केंद्र-राज्य संबंध(Centre-State Relations)

📚 भारतीय राजव्यवस्था (Indian Polity)

केंद्र-राज्य संबंध
(Centre-State Relations)

भारतीय संविधान के सबसे महत्वपूर्ण और दिलचस्प विषय का महा-विस्तृत विश्लेषण! 🇮🇳⚖️
कल्पना कीजिए एक बहुत बड़े संयुक्त परिवार की…

इस परिवार में एक दादाजी (केंद्र सरकार – Centre) हैं जो पूरे परिवार की सुरक्षा, पैसे और बाहर के मामलों को देखते हैं। परिवार में कई बेटे (राज्य सरकारें – States) भी हैं, जो अपने-अपने कमरों (राज्यों) में साफ-सफाई, बच्चों की पढ़ाई और रोज़मर्रा के खर्चे खुद संभालते हैं।

जब तक सब अपना-अपना काम कर रहे हैं, परिवार खुशी से चलता है। लेकिन क्या हो अगर किसी बात पर दादाजी और बेटों के बीच बहस हो जाए? या दो भाइयों (राज्यों) के बीच ज़मीन या पानी को लेकर झगड़ा हो जाए? तब इस परिवार के बनाए गए नियम (संविधान) काम आते हैं!

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं। इतने विशाल देश को एक साथ जोड़े रखने के लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का एक बहुत ही शानदार बँटवारा किया है। इसे ही हम ‘केंद्र-राज्य संबंध’ कहते हैं।
संविधान के भाग: मुख्य रूप से भाग XI (11) और XII (12) में इन संबंधों का वर्णन है।
अनुसूची: संविधान की 7वीं अनुसूची (7th Schedule) में शक्तियों का बँटवारा 3 सूचियों में किया गया है।
अनुच्छेद (Articles): अनुच्छेद 245 से लेकर 293 तक केंद्र-राज्य संबंधों की विस्तार से चर्चा की गई है।
संघवाद (Federalism): भारत का संविधान ‘अर्ध-संघीय’ (Quasi-Federal) है, जहाँ केंद्र राज्यों से अधिक ताकतवर है।

1. संघवाद (Federalism): भारत का अनोखा ढांचा

भारत एक बहुत ही विविध (Diverse) देश है। यहाँ अलग-अलग भाषाएं, धर्म और संस्कृतियां हैं। ऐसे में दिल्ली में बैठी एक ही सरकार पूरे देश के हर छोटे गाँव की समस्या नहीं सुलझा सकती। इसलिए हमारे संविधान ने ‘संघीय व्यवस्था’ (Federal System) अपनाई, जिसमें देश में दो स्तर की सरकारें होती हैं— एक पूरे देश के लिए (केंद्र सरकार) और दूसरी हर राज्य के लिए (राज्य सरकार)।

संविधान का अनुच्छेद 1 (Article 1) कहता है: “भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का एक संघ (Union of States) होगा।” इसका मतलब है कि भारत के राज्य किसी समझौते के तहत नहीं जुड़े हैं, बल्कि वे भारत का अटूट हिस्सा हैं, और किसी भी राज्य को भारत से अलग होने का अधिकार नहीं है।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर का नज़रिया: संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि, “हमारा संविधान समय और परिस्थिति के अनुसार संघीय (Federal) और एकात्मक (Unitary) दोनों रूपों में काम कर सकता है।” मशहूर विद्वान के.सी. व्हीयर (K.C. Wheare) ने भी इसीलिए भारत को ‘अर्ध-संघीय’ (Quasi-Federal) कहा है।

केंद्र और राज्यों के बीच के संबंधों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है:

2. विधायी संबंध (Legislative Relations) – कानून कौन बनाएगा?

