कक्षा 9 इतिहास अध्याय – 1 फ्रांसीसी क्रांति (The French Revolution)

French Revolution Class 9 History Chapter 1 Notes and Keywords
Class 9 History Chapter 1 – The French Revolution (फ्रांसीसी क्रांति) के महत्वपूर्ण तथ्य और अवधारणाएँ
Class 9 History Chapter 1 – Detailed Topper’s Notes

कक्षा 9 इतिहास अध्याय 1
फ्रांसीसी क्रांति (The French Revolution)

📌 अध्याय का परिचय (Chapter Introduction)

14 जुलाई 1789 की सुबह पेरिस नगर में आतंक का माहौल था। राजा ने सेना को शहर में घुसने का आदेश दे दिया था। लगभग 7000 मर्द और औरतें टाउन हॉल के सामने इकट्ठे हुए और उन्होंने एक जन-सेना (Peoples’ Militia) बना ली। हथियारों और गोला-बारूद की खोज में उन्होंने बास्तील (Bastille) के किले की जेल को तोड़ दिया। बास्तील का किला राजा की निरंकुश (absolute) शक्तियों का प्रतीक था, इसलिए लोग इससे नफरत करते थे। भीड़ ने किले के कमांडर को मार डाला और वहाँ बंद सभी 7 कैदियों को छुड़ा लिया। किले को ढहा दिया गया और उसके पत्थर/अवशेष बाज़ार में उन लोगों को बेच दिए गए जो इस तबाही को स्मृति चिह्न के रूप में संजोना चाहते थे। यह घटना फ्रांसीसी क्रांति की एक प्रचंड शुरुआत थी।

1. 18वीं सदी के उत्तरार्ध में फ्रांसीसी समाज

1774 में बूर्बों (Bourbon) राजवंश का लुई XVI (Louis XVI) फ्रांस की गद्दी पर बैठा। उसकी उम्र सिर्फ 20 साल थी और उसकी शादी ऑस्ट्रिया की राजकुमारी मैरी एन्तोएनेत (Marie Antoinette) से हुई थी। राज्यारोहण के समय, राजा ने देखा कि फ्रांस का राजकोष (treasury) बिल्कुल खाली था

खजाना खाली होने के मुख्य कारण (Reasons for Empty Treasury):

  • लंबे युद्ध (Long Wars): फ्रांस लगातार कई सालों से युद्ध लड़ रहा था, जिससे उसके वित्तीय संसाधन पूरी तरह नष्ट हो गए थे।
  • वर्साय का महल (Palace of Versailles): राजा के इस विशाल महल की देख-रेख, राजदरबार की शान-ओ-शौकत, सेना के रखरखाव, सरकारी कार्यालयों और विश्वविद्यालयों को चलाने का नियमित खर्च बहुत अधिक था।
  • अमेरिका की मदद: लुई XVI ने अमेरिका के 13 उपनिवेशों (colonies) को उनके साझा दुश्मन ब्रिटेन से आज़ाद करवाने में मदद की। इस युद्ध के कारण फ्रांस पर लगभग 10 अरब लिव्रे (Livres – फ्रांस की तत्कालीन मुद्रा) का कर्ज़ और बढ़ गया, जबकि उस पर पहले से ही 2 अरब लिव्रे का कर्ज़ था।
  • भारी ब्याज (High Interest): जिन ऋणदाताओं ने सरकार को कर्ज़ दिया था, वे अब 10% ब्याज मांग रहे थे। सरकार का बजट सिर्फ कर्ज़ का ब्याज चुकाने में ही खत्म हो रहा था।

समाज का विभाजन (Division of Society – The 3 Estates):

18वीं सदी में फ्रांस का समाज तीन हिस्सों (एस्टेट्स) में बंटा हुआ था। यह ‘पुरानी व्यवस्था’ (Old Regime) का हिस्सा था। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि टैक्स सिर्फ तीसरे एस्टेट के लोग ही देते थे।

  • प्रथम एस्टेट (First Estate – पादरी वर्ग/Clergy): चर्च के लोग। इन्हें जन्म से ही विशेषाधिकार (privileges) मिले हुए थे। इनको राज्य को कोई टैक्स नहीं देना पड़ता था।
  • द्वितीय एस्टेट (Second Estate – कुलीन वर्ग/Nobility): राजा के रिश्तेदार, अमीर लोग और ज़मींदार। इन्हें भी राज्य को टैक्स नहीं देना पड़ता था। इसके अलावा ये किसानों से ‘सामंती कर’ (Feudal dues) भी वसूलते थे।
  • तृतीय एस्टेट (Third Estate – आम जनता): इसमें बड़े व्यवसायी, अदालती कर्मचारी, वकील, किसान, कारीगर, छोटे किसान, और भूमिहीन मज़दूर शामिल थे। फ्रांस की 90% आबादी किसानों की थी (लेकिन ज़मीन के मालिक बहुत कम थे)। सारा टैक्स इन्हीं को भरना पड़ता था।

करों (Taxes) के प्रकार:

