आधुनिक भारत का इतिहास (Modern History of India)

Modern Indian History – Vistrit Chapter 1

आधुनिक भारत का इतिहास

अध्याय 1: यूरोपीय कंपनियों का भारत आगमन

(Comprehensive Detail – All Facts Included)

📌

सार (Excerpt)

“आधुनिक भारत का इतिहास मुख्य रूप से व्यापार के बहाने आई यूरोपीय शक्तियों और उनके बीच हुए वर्चस्व के खूनी संघर्ष की कहानी है। 1498 में वास्को डी गामा के भारत आगमन के साथ पुर्तगालियों ने जो समुद्री रास्ता खोला, उस पर डच, अंग्रेज़, डेनिश और फ्रांसीसी भी चल पड़े। मसालों और सूती वस्त्रों के इस अत्यधिक लाभदायक व्यापार ने इन शक्तियों के बीच भयंकर युद्धों (जैसे कर्नाटक युद्ध, वेदरा और वांडीवाश) को जन्म दिया। अंततः, अपनी मजबूत नौसेना, कुशल कूटनीति और स्थिर ढांचे के बल पर ‘ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी’ ने सभी प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ कर भारत पर अपना एकछत्र राज स्थापित किया।”

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)

प्राचीन काल से ही भारत का यूरोप के साथ व्यापारिक संबंध था। यह व्यापार मुख्य रूप से भूमि मार्ग (रेशम मार्ग) और जल मार्ग (लाल सागर व फारस की खाड़ी) से होता था। लेकिन 15वीं शताब्दी में भौगोलिक और राजनीतिक समीकरण बदल गए:

  • 1453 ई. में कुस्तुनतुनिया (Constantinople) का पतन: उस्मानिया तुर्कों (Ottoman Turks) ने कुस्तुनतुनिया (वर्तमान इस्तांबुल) पर अधिकार कर लिया। इससे यूरोप और एशिया के बीच का पुराना व्यापारिक मार्ग बंद हो गया।
  • यूरोप में इस समय ‘पुनर्जागरण’ (Renaissance) चल रहा था। कंपास (दिक्सूचक) और मजबूत जहाजों का निर्माण हो चुका था।
  • यूरोप (विशेषकर ठंड के मौसम में) में मांस को सुरक्षित रखने के लिए काली मिर्च और मसालों की भारी मांग थी, जो भारत और इंडोनेशिया से आते थे।
  • पुर्तगाल और स्पेन की पहल: पुर्तगाल के राजकुमार हेनरी द नेविगेटर (Prince Henry the Navigator) ने समुद्री यात्राओं को भारी प्रोत्साहन दिया।
    • 1487: पुर्तगाली नाविक बार्थोलोमियो डियाज अफ्रीका के दक्षिणी छोर ‘केप ऑफ गुड होप’ (उत्तमाशा अंतरीप) तक पहुँचा।
    • 1492: स्पेन का नाविक क्रिस्टोफर कोलंबस भारत की खोज में निकला लेकिन अमेरिका पहुँच गया।
महत्वपूर्ण तथ्य (Must Remember) आगमन का क्रम vs स्थापना का क्रम:

यहाँ से परीक्षाओं में सीधे प्रश्न बनते हैं। अंग्रेज़ भारत में डचों के बाद आए थे, लेकिन उनकी कंपनी डचों से पहले स्थापित हो गई थी।

भारत आने का क्रम (Arrival Sequence) कंपनी स्थापना का क्रम (Establishment Year)
1. पुर्तगाली (Portuguese) – 1498 1. एस्टाडो दा इंडिया (पुर्तगाली कंपनी) – 1498
2. डच (Dutch) – 1595/96 2. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (अंग्रेज़) – 1600
3. अंग्रेज़ (British) – 1600 3. VOC (डच ईस्ट इंडिया कंपनी) – 1602
4. डेनिश (Danes) – 1616 4. डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी – 1616
5. फ्रांसीसी (French) – 1664 5. कम्पैनी डेस इंडेस ओरिएंटलेस (फ्रांसीसी) – 1664
6. स्वीडिश (Swedish) – 1731 6. स्वीडिश ईस्ट इंडिया कंपनी – 1731
1. पुर्तगाली (The Portuguese)