विधायी संबंधों का वर्णन संविधान के भाग XI के अनुच्छेद 245 से 255 तक किया गया है। इसका सीधा सा मतलब है कि किस विषय पर कानून बनाने का अधिकार संसद (केंद्र) को है, और किस पर विधानसभा (राज्य) को। झगड़े से बचने के लिए, संविधान की 7वीं अनुसूची (7th Schedule) में तीन अलग-अलग सूचियाँ (Lists) बनाई गई हैं:

  • संघ सूची (Union List): इसमें वे विषय हैं जो पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण हैं और जिन पर एक जैसा कानून होना ज़रूरी है। इस सूची के विषयों पर केवल केंद्र सरकार (संसद) ही कानून बना सकती है। वर्तमान में इसमें 98 विषय हैं (मूल रूप से 97)।
    उदाहरण: देश की रक्षा (Defence), विदेशी मामले, रेलवे, डाक-तार, बैंकिंग, और परमाणु ऊर्जा। (कल्पना करें अगर हर राज्य की अपनी अलग सेना या अलग रेलवे होती, तो कितनी गड़बड़ होती!)
  • राज्य सूची (State List): इसमें वे विषय हैं जो स्थानीय या राज्य स्तर की ज़रूरतों से जुड़े हैं। सामान्य परिस्थितियों में इन पर केवल राज्य सरकार ही कानून बनाती है। वर्तमान में इसमें 59 विषय हैं (मूल रूप से 66)।
    उदाहरण: पुलिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य (अस्पताल), कृषि (Agriculture), स्थानीय स्वशासन (Panchayats), और जेल। (हर राज्य की अपनी अलग पुलिस होती है)।
  • समवर्ती सूची (Concurrent List): यह सबसे दिलचस्प सूची है! इसमें वे विषय हैं जो केंद्र और राज्य दोनों के लिए ज़रूरी हैं। इस सूची पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। इसमें वर्तमान में 52 विषय हैं (मूल रूप से 47)।
    उदाहरण: शिक्षा (Education), जंगल (Forests), विवाह और तलाक, और बिजली।
    लेकिन अगर टकराव हो जाए तो? अगर किसी एक ही विषय (मान लीजिए शिक्षा) पर केंद्र और राज्य दोनों ने अलग-अलग कानून बना दिए, तो हमेशा केंद्र का कानून ही माना जाएगा और राज्य का कानून रद्द हो जाएगा!
अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) – अनुच्छेद 248
जब 1950 में संविधान बना था, तब इंटरनेट, साइबर क्राइम या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी चीज़ें नहीं थीं। तो इन नए विषयों पर कानून कौन बनाएगा? ऐसे सभी नए विषय जो तीनों सूचियों में से किसी में भी नहीं हैं, उन्हें ‘अवशिष्ट शक्तियां’ कहा जाता है, और इन पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद (केंद्र) को दिया गया है।

अपवाद: जब केंद्र राज्य की सूची पर भी कानून बना दे!

भारत के संविधान की सबसे अनोखी बात यह है कि केंद्र सरकार 5 विशेष परिस्थितियों में राज्य सूची (State List) के विषयों पर भी कानून बना सकती है:

  1. राष्ट्रीय हित में (अनुच्छेद 249): अगर राज्यसभा 2/3 बहुमत से यह प्रस्ताव पास कर दे कि किसी राज्य सूची के विषय पर राष्ट्रीय हित में कानून बनाना ज़रूरी है।
  2. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान (अनुच्छेद 250): जब देश में इमरजेंसी लगी हो।
  3. राज्यों के अनुरोध पर (अनुच्छेद 252): जब दो या दो से अधिक राज्य खुद संसद से कहें कि हमारे लिए कानून बना दो।
  4. अंतर्राष्ट्रीय संधियों को लागू करने के लिए (अनुच्छेद 253): अगर भारत सरकार ने किसी दूसरे देश के साथ कोई समझौता किया है, तो उसे लागू करने के लिए संसद राज्य सूची पर भी कानून बना सकती है।
  5. राष्ट्रपति शासन के दौरान (अनुच्छेद 356): जब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाता है, तो उस राज्य की विधानसभा की सारी ताकत संसद के पास आ जाती है।

3. प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations) – सरकार कैसे चलेगी?