  • टाइद (Tithe): यह एक धार्मिक कर था जो चर्च द्वारा किसानों से वसूला जाता था। यह कृषि उपज के 10वें हिस्से (1/10) के बराबर होता था।
  • टाइल (Taille): यह एक प्रत्यक्ष कर (Direct tax) था जो सीधे राज्य (सरकार) को दिया जाता था। इसके अलावा अनेक अप्रत्यक्ष (indirect) टैक्स भी थे जो नमक और तंबाकू जैसी रोज़मर्रा की उपभोग की वस्तुओं पर लगाए जाते थे।

जीने का संघर्ष (The Struggle to Survive / Subsistence Crisis):

1715 में फ्रांस की आबादी 2.3 करोड़ थी, जो 1789 आते-आते 2.8 करोड़ हो गई। आबादी बढ़ने से अनाज की मांग बहुत तेज़ी से बढ़ी, लेकिन उत्पादन उसी रफ्तार से नहीं बढ़ पाया। इसे ‘जीविका संकट का चक्र’ कहा जाता है:

  • ज़्यादातर लोगों का मुख्य खाना पावरोटी (Bread) था, अनाज की कमी से इसकी कीमतें आसमान छूने लगीं।
  • मज़दूर कारखानों में काम करते थे और उनकी मज़दूरी मालिक तय करते थे। महंगाई के हिसाब से मज़दूरी नहीं बढ़ी, जिससे अमीर और गरीब के बीच की खाई और गहरी हो गई।
  • सूखे या ओले के प्रकोप से जब भी फसल खराब होती, तो गरीब लोग पावरोटी नहीं खरीद पाते थे। कमज़ोर शरीर के कारण बीमारियाँ और महामारियां फैलती थीं। यह भुखमरी (Subsistence crisis) की स्थिति थी जो पुरानी व्यवस्था वाले फ्रांस में अक्सर पैदा होती थी।

नए मध्यम वर्ग का उदय (Rise of the Middle Class):

18वीं सदी में एक नए सामाजिक समूह का उदय हुआ जिसे ‘मध्यम वर्ग’ (Middle Class) कहा गया। इन्होंने ऊनी और रेशमी कपड़ों के उत्पादन तथा समुद्री व्यापार से बहुत पैसा कमाया था। इनमें वकील और प्रशासनिक अधिकारी भी थे जो पढ़े-लिखे थे। इनका स्पष्ट मानना था कि समाज में किसी भी समूह को जन्म के आधार पर विशेषाधिकार (birth privileges) नहीं मिलने चाहिए, बल्कि किसी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत का आधार उसकी योग्यता होनी चाहिए।

🧠 दार्शनिकों का प्रभाव (Role of Philosophers)

इन महान दार्शनिकों ने लोगों को आज़ादी, समान नियमों और समान अवसरों का विचार दिया:

  • जॉन लॉक (John Locke): अपनी पुस्तक “Two Treatises of Government” में उसने राजा के दैवीय और निरंकुश (absolute) अधिकारों के सिद्धांत को सिरे से खारिज कर दिया।
  • रूसो (Jean Jacques Rousseau): उसने लॉक के विचार को आगे बढ़ाते हुए प्रस्ताव रखा कि सरकार जनता और उसके प्रतिनिधियों के बीच एक ‘सामाजिक अनुबंध’ (Social Contract) पर आधारित होनी चाहिए।
  • मॉन्टेस्क्यू (Montesquieu): अपनी पुस्तक “The Spirit of the Laws” में उसने सरकार के अंदर सत्ता के केंद्रीकरण का विरोध किया और शक्तियों के विभाजन (विधायिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका के बीच) की मांग की। (जब अमेरिका के 13 उपनिवेश आज़ाद हुए, तो उन्होंने इसी मॉडल को अपनाया था)।

इन दार्शनिकों के विचारों पर कॉफी हाउसों और सैलूनों की गोष्ठियों में गरमागरम बहस होती थी। जो लोग पढ़-लिख नहीं सकते थे, उनके लिए इन पुस्तकों और अख़बारों को ज़ोर-ज़ोर से पढ़ा जाता था ताकि वे भी इन क्रांतिकारी विचारों को समझ सकें।

2. क्रांति की शुरुआत (The Outbreak of the Revolution)

पुराने राजतंत्र में फ्रांसीसी सम्राट अपनी मर्जी से कर (tax) नहीं लगा सकता था। नए करों के प्रस्ताव को मंज़ूरी देने के लिए उसे एस्टेट्स जेनरल (Estates General) की मीटिंग बुलानी पड़ती थी (यह एक राजनीतिक संस्था थी जिसमें तीनों एस्टेट अपने-अपने प्रतिनिधि भेजते थे)। अंतिम बार यह बैठक 1614 में बुलाई गई थी!