भारत में सबसे पहले आने वाले (1498) और सबसे अंत में जाने वाले (1961 – ऑपरेशन विजय द्वारा गोवा मुक्ति) पुर्तगाली ही थे। इनकी कंपनी का नाम ‘एस्तादो दा इंडिया’ (Estado da India) था।

वास्को डी गामा (Vasco da Gama) की यात्राएं:

  • प्रथम यात्रा (1498): 17 मई 1498 को अब्दुल मजीद (गुजराती पथ-प्रदर्शक) की सहायता से वास्को डी गामा ‘केप ऑफ गुड होप’ होते हुए केरल के कालीकट (Calicut) बंदरगाह पर ‘साओ गैब्रियल’ नामक जहाज से पहुँचा।
  • यहाँ के हिंदू शासक ज़मोरिन (Zamorin) ने उसका भव्य स्वागत किया (जिसका अरब व्यापारियों ने विरोध किया)।
  • वह अपने साथ जो काली मिर्च और मसाले ले गया, उसे पुर्तगाल में यात्रा खर्च निकालने के बाद भी 60 गुना मुनाफे पर बेचा।
  • दूसरी यात्रा (1502): वास्को डी गामा पुनः भारत आया।
  • तीसरी यात्रा (1524): वह पुर्तगाली वायसराय बनकर आया, लेकिन 1524 में ही ‘कोचीन’ में उसकी मृत्यु हो गई (कोचीन में ही उसकी पहली कब्र बनी, बाद में अवशेष पुर्तगाल ले जाए गए)।

पेड्रो अल्वारेज़ कैब्राल (Pedro Alvares Cabral): 1500 ई. में भारत आने वाला दूसरा पुर्तगाली यात्री।

प्रथम फैक्ट्री: पुर्तगालियों ने अपनी पहली व्यापारिक कोठी 1503 में कोचीन (Cochin) में और दूसरी 1505 में कन्नूर (Cannanore) में स्थापित की।

प्रमुख पुर्तगाली गवर्नर (Key Governors)

  1. फ्रांसिस्को डी अल्मीडा (Francisco de Almeida, 1505-1509):
    • यह भारत में प्रथम पुर्तगाली गवर्नर था।
    • इसने हिंद महासागर पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए शांत जल की नीति (Blue Water Policy) अपनाई। इसका उद्देश्य समुद्र पर एकाधिकार करना था, न कि जमीन पर किले बनाना।
    • 1508 में ‘चौल के युद्ध’ में वह मिस्र, तुर्की और गुजरात की संयुक्त मुस्लिम नौसेना से हार गया (इसमें उसका बेटा मारा गया)।
    • 1509 में ‘दीव के युद्ध’ (Battle of Diu) में उसने इस संयुक्त नौसेना को बुरी तरह हरा दिया और एशिया में पुर्तगाली नौसेना सबसे ताकतवर बन गई।
  2. अल्फांसो डी अल्बुकर्क (Afonso de Albuquerque, 1509-1515):
    • इसे भारत में पुर्तगाली शक्ति का वास्तविक संस्थापक (Real Founder) माना जाता है।
    • 1510 ई. में इसने बीजापुर के शासक यूसुफ आदिल शाह से गोवा छीन लिया। (गोवा आगे चलकर पुर्तगालियों की राजनीतिक और सांस्कृतिक राजधानी बना)।
    • 1511 में मलक्का (दक्षिण-पूर्व एशिया की मंडी) और 1515 में होर्मुज (फारस की खाड़ी) पर अधिकार किया।
    • इसने पुर्तगालियों को भारतीय महिलाओं से विवाह करने के लिए प्रोत्साहित किया ताकि स्थायी पुर्तगाली आबादी बसाई जा सके।
    • इसने अपने क्षेत्र (गोवा) में सती प्रथा (Sati System) पर प्रतिबंध लगा दिया था।
  3. नीनो डी कुन्हा (Nino da Cunha, 1529-1538):
    • इसने 1530 में पुर्तगालियों का मुख्यालय कोचीन से हटाकर गोवा स्थानांतरित कर दिया।
    • गुजरात के शासक बहादुर शाह से धोखे से 1534 में बेसिन (Bassein) और 1535 में दीव (Diu) प्राप्त किया। (बहादुर शाह की समुद्र में डूबने से मौत हो गई थी)।
  4. मार्टिन अल्फांसो डिसूजा (1542-1545):