प्रशासनिक संबंधों का ज़िक्र भाग XI के अनुच्छेद 256 से 263 के बीच है। कानून बनाना ही काफी नहीं है, उन्हें लागू करना (Administration) भी ज़रूरी है। यहाँ भी हमारा संविधान केंद्र को राज्यों के मुकाबले अधिक शक्तिशाली बनाता है।

  • राज्यों को केंद्र का निर्देश (Article 256 & 257): राज्य सरकारों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे अपनी कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग इस तरह करें कि संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन हो। केंद्र सरकार राज्यों को राष्ट्रीय राजमार्गों (Highways) को बनाए रखने और रेलवे संपत्ति की सुरक्षा के लिए निर्देश दे सकती है। अगर राज्य केंद्र के इन निर्देशों को नहीं मानते हैं, तो अनुच्छेद 365 के तहत उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है!
  • राज्यपाल की दोहरी भूमिका (The Governor): राज्यपाल राज्य का मुखिया होता है, लेकिन उसकी नियुक्ति सीधे राष्ट्रपति करते हैं।
    अनुच्छेद 200 (विवाद का बड़ा कारण): राज्यपाल के पास यह शक्ति है कि वह राज्य विधानसभा द्वारा पास किए गए किसी भी बिल को राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए रोक सकता है। कई बार राज्य सरकारें आरोप लगाती हैं कि राज्यपाल केंद्र सरकार के इशारे पर उनके काम रोक रहे हैं।
  • अखिल भारतीय सेवाएँ (All India Services – Article 312): IAS, IPS और IFS अधिकारी पूरे देश के प्रशासन की रीढ़ होते हैं। इनकी परीक्षा और भर्ती UPSC (केंद्र) द्वारा की जाती है, लेकिन ये अधिकारी राज्यों में जाकर काम करते हैं। इन पर राज्य सरकार का तुरंत नियंत्रण होता है (जैसे ट्रांसफर करना), लेकिन इन्हें नौकरी से निकालने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार (राष्ट्रपति) के पास होता है!
  • केंद्र का कर्तव्य (Article 355): यह अनुच्छेद केंद्र सरकार को यह जिम्मेदारी देता है कि वह हर राज्य की बाहरी आक्रमण (External aggression) और आंतरिक अशांति (Internal disturbance) से रक्षा करे।
अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council) – अनुच्छेद 263

विवादों को सुलझाने और नीतियों में तालमेल बिठाने के लिए, अनुच्छेद 263 के तहत राष्ट्रपति ने 1990 में (सरकारिया आयोग की सिफारिश पर) ‘अंतर-राज्यीय परिषद’ का गठन किया।

इस परिषद के अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री (PM) होते हैं, और सभी राज्यों के मुख्यमंत्री (CM) इसके सदस्य होते हैं। यह एक ऐसा मंच है जहाँ सब मिलकर बैठकर देश की समस्याओं का हल निकालते हैं। इसी तरह नदियों के पानी के झगड़े सुलझाने के लिए अनुच्छेद 262 के तहत ‘जल विवाद न्यायाधिकरण’ (Water Disputes Tribunal) बनाए जाते हैं।

4. वित्तीय संबंध (Financial Relations) – पैसा किसके पास आएगा?