एस्टेट्स जेनरल की बैठक (5 मई 1789):

  • लुई XVI ने नए करों का प्रस्ताव पारित करने के लिए वर्साय के एक आलीशान भवन में मीटिंग बुलाई। प्रथम और द्वितीय एस्टेट ने 300-300 प्रतिनिधि भेजे, जो आमने-सामने की कतारों में बैठे।
  • तीसरे एस्टेट ने 600 प्रतिनिधि भेजे जिन्हें पीछे खड़ा रखा गया। तीसरे एस्टेट का प्रतिनिधित्व इसके पढ़े-लिखे और समृद्ध लोग कर रहे थे (किसानों, औरतों और कारीगरों का प्रवेश वर्जित था)। इनके साथ 40,000 पत्रों का एक पुलिंदा था जिसमें आम जनता की मांगें और शिकायतें दर्ज थीं।
  • मतदान का नियम (Voting Rule): पिछले नियमों के अनुसार हर एस्टेट का 1 वोट होता था। लेकिन इस बार तीसरे एस्टेट ने मांग की कि पूरी असेंबली एक साथ मतदान करे, जिसमें हर सदस्य का 1 वोट हो। (यह रूसो द्वारा ‘द सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ में दिया गया लोकतांत्रिक सिद्धांत था)।
  • राजा ने इस लोकतांत्रिक मांग को ठुकरा दिया। इसके विरोध में तीसरे एस्टेट के लोग असेंबली से वॉकआउट कर गए।

टेनिस कोर्ट की शपथ (20 जून 1789):

20 जून को तीसरे एस्टेट के प्रतिनिधि वर्साय के एक इंडोर टेनिस कोर्ट में इकट्ठे हुए। उन्होंने खुद को नेशनल असेंबली (National Assembly) घोषित कर दिया और शपथ ली कि जब तक वे फ्रांस के लिए एक ऐसा नया संविधान नहीं बना लेते जो राजा की शक्तियों पर अंकुश लगाएगा, तब तक वे वहां से नहीं हटेंगे।

इनका नेतृत्व मिराब्यो (Mirabeau) और आबे सीये (Abbé Sieyès) ने किया। मिराब्यो का जन्म एक कुलीन (अमीर) परिवार में हुआ था, लेकिन वह सामंती विशेषाधिकारों को खत्म करने के पक्ष में था। आबे सीये मूलतः एक पादरी था, लेकिन उसने तीसरे एस्टेट की आवाज़ उठाने के लिए ‘तीसरा एस्टेट क्या है?’ (What is the Third Estate?) नाम से एक बेहद प्रभावशाली पम्फलेट (पुस्तिका) लिखा।

आम जनता का विद्रोह (बास्तील पर हमला – 14 जुलाई):

एक तरफ नेशनल असेंबली संविधान का प्रारूप तैयार कर रही थी, दूसरी तरफ पूरा फ्रांस उबल रहा था। कड़ाके की सर्दी के कारण फसल बर्बाद हो गई थी और पावरोटी की कीमतें आसमान छू रही थीं। बेकरी मालिक स्थिति का फायदा उठाकर जमाखोरी कर रहे थे। घंटों लाइन में लगने के बाद, गुस्से में औरतों की भीड़ ने दुकानों पर धावा बोल दिया। इसी बीच राजा ने सेना को पेरिस में घुसने का आदेश दिया। जैसा कि अध्याय की शुरुआत में बताया गया है, 14 जुलाई 1789 को क्रोधित भीड़ ने बास्तील जेल को नेस्तनाबूद कर दिया।

गांवों में ‘महा-भय’ (The Great Fear):

गांवों में यह अफवाह फैल गई कि ज़मींदारों ने भाड़े के लुटेरों के गिरोह बुला लिए हैं जो किसानों की पकी हुई फसलें जलाने आ रहे हैं। इस डर से बौखलाए किसानों ने कुदालों और बेलचों से ज़मींदारों के महलों (Chateaux) पर हमला कर दिया। उन्होंने अन्न के गोदाम लूट लिए और लगान से संबंधित सारे दस्तावेज़ जलाकर राख कर दिए। बहुत से कुलीन लोग अपनी जागीरें छोड़कर पड़ोसी देशों में भाग गए।

परिणाम (Result): अपनी विद्रोही प्रजा की शक्ति का अनुमान लगाकर, लुई XVI डर गया और उसने नेशनल असेंबली को मान्यता दे दी। उसने यह भी मान लिया कि अब उसकी सत्ता पर संविधान का अंकुश होगा। 4 अगस्त 1789 की रात को असेंबली ने एक आदेश पारित किया जिससे सामंती व्यवस्था, करों (tithes), और पादरी वर्ग के सभी विशेषाधिकारों को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। चर्च के स्वामित्व वाली ज़मीनें ज़ब्त कर ली गईं।

3. फ्रांस एक संवैधानिक राजतंत्र बन गया (France Becomes a Constitutional Monarchy)

1791 में नेशनल असेंबली ने संविधान का प्रारूप पूरा कर लिया। इसका मुख्य उद्देश्य राजा की शक्तियों को सीमित करना था। अब शक्ति किसी एक व्यक्ति के हाथ में केंद्रित होने के बजाय, तीन अलग-अलग संस्थाओं में बांट दी गई: विधायिका (Legislature), कार्यपालिका (Executive), और न्यायपालिका (Judiciary)। राजा अब केवल कार्यपालिका का हिस्सा था और उसके पास असेंबली के फैसलों पर सिर्फ ‘वीटो’ (Veto) का अधिकार था।

