler/Mussolini) के खिलाफ थे, इसलिए युद्ध के समय अंग्रेज़ों की मुसीबत का फायदा नहीं उठाना चाहते थे। लेकिन वे भारत की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और युद्ध के विरोध को भी शांतिपूर्ण ढंग से दर्ज करना चाहते थे।
- इसलिए उन्होंने सामूहिक सविनय अवज्ञा की जगह व्यक्तिगत सत्याग्रह (Individual Satyagraha) का नायाब तरीका निकाला। इसमें भीड़ नहीं, बल्कि गांधी जी द्वारा चुना गया एक ‘गुणी और अहिंसक’ व्यक्ति सार्वजनिक रूप से युद्ध विरोधी भाषण देकर खुद को गिरफ्तार करवाता था।
- प्रथम सत्याग्रही: आचार्य विनोबा भावे। द्वितीय सत्याग्रही: पंडित जवाहरलाल नेहरू। तीसरे सत्याग्रही: ब्रह्मदत्त थे।
- इसे ‘दिल्ली चलो’ आंदोलन भी कहा गया क्योंकि सत्याग्रही भाषण देते हुए दिल्ली की ओर मार्च करते थे। इसमें लगभग 25,000 चुने हुए सत्याग्रहियों ने शांतिपूर्वक जेल यात्रा की।
9. भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) – करो या मरो
1942 आते-आते द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेज़ों की हालत बहुत खराब थी और जापानी सेना भारत के पूर्वी दरवाज़े (रंगून और बर्मा) तक पहुँच चुकी थी। भारत के लोगों में अंग्रेज़ों की अक्षमता और महंगाई को लेकर भारी गुस्सा था। सर स्टैफोर्ड क्रिप्स का ‘क्रिप्स मिशन’ (Cripps Mission) फेल हो गया क्योंकि वह भारत को पूर्ण आज़ादी के बजाय ‘डोमिनियन स्टेटस’ का झुनझुना पकड़ा रहा था (जिसे गांधी जी ने ‘Post-dated cheque of a crashing bank’ कहा था)।
यूसुफ मेहरअली का नारा और ग्वालिया टैंक का सिंहनाद
मुंबई के तत्कालीन मेयर और समाजवादी नेता यूसुफ मेहरअली (Yusuf Meherally) ने ही गांधीजी को “Quit India” (भारत छोड़ो) का नारा सुझाया था, जिसे गांधीजी ने तुरंत स्वीकार कर लिया।
8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान (अगस्त क्रांति मैदान) में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई। 73 वर्ष की उम्र में गांधी जी ने अपने जीवन का सबसे ओजस्वी भाषण दिया। उन्होंने स्पष्ट घोषणा की: “मैं आपको एक छोटा सा मंत्र देता हूँ, जिसे आप अपने हृदय पर अंकित कर लें… वह मंत्र है—करो या मरो (Do or Die)। या तो हम भारत को आज़ाद कराएंगे, या इस प्रयास में अपनी जान दे देंगे।”
नेतृत्वविहीन महा-विस्फोट (Leaderless Uprising)
9 अगस्त की सुबह सूरज उगने से पहले ही अंग्रेज़ सरकार ने ‘ऑपरेशन ज़ीरो ऑवर’ चलाकर गांधी जी (पुणे के आगा खान पैलेस में नज़रबंद), नेहरू, पटेल और मौलाना आज़ाद सहित सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेज़ों को लगा कि नेता नहीं होंगे तो आंदोलन कुचल जाएगा, लेकिन इसका परिणाम भयानक हुआ।
- नेतृत्व न होने के कारण पूरा देश आक्रोश के ज्वालामुखी में फट पड़ा। यह एक ‘स्वतः स्फूर्त’ (Spontaneous) जन-विद्रोह बन गया। छात्रों और किसानों ने रेलवे लाइनें उखाड़ दीं, टेलीग्राफ तार काट दिए और सैकड़ों पुलिस थानों पर कब्ज़ा कर लिया।
- समानांतर सरकारें (Parallel Governments): बलिया (चित्तू पांडे के नेतृत्व में), सतारा (नाना पाटिल की ‘पत्री सरकार’), और मिदनापुर के तामलुक (‘जातीय सरकार’) में जनता ने अंग्रेज़ों को भगाकर अपनी स्वतंत्र सरकारें चला लीं जो सालों तक चलीं।
- भूमिगत नायक (Underground Heroes): जब सारे बड़े नेता जेल में थे, तब अरुणा आसफ अली (जिन्होंने 9 अगस्त को तिरंगा फहराया), उषा मेहता (जिन्होंने खुफिया ‘कांग्रेस रेडियो’ चलाया), राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन और जयप्रकाश नारायण (हजारीबाग जेल तोड़कर भागे) जैसे युवा नेताओं ने छुपकर (Underground) इस आंदोलन का संचालन किया।