वित्तीय संबंधों की चर्चा संविधान के भाग XII (अनुच्छेद 268 से 293) में है। भारत में टैक्स (Tax) लगाने और पैसे बांटने का सिस्टम बहुत ही जटिल लेकिन व्यवस्थित है।

  • टैक्स का बँटवारा: कुछ टैक्स केंद्र लगाता है और खुद रखता है (कॉर्पोरेट टैक्स)। कुछ टैक्स राज्य लगाते हैं और खुद रखते हैं (शराब पर उत्पाद शुल्क, ज़मीन पर स्टाम्प ड्यूटी)। और कुछ टैक्स केंद्र लगाता है लेकिन पैसे केंद्र और राज्य दोनों में बंट जाते हैं (इनकम टैक्स)।
  • जीएसटी और GST परिषद (Article 279A): 2017 में 101वें संविधान संशोधन के जरिए GST लागू किया गया। इसने वित्तीय संबंधों में क्रांति ला दी! GST परिषद (GST Council) एक बहुत ही ताकतवर संस्था है जो तय करती है कि किस सामान पर कितना टैक्स लगेगा।
    वोटिंग कैसे होती है? इसमें केंद्र सरकार का वोट मूल्य 1/3 (One-third) होता है और सभी राज्यों का मिलाकर वोट मूल्य 2/3 (Two-third) होता है। कोई भी फैसला पास करने के लिए 75% बहुमत चाहिए होता है। यानी केंद्र और राज्य दोनों को मिलकर काम करना ही पड़ता है!
  • उधार लेने की शक्ति (Borrowing Power – Art 292, 293): केंद्र सरकार देश के अंदर और बाहर (विदेशों से) कहीं से भी उधार ले सकती है। लेकिन राज्य सरकारें विदेशों से सीधे कर्ज नहीं ले सकतीं। वे केवल भारत के भीतर से उधार ले सकती हैं, और अगर राज्य पर पहले से केंद्र का कोई कर्ज बकाया है, तो नया कर्ज लेने के लिए केंद्र की अनुमति लेनी पड़ती है!
वित्त आयोग (Finance Commission) – अनुच्छेद 280

केंद्र सरकार जो भी टैक्स वसूलती है (Divisible Pool), उसमें से राज्यों को कितना हिस्सा मिलेगा? इसके लिए राष्ट्रपति हर 5 साल में ‘वित्त आयोग’ बनाते हैं। यह आयोग राज्य की जनसंख्या, उसका क्षेत्रफल (Area), वन क्षेत्र (Forest cover), और उसकी गरीबी (Income distance) को नापता है और फिर तय करता है कि किसे कितना पैसा मिलेगा।
वर्तमान में 16वें वित्त आयोग का गठन किया गया है जिसके अध्यक्ष डॉ. अरविंद पनगढ़िया हैं। (इससे पहले 15वें वित्त आयोग ने राज्यों को 41% हिस्सा देने की सिफारिश की थी)।

5. आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions)

आपातकाल आते ही भारत का संविधान पूरी तरह से ‘एकात्मक’ (Unitary) बन जाता है, यानी सारी पावर केंद्र के पास आ जाती है।

  • राष्ट्रीय आपातकाल (Article 352): जब देश पर युद्ध या सशस्त्र विद्रोह का खतरा हो। ऐसे में संसद राज्य सूची के किसी भी विषय पर पूरे देश के लिए कानून बना सकती है। (भारत में अब तक 3 बार लगा है: 1962, 1971, 1975)।
  • राष्ट्रपति शासन (State Emergency – Article 356): यह केंद्र-राज्य संबंधों का सबसे विवादित हिस्सा है। अगर राज्य की सरकार संविधान के अनुसार नहीं चल रही है, तो राष्ट्रपति राज्य सरकार को बर्खास्त कर सकते हैं। आज़ादी के बाद से इसका 100 से ज़्यादा बार इस्तेमाल (कई बार राजनीतिक फायदे के लिए) किया गया!
  • ऐतिहासिक फैसला: एस. आर. बोम्मई केस (S.R. Bommai Case – 1994)
    सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले ने अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर हमेशा के लिए रोक लगा दी! सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:
    1. राष्ट्रपति शासन की कोर्ट में न्यायिक जांच (Judicial Review) हो सकती है।
    2. अगर राष्ट्रपति शासन गलत नीयत से लगाया गया है, तो सुप्रीम कोर्ट बर्खास्त की गई राज्य सरकार को दोबारा ज़िंदा कर सकता है!
    3. राज्य सरकार के पास बहुमत है या नहीं, इसका फैसला राजभवन में नहीं, बल्कि विधानसभा के ‘फ्लोर टेस्ट’ (Floor Test) में होगा।
  • वित्तीय आपातकाल (Article 360): अगर देश के पास पैसे बिल्कुल खत्म हो जाएं। इसमें केंद्र सरकार राज्यों के बजट को कंट्रोल कर सकती है और सरकारी कर्मचारियों (जजों सहित) की सैलरी काट सकती है। (भारत में आज तक यह कभी नहीं लगा है)।