नागरिकों का विभाजन (सक्रिय बनाम निष्क्रिय):

  • सक्रिय नागरिक (Active Citizens): केवल उन पुरुषों को वोट देने का अधिकार था जिनकी उम्र 25 साल से ऊपर थी और जो कम से कम 3 दिन की मज़दूरी के बराबर टैक्स (कर) भरते थे। (लगभग 2.8 करोड़ की आबादी में से सिर्फ 40 लाख लोग ही सक्रिय नागरिक थे)।
  • निष्क्रिय नागरिक (Passive Citizens): बाकी बचे हुए सारे पुरुष, सभी महिलाएं और बच्चों को वोट देने का कोई राजनीतिक अधिकार नहीं था।

पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणा पत्र:

संविधान की शुरुआत ‘पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणा पत्र’ के साथ हुई। इसमें जीवन का अधिकार (Right to Life), अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech), और कानून के समक्ष समानता (Equality before law) को स्थापित किया गया। इन्हें ‘नैसर्गिक और अहरणीय’ (Natural and inalienable) अधिकार माना गया, अर्थात् ये प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से प्राप्त थे और कोई भी सरकार इन्हें छीन नहीं सकती थी। राज्य का यह सर्वोच्च कर्तव्य था कि वह नागरिकों के इन नैसर्गिक अधिकारों की रक्षा करे।

🎨 राजनीतिक प्रतीक (Political Symbols)

18वीं सदी में फ्रांस में ज़्यादातर पुरुष और महिलाएं पढ़-लिख नहीं सकते थे। इसलिए महत्वपूर्ण विचारों को फैलाने के लिए छपे हुए शब्दों के बजाय प्रतीकों और आकृतियों का उपयोग किया गया:

  • टूटी हुई ज़ंजीर: दासों को आज़ादी मिलने का प्रतीक।
  • छड़ियों का गट्ठर: एकता में ही बल है (Unity is strength)। एक छड़ी को आसानी से तोड़ा जा सकता है, पूरे गट्ठर को नहीं।
  • त्रिभुज के अंदर रोशनी बिखेरती आंख: सर्वदर्शी आंख ज्ञान का प्रतीक है, सूर्य की किरणें अज्ञानता के अंधेरे को मिटा देंगी।
  • राजदंड (Scepter): शाही सत्ता का प्रतीक।
  • अपनी पूंछ मुंह में लिए सांप: सनातनता (Eternity) का प्रतीक – अंगूठी का कोई आदि और अंत नहीं होता।
  • लाल फ़्राइज़ियन टोपी: दासों द्वारा स्वतंत्र होने के बाद पहनी जाने वाली टोपी।
  • नीला-सफ़ेद-लाल: फ्रांस के राष्ट्रीय रंग।
  • पंखों वाली स्त्री: कानून का मानवीय रूप (Personification of Law)।
  • विधि पट (Law Tablet): कानून सबके लिए समान है और उसकी नज़रों में सब बराबर हैं।

4. राजतंत्र का उन्मूलन और गणतंत्र की स्थापना (Abolition of Monarchy and The Republic)

लुई XVI ने संविधान पर हस्ताक्षर तो कर दिए थे, पर स्थिति अभी भी तनावपूर्ण थी। राजा चुपके-चुपके प्रशा (Prussia) के राजा के साथ गुप्त वार्ता कर रहा था और फ्रांस पर हमला करवाने की योजना बना रहा था। पड़ोसी देशों के शासक भी फ्रांस की क्रांति से डरे हुए थे। लेकिन इससे पहले कि वे हमला करते, अप्रैल 1792 में नेशनल असेंबली ने प्रशा और ऑस्ट्रिया के खिलाफ युद्ध (War) की घोषणा कर दी।

प्रांतों से हज़ारों स्वयंसेवक सेना में भर्ती होने के लिए जमा होने लगे। उन्होंने इस युद्ध को ‘यूरोप के राजाओं और कुलीनों के खिलाफ आम जनता की जंग’ के रूप में देखा। स्वयंसेवकों ने देशभक्ति के कई गीत गाए, जिनमें सबसे मशहूर था ‘मार्सिले’ (Marseillaise) जिसे कवि रॉजेट दी लाइल ने लिखा था। यह गीत पहली बार मार्सिले शहर के स्वयंसेवकों ने पेरिस की ओर कूच करते हुए गाया था, इसीलिए इसका नाम ‘मार्सिले’ पड़ा। आज यही फ्रांस का राष्ट्रगान है।

जैकोबिन क्लब और सौं-कुलॉत (Jacobin Club and Sans-culottes):

युद्ध के कारण फ्रांस में बहुत आर्थिक समस्याएं और रोज़मर्रा की चीज़ों की कमी आ गई। लोगों को लगा कि क्रांति को अभी और आगे बढ़ाना ज़रूरी है क्योंकि 1791 का संविधान सिर्फ अमीर वर्ग को ही राजनीतिक अधिकार दे रहा था। इस दौरान राजनीतिक नीतियों पर चर्चा करने के लिए ‘राजनीतिक क्लब’ बनने लगे, जिनमें जैकोबिन क्लब (Jacobin Club) सबसे प्रसिद्ध था। इसका नाम पेरिस के पूर्व कॉन्वेंट ऑफ सेंट जैकब के नाम पर पड़ा था।