अंग्रेज़ों ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए सेना बुला ली, निहत्थी भीड़ पर लड़ाकू विमानों से मशीनगन चलवाईं, 1 लाख से ज़्यादा लोगों को जेल में ठूंस दिया और लगभग 10,000 से ज़्यादा लोग शहीद हुए। 1944 तक इस आंदोलन को सैन्य बल से दबा दिया गया हो, लेकिन इसने ब्रिटिश साम्राज्य की कमर तोड़ दी। उधर सुभाष चंद्र बोस की ‘आज़ाद हिंद फौज’ (INA) के हमलों और 1946 के रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह (RIN Mutiny) ने अंग्रेज़ों को समझा दिया कि अब भारतीय सेना भी उनके नियंत्रण में नहीं है।
10. भारत का विभाजन और गांधी जी का अंतिम संघर्ष (1946-1948)
15 अगस्त 1947 को भारत को आज़ादी तो मिली, लेकिन वह आज़ादी विभाजन (Partition) की भारी कीमत और सांप्रदायिक दंगों के खून से सनी हुई थी। मोहम्मद अली जिन्ना की ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ (16 अगस्त 1946) की घोषणा के बाद पूरे देश, विशेषकर बंगाल और पंजाब में भयानक हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे।
- विभाजन का कड़ा विरोध: गांधी जी भारत के विभाजन के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने भारी दुःख के साथ कहा था कि “भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा।” लेकिन जब सांप्रदायिक दंगे बेकाबू हो गए और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने विभाजन को ही एकमात्र रास्ता मान लिया, तो भारी मन से उन्हें इसे स्वीकार करना पड़ा।
- नोआखली का चमत्कार: जब आज़ादी के समय दिल्ली की सत्ता की गलियों में बड़े-बड़े नेता कुर्सियों और सत्ता के बंटवारे पर चर्चा कर रहे थे, तब 77 साल का यह बूढ़ा और कमज़ोर आदमी (गांधी जी) बंगाल के नोआखली (अब बांग्लादेश) के दलदली और खून से सने गांवों में नंगे पैर शांति का संदेश लिए घूम रहा था। वो वहां रुके जहाँ हिंदुओं का कत्लेआम हुआ था, और उन्होंने तब तक अनशन किया जब तक लोगों ने हथियार नहीं डाल दिए।
- कलकत्ता और दिल्ली का उपवास: 15 अगस्त 1947 को गांधी जी दिल्ली के जश्न में शामिल नहीं हुए, बल्कि कलकत्ता में दंगों को शांत कर रहे थे। जब 1948 की शुरुआत में दिल्ली में दंगे भड़के और पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने का विवाद उठा, तो गांधी जी ने अपनी ज़िंदगी का अंतिम आमरण अनशन (13 जनवरी 1948) किया। उनके नैतिक बल के आगे दोनों संप्रदायों को हथियार डालने पड़े।
- लॉर्ड माउंटबेटन (भारत के अंतिम वायसराय) ने गांधी जी के इस अकल्पनीय प्रभाव को देखकर उन्हें “One Man Boundary Force” (एक आदमी की सीमा बल) कहा था, क्योंकि जो काम पंजाब में 50,000 हथियारबंद फौजी नहीं कर पाए, वो काम बंगाल में एक लाठी वाले बूढ़े ने कर दिखाया था।
निष्कर्ष: एक फ़कीर की अमर विरासत
महात्मा गांधी के आंदोलनों की सबसे बड़ी जीत सिर्फ ब्रिटिश राज से आज़ादी हासिल करना नहीं थी, बल्कि करोड़ों हिंदुस्तानियों की अपने अंदर के डर पर जीत थी। जिस आम हिंदुस्तानी को एक ब्रिटिश सिपाही की वर्दी देखकर पसीना आ जाता था, वह गांधी जी के पीछे लाठियां खाने, जेल जाने और सीने पर गोलियां खाने के लिए निडर होकर खड़ा हो गया था।
उन्होंने एक बंटे हुए, जाति-पाति में उलझे, गरीब और डरे हुए देश को ‘सत्याग्रह’ और ‘अहिंसा’ की एक ऐसी डोर में बांधा, जिसने दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य का सूरज हमेशा के लिए डुबा दिया। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे की गोलियों ने भले ही गांधी जी के नश्वर शरीर की हत्या कर दी हो, लेकिन उनके विचार आज भी अमर हैं।
चाहे अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर का नागरिक अधिकार आंदोलन हो, या दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला का रंगभेद विरोधी 27 साल का संघर्ष—पूरी दुनिया ने अन्याय से बिना खून बहाए लड़ने का तरीका महात्मा गांधी के इन्हीं महान आंदोलनों से सीखा है। गांधी सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, सत्य की एक ऐसी आवाज़ हैं जो सदियों तक गूंजती रहेगी।
– महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन (महात्मा गांधी के बारे में)