6. विवाद सुधारने के प्रयास (Commissions & Committees)

समय-समय पर अधिकारों को लेकर झगड़े होते रहे हैं। इन संबंधों को सुधारने के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण समितियां बनाई हैं:

  • राजमन्नार समिति (Rajamannar Committee – 1969): तमिलनाडु की राज्य सरकार ने इसे बनाया था। इसने बहुत क्रांतिकारी सुझाव दिए थे, जैसे कि IAS और IPS को पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए और अनुच्छेद 356 को हटा देना चाहिए! (हालांकि केंद्र ने इसे नहीं माना)।
  • सरकारिया आयोग (Sarkaria Commission – 1983): जस्टिस आर.एस. सरकारिया के इस आयोग ने 247 सिफारिशें दीं। इसने कहा था कि राज्यपाल बाहरी व्यक्ति होना चाहिए (उसी राज्य का नहीं), और अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल सिर्फ अंतिम विकल्प (Last resort) के रूप में होना चाहिए।
  • पुंछी आयोग (Punchhi Commission – 2007): मदन मोहन पुंछी आयोग ने कहा कि अगर कोई राज्य सरकार ठीक से काम नहीं कर रही, तो पूरे राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की बजाय सिर्फ कुछ हिस्सों या जिलों में (Localized Emergency) आपातकाल लगाना चाहिए।
निष्कर्ष (Conclusion): ‘सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद’

भारत नाम का यह विशाल और खूबसूरत रथ तभी आगे बढ़ सकता है जब इसके दोनों पहिए— केंद्र और राज्य— मिलकर एक ही दिशा में चलें। इसी सोच को ‘सहकारी संघवाद’ (Cooperative Federalism) कहा जाता है!

आजकल नीति आयोग (NITI Aayog) जैसी संस्थाएं ‘टीम इंडिया’ की भावना को बढ़ावा दे रही हैं। अब नया कॉन्सेप्ट ‘प्रतिस्पर्धी संघवाद’ (Competitive Federalism) का भी आ गया है, जहाँ राज्य आपस में विकास (जैसे इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस, स्वच्छता) के लिए स्वस्थ प्रतियोगिता करते हैं।

संविधान निर्माताओं ने एक बहुत ही संतुलन वाला ढांचा हमें दिया है। ज़रूरत है कि केंद्र बड़े भाई की तरह राज्यों की मदद करे, और राज्य देश की अखंडता और विकास के लिए केंद्र का सहयोग करें! 🇮🇳✨
आशा है केंद्र-राज्य संबंधों का यह महा-विस्तृत, ऐतिहासिक और रोचक विश्लेषण आपको पूरी तरह समझ आ गया होगा!
Manikant kumar Yadav
Manikant kumar Yadav

नमस्कार! मैं हूँ SelfShiksha का संस्थापक, और मेरा मकसद है शिक्षा को आसान बनाना। इस वेबसाइट के माध्यम से मैं छात्रों को बोर्ड परीक्षा, प्रतियोगी परीक्षा और करियर से जुड़ी सटीक जानकारी प्रदान करता हूँ, ताकि हर छात्र अपनी मंज़िल पा सके।

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