  • इसके सदस्य मुख्य रूप से समाज के कम समृद्ध (गरीब) हिस्से से थे – जैसे छोटे दुकानदार, कारीगर (जूता बनाने वाले, पेस्ट्री बनाने वाले, घड़ीसाज़), दिहाड़ी मज़दूर और नौकर।
  • इनका निर्विवाद नेता मैक्सिमिलियन रोबेस्प्येर (Maximilian Robespierre) था।
  • इन्होंने खुद को फैशन-परस्त अमीरों (जो घुटने तक पहनने वाली ‘ब्रीचेस’ या पैंट पहनते थे) से अलग दिखाने के लिए लंबी धारीदार पतलून (जैसे गोदी कामगार पहनते हैं) पहननी शुरू की। इसलिए जैकोबिनों को ‘सौं-कुलॉत’ (Sans-culottes) के नाम से जाना गया, जिसका शाब्दिक अर्थ है “बिना घुटने वाले”। पुरुष आज़ादी दिखाने के लिए लाल टोपी भी पहनते थे, लेकिन महिलाओं को ऐसा करने की अनुमति नहीं थी।

फ्रांस का गणतंत्र बनना (Republic):

गर्मियों में, जैकोबिनों ने पेरिस वालों को भड़काकर एक विशाल हिंसक विद्रोह की योजना बनाई। 10 अगस्त 1792 की सुबह उन्होंने ट्यूलेरिए (Tuileries) के महल पर धावा बोल दिया, राजा के रक्षकों को मार डाला और राजा को कई घंटों तक बंधक बनाए रखा। इसके बाद असेंबली ने शाही परिवार को जेल में डाल देने का प्रस्ताव पारित किया। नए चुनाव कराए गए, जिसमें एक बड़ा बदलाव यह हुआ कि अब 21 साल या उससे अधिक उम्र के सभी पुरुषों को (चाहे उनके पास संपत्ति हो या न हो) वोट देने का अधिकार मिल गया।

नवनिर्वाचित असेंबली को ‘कन्वेंशन’ (Convention) का नाम दिया गया। 21 सितंबर 1792 को कन्वेंशन ने फ्रांस से राजतंत्र (Monarchy) को हमेशा के लिए खत्म कर दिया और फ्रांस को एक गणतंत्र (Republic) घोषित कर दिया। गणतंत्र सरकार का वह रूप है जहाँ जनता सरकार और उसके प्रमुख का चुनाव करती है, यहाँ कोई वंशानुगत राजशाही नहीं होती।

21 जनवरी 1793 को लुई XVI को ‘देशद्रोह’ (Treason) के आरोप में पेरिस के ‘प्लेस डे ला कॉनकोर्ड’ (Place de la Concorde) में सार्वजनिक रूप से गिलोटिन पर चढ़ाकर फांसी दे दी गई। कुछ ही समय बाद रानी मैरी एन्तोएनेत का भी यही हश्र हुआ।

⚔️ आतंक का राज (The Reign of Terror): 1793 – 1794

सन् 1793 से 1794 तक के काल को फ्रांस के इतिहास में ‘आतंक का राज’ कहा जाता है। रोबेस्प्येर ने गणतंत्र की रक्षा के नाम पर नियंत्रण और दंड की अत्यंत सख्त नीति अपनाई।

  • जो भी व्यक्ति उसे ‘गणतंत्र का दुश्मन’ लगता था (जैसे कुलीन, पादरी, अन्य राजनीतिक दलों के सदस्य, या उसकी अपनी पार्टी के वे लोग जो उसके काम करने के तरीके से असहमत थे), उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाता था।
  • एक क्रांतिकारी न्यायालय (Revolutionary Tribunal) द्वारा उन पर मुकदमा चलाया जाता था। यदि अदालत उन्हें दोषी पाती, तो उन्हें तुरंत गिलोटिन (Guillotine) पर चढ़ाकर उनका सिर कलम कर दिया जाता था।
  • (गिलोटिन दो खंभों के बीच लटकती आरी वाली एक मशीन थी जिससे अपराधी का सिर धड़ से अलग कर दिया जाता था। इस मशीन का नाम इसके आविष्कारक डॉ. गिलोटिन के नाम पर रखा गया था)।
  • रोबेस्प्येर की सरकार ने कानून बनाकर मज़दूरी और कीमतों की अधिकतम सीमा तय कर दी। गोश्त और पावरोटी की राशनिंग कर दी गई। किसानों को अपना अनाज शहरों में ले जाकर सरकार द्वारा तय की गई निश्चित कीमतों पर ही बेचने के लिए बाध्य किया गया।
  • महंगे सफ़ेद आटे के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई और सभी नागरिकों के लिए ‘समता रोटी’ (साबुत गेहूं की बनी एक जैसी रोटी) खाना अनिवार्य कर दिया गया।
  • बोलचाल में भी बराबरी लाने के लिए, पारंपरिक ‘महोदय’ (Monsieur) और ‘महोदया’ (Madame) कहने की जगह सभी फ्रांसीसी पुरुषों और महिलाओं को नागरिक (Citoyen) और नागरिका (Citoyenne) कहकर संबोधित किया जाने लगा।
  • चर्चों को बंद कर दिया गया और उनके भवनों को सैन्य बैरकों या दफ़्तरों में तब्दील कर दिया गया।

अंत में, रोबेस्प्येर ने अपनी नीतियों को इतनी सख्ती से लागू किया कि उसके अपने समर्थक भी त्राहि-त्राहि करने लगे और संयम की मांग करने लगे। अंततः जुलाई 1794 में एक न्यायालय ने उसे दोषी ठहराया और 27 जुलाई को गिरफ्तार करके, अगले ही दिन उसे भी उसी गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया जिससे उसने हज़ारों की जान ली थी।

डिरेक्ट्री का शासन (Directory Rules France):

जैकोबिन सरकार के पतन के बाद, सत्ता वापस मध्य वर्ग के संपन्न (अमीर) लोगों के हाथ में आ गई। एक नया संविधान बनाया गया जिसमें समाज के संपत्तिहीन (बिना संपत्ति वाले) तबके से वोट देने का अधिकार फिर से छीन लिया गया। इस नए संविधान में चुनी हुई दो विधान परिषदों (Legislative Councils) का प्रावधान था। इन परिषदों ने 5 सदस्यों वाली एक कार्यपालिका—‘डिरेक्ट्री’ (Directory)—को नियुक्त किया।

ऐसा इसलिए किया गया ताकि जैकोबिनों के समय की तरह सत्ता फिर से एक अकेले व्यक्ति (जैसे रोबेस्प्येर) के हाथ में केंद्रित न हो जाए। लेकिन फ्रांस का दुर्भाग्य यह रहा कि डिरेक्ट्री के सदस्यों और विधान परिषदों के बीच हमेशा टकराव होता रहता था। परिषदें अक्सर डिरेक्ट्री को बर्खास्त करने की कोशिश करती थीं। इस भारी राजनीतिक अस्थिरता ने सेना के एक अति-महत्वाकांक्षी जनरल, नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Bonaparte), के सैन्य तानाशाह के रूप में उदय का रास्ता पूरी तरह साफ़ कर दिया।

5. क्या महिलाओं के लिए भी क्रांति हुई?

महिलाएं शुरू से ही फ्रांसीसी समाज में अहम बदलाव लाने वाली हर गतिविधि में सक्रिय रूप से शामिल थीं। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि उनकी सक्रिय भागीदारी क्रांतिकारी सरकार को उनका जीवन सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करेगी।

  • तीसरे एस्टेट की ज़्यादातर औरतें जीविका चलाने के लिए कपड़े धोती थीं, सिलाई-बुनाई करती थीं, बाज़ारों में सब्ज़ी/फल बेचती थीं, या संपन्न लोगों के घरों में घरेलू नौकरानी का काम करती थीं।
  • उनके पास शिक्षा या व्यावसायिक प्रशिक्षण (job training) तक पहुँचने का कोई अधिकार नहीं था। सिर्फ प्रथम और द्वितीय एस्टेट की लड़कियाँ या तीसरे एस्टेट के अमीर परिवारों की लड़कियाँ ही कॉन्वेंट में पढ़ सकती थीं, और उसके बाद उनकी शादी कर दी जाती थी।
  • कामकाजी औरतों को अपने परिवार का पालन-पोषण भी करना पड़ता था (खाना पकाना, पानी लाना, पावरोटी के लिए लंबी लाइनों में लगना)। सबसे बड़ा भेदभाव यह था कि औरतों की मज़दूरी पुरुषों की तुलना में हमेशा बहुत कम होती थी।

महिलाओं की मांगें और राजनीतिक क्लब:

अपने हितों की वकालत करने और उन पर चर्चा करने के लिए महिलाओं ने अपने अख़बार निकाले और राजनीतिक क्लब शुरू किए। फ्रांस के विभिन्न शहरों में लगभग 60 महिला क्लब बनाए गए, जिनमें “द सोसाइटी ऑफ़ रेवोल्यूशनरी एंड रिपब्लिकन वीमेन” (The Society of Revolutionary and Republican Women) सबसे मशहूर था।

उनकी मुख्य और सबसे बड़ी मांग यह थी कि महिलाओं को भी पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए (1791 के संविधान में उन्हें ‘निष्क्रिय नागरिक’ का दर्ज़ा देकर बहुत निराश किया गया था)। वे मांग कर रही थीं कि उन्हें भी वोट देने का अधिकार मिले, वे भी असेंबली के लिए चुनी जा सकें, और उन्हें भी राजनीतिक पद प्राप्त करने का हक हो।

क्रांति के बाद महिलाओं को मिले अधिकार और संघर्ष:

प्रारंभिक क्रांतिकारी सरकार ने महिलाओं के जीवन में सुधार लाने वाले कुछ कानून ज़रूर बनाए:

  • सरकारी स्कूल बनाए गए और सभी लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा अनिवार्य कर दी गई।
  • पिता अब अपनी बेटियों की मर्जी के खिलाफ उनकी ज़बरदस्ती शादी नहीं करा सकते थे। शादी को अब एक स्वैच्छिक अनुबंध माना गया और उसे नागरिक कानूनों के तहत दर्ज किया जाने लगा।
  • तलाक (Divorce) को कानूनी रूप दे दिया गया और अब पुरुष तथा महिला दोनों इसकी अर्ज़ी दे सकते थे।
  • औरतों को व्यावसायिक प्रशिक्षण लेने, कलाकार बनने और छोटे-मोटे व्यवसाय चलाने की आज़ादी मिल गई।

लेकिन राजनीतिक अधिकारों के लिए महिलाओं का संघर्ष जारी रहा। ‘आतंक के राज’ (Reign of Terror) के दौरान रोबेस्प्येर की सरकार ने महिलाओं के सभी क्लबों को बंद करने और उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने वाले सख्त कानून लागू कर दिए। ओलम्प दे गूंज (Olympe de Gouges) जैसी कई प्रख्यात महिला नेताओं, जिन्होंने 1791 के संविधान का विरोध करते हुए अपना ‘महिला एवं नागरिक अधिकार घोषणा पत्र’ तैयार किया था, को गिरफ्तार कर लिया गया। ओलम्प दे गूंज पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया।

मताधिकार (वोट देने के अधिकार) और समान वेतन के लिए महिलाओं का यह आंदोलन अगली दो सदियों तक पूरी दुनिया में चलता रहा। अंततः, एक बहुत लंबे और कठिन संघर्ष के बाद 1946 में फ्रांस की महिलाओं ने मतदान का अधिकार (Right to Vote) हासिल किया।

6. दास प्रथा का उन्मूलन (The Abolition of Slavery)

जैकोबिन शासन का एक सबसे बड़ा और दूरगामी क्रांतिकारी कदम था – फ्रांसीसी उपनिवेशों (colonies) से दास प्रथा को खत्म करना। कैरेबियाई द्वीप जैसे मार्टिनिक, गॉडेलोप और सैन डोमिंगो – यूरोप में चीनी, कॉफ़ी, और नील (Indigo) के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता थे। पर यूरोपीय लोग उन अपरिचित और दूर देशों में जाकर काम करने के इच्छुक नहीं थे। इस श्रम (मज़दूरों) की कमी को पूरा करने के लिए एक अमानवीय त्रिकोणीय दास व्यापार (Triangular Slave Trade) शुरू हुआ जो यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका के बीच 17वीं सदी में शुरू हुआ था।

  • फ्रांसीसी व्यापारी बोर्दो (Bordeaux) और नांते (Nantes) जैसे बंदरगाह शहरों से अफ्रीका के पश्चिमी तटों पर जाते थे, वहाँ वे स्थानीय सरदारों (Chieftains) से दासों (इंसानों) को खरीदते थे।
  • इन दासों को जानवरों की तरह दागा जाता था (branding) और उन्हें हथकड़ियाँ पहनाकर जहाज़ों में तीन महीने की लंबी समुद्री यात्रा (अटलांटिक महासागर पार करके कैरेबियन तक) के लिए कसकर ठूंस दिया जाता था। अमेरिका पहुँचकर इन्हें बागान मालिकों को भारी मुनाफे पर बेच दिया जाता था। फ्रांस के इन बंदरगाह शहरों की आर्थिक समृद्धि इसी क्रूर दास व्यापार पर टिकी थी।
  • 18वीं सदी में फ्रांस में इस प्रथा की बहुत निंदा हुई। नेशनल असेंबली में इस बात पर लंबी बहसें हुईं कि क्या ‘मनुष्य के अधिकार’ फ्रांस के उपनिवेशों में रहने वाली प्रजा पर भी लागू होने चाहिए। लेकिन असेंबली ने दास प्रथा के खिलाफ कोई कानून पास नहीं किया क्योंकि दास व्यापार पर निर्भर बड़े व्यवसायी इसका कड़ा विरोध कर रहे थे और सरकार उनका समर्थन खोना नहीं चाहती थी।
  • अंत में 1794 में कन्वेंशन (जैकोबिन सरकार) ने एक ऐतिहासिक कानून पास किया जिसके तहत फ्रांसीसी उपनिवेशों के सभी दासों को आज़ाद कर दिया गया। पर यह आज़ादी सिर्फ 10 साल तक ही टिक पाई।
  • जब नेपोलियन सत्ता में आया, तो उसने 1804 में दास प्रथा फिर से शुरू कर दी (ताकि बागान मालिकों को खुश कर सके)। बागान मालिकों को अपने आर्थिक हितों को साधने के लिए अफ्रीकी निग्रो (Negroes) लोगों को गुलाम बनाने की पूरी स्वतंत्रता मिल गई।
  • अंतिम रूप से, फ्रांसीसी उपनिवेशों से दास प्रथा का पूर्ण और स्थायी उन्मूलन 1848 में किया गया।

7. क्रांति और रोज़ाना की ज़िंदगी (The Revolution and Everyday Life)

क्या राजनीति लोगों के पहनने के तरीके, उनकी बोलचाल की भाषा, और उनकी पढ़ने वाली किताबों को बदल सकती है? 1789 के बाद फ्रांस के पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के रोज़मर्रा के जीवन में वास्तव में ऐसे कई बड़े बदलाव आए। क्रांतिकारी सरकारों ने ‘स्वतंत्रता और समानता’ के आदर्शों को रोज़मर्रा के व्यवहार में उतारने के लिए कई कानून बनाए।

  • सेंसरशिप की समाप्ति (Abolition of Censorship): बास्तील के पतन (1789) के ठीक बाद जो सबसे महत्वपूर्ण कानून लागू हुआ, वह था सेंसरशिप का अंत। पुराने राजतंत्र में कोई भी किताब, अख़बार, या नाटक राजा के सेंसर अधिकारियों की मंज़ूरी के बिना प्रकाशित या मंचित नहीं हो सकता था। लेकिन 1789 के ‘पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणा पत्र’ ने भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech and Expression) को एक नैसर्गिक अधिकार घोषित कर दिया।
  • परिणामस्वरूप, फ्रांस के शहरों और गांवों दोनों जगह अख़बारों, पर्चों (pamphlets), किताबों और छपे हुए चित्रों की बाढ़ आ गई। इन सभी में फ्रांस में हो रहे राजनीतिक और सामाजिक बदलावों की निरंतर चर्चा होती थी।
  • अब किसी भी घटना पर विरोधी विचार व्यक्त करना संभव था। नाटकों, गीतों, और उत्सवी जुलूसों में हज़ारों की संख्या में लोग शामिल होने लगे। यह स्वतंत्रता, न्याय और समानता के जटिल राजनीतिक दार्शनिक विचारों को आम जनता तक पहुँचाने और उन्हें समझने का एक बेहद लोकप्रिय तरीका बन गया, क्योंकि मुट्ठी भर शिक्षित लोगों के अलावा हर कोई मोटी-मोटी किताबें नहीं पढ़ सकता था।

🌟 निष्कर्ष और क्रांति की विरासत (Conclusion & Legacy)

1804 में नेपोलियन बोनापार्ट ने खुद को फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया और पुराने राजतंत्र को एक तरह से वापस ले आया। उसने पड़ोसी यूरोपीय देशों को जीतना शुरू किया और वहाँ के पुराने राजवंशों को बेदखल कर नए राज्य बनाए, जिनकी बागडोर उसने अपने परिवार के सदस्यों को सौंप दी। नेपोलियन खुद को यूरोप के आधुनिकीकरण का अग्रदूत मानता था। उसने निजी संपत्ति की सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनाए और दशमलव पद्धति (Decimal System) पर आधारित नाप-तौल की एक समान प्रणाली लागू की। शुरुआत में आम लोग उसे ‘मुक्तिदाता’ मानते थे जो उन्हें आज़ादी दिलाएगा, पर जल्द ही लोगों को सच्चाई समझ आ गई और उसकी सेना को हर जगह एक हमलावर के रूप में देखा जाने लगा। अंततः 1815 में वाटरलू (Waterloo) के युद्ध में उसकी करारी हार हुई। लेकिन नेपोलियन के कई आधुनिक कानूनों का प्रभाव उसके पतन के बाद भी लंबे समय तक यूरोप पर बना रहा।

विरासत (The Legacy): फ्रांसीसी क्रांति की सबसे महान और अमूल्य विरासत थे “स्वतंत्रता और जनवादी अधिकारों के विचार” (Ideas of Liberty and Democratic Rights)। ये विचार 19वीं सदी में फ्रांस से निकल कर पूरे यूरोप और दुनिया के कोने-कोने में फैले। इन्हीं विचारों के कारण यूरोप में सदियों पुरानी सामंती व्यवस्था (Feudal System) का नाश हुआ। उपनिवेशों (colonies) में रहने वाले लोगों ने भी एक संप्रभु राष्ट्र-राज्य स्थापित करने के लिए ‘स्वतंत्रता’ के इस फ्रांसीसी विचार को अपने स्वतंत्रता आंदोलनों में शामिल किया। भारत में, टीपू सुल्तान और राजा राममोहन रॉय ऐसे दो प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरण हैं जिन्होंने फ्रांसीसी क्रांति में उपजे इन नए क्रांतिकारी विचारों का स्वागत किया और उनसे बहुत अधिक प्रभावित हुए।

Manikant kumar Yadav
Manikant kumar Yadav

नमस्कार! मैं हूँ SelfShiksha का संस्थापक, और मेरा मकसद है शिक्षा को आसान बनाना। इस वेबसाइट के माध्यम से मैं छात्रों को बोर्ड परीक्षा, प्रतियोगी परीक्षा और करियर से जुड़ी सटीक जानकारी प्रदान करता हूँ, ताकि हर छात्र अपनी मंज़िल पा सके।

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