    इसके समय में प्रसिद्ध जेसुइट संत फ्रांसिस जेवियर (St. Francis Xavier) भारत आए थे।

पुर्तगाली नीतियां और पतन:

  • कार्टेज-अरमाडा-काफिला व्यवस्था (Cartaz System): पुर्तगालियों ने खुद को ‘सागर का स्वामी’ (Lords of the Sea) घोषित किया। अरब सागर में व्यापार करने वाले किसी भी जहाज (यहाँ तक कि मुग़ल सम्राट अकबर के जहाज) को उनसे परमिट या ‘कार्टेज’ (Cartaz) लेना पड़ता था। इसके बिना जहाज लूट लिए जाते थे।
  • पतन के कारण: धार्मिक कट्टरता (जबरन धर्म परिवर्तन), चोरी-डकैती (हुगली को समुद्री लूटपाट का अड्डा बनाया था जिसे 1632 में मुग़ल सूबेदार कासिम खान ने नष्ट किया), ब्राजील की खोज (पुर्तगाल का ध्यान उधर गया), और अन्य यूरोपीय शक्तियों (डच व अंग्रेज़) से हार। 1739 में मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम के सेनापति चिमाजी अप्पा ने उनसे सालसेट और बेसिन छीन लिया।
🌟 भारत को पुर्तगालियों की देन:

भारत में प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत (1556 गोवा में पहली पुस्तक छपी), तंबाकू (Tobacco) की खेती, आलू, टमाटर, पपीता, मक्का, काजू, संतरा, अनानास, लीची और वास्तुकला की गोथिक शैली (Gothic Architecture) पुर्तगालियों की ही देन हैं।

2. डच (The Dutch / Netherlands)

डच नीदरलैंड (हॉलैंड) के निवासी थे। 1596 में पहला डच नागरिक कॉर्नेलियस हाउटमैन (Cornelis de Houtman) भारत (सुमात्रा/बंटम) पहुँचा।

1602 ई. में डच संसद ने एक चार्टर पारित कर विभिन्न डच कंपनियों को मिलाकर यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी ऑफ नीदरलैंड्स (VOC – Vereenigde Oostindische Compagnie) की स्थापना की। यह इतिहास की पहली जॉइंट-स्टॉक (Joint-stock) कंपनी मानी जाती है।

डचों की प्रमुख फैक्ट्रियां:

वर्ष (Year) स्थान (Location) महत्वपूर्ण तथ्य (Facts)
1605 मसूलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश) यह भारत में डचों की पहली व्यापारिक फैक्ट्री थी।
1610 पुलीकट (Pulicat) यहाँ इन्होंने ‘स्वर्ण सिक्के’ ढाले जिन्हें पैगोडा (Pagoda) कहा जाता था। यह उनका मुख्य केंद्र बना।
1616 सूरत (गुजरात) पश्चिमी तट पर प्रमुख केंद्र।
1653 चिनसुरा (बंगाल) यहाँ डचों ने गुस्तावस फोर्ट (Gustavus Fort) का निर्माण करवाया। बंगाल में सबसे बड़ा केंद्र।
1663 कोचीन (केरल) पुर्तगालियों से इसे छीना और फोर्ट विलियम्स बनाया।
महत्वपूर्ण बिंदु और पतन:
  • डचों का मुख्य फोकस भारत की बजाय मसाला द्वीप (इंडोनेशिया) पर था।
  • भारत में उन्होंने मसालों से ज्यादा सूती वस्त्र (Cotton Textiles) के व्यापार को महत्व दिया। भारत को वस्त्र निर्यात का केंद्र बनाने का श्रेय डचों को ही जाता है।
  • इन्होंने सहकारिता (Cartel/Co-operative) प्रणाली पर आधारित व्यापार किया।
  • अंबोयना हत्याकांड (Amboyna Massacre – 1623): इंडोनेशिया में डचों ने 10 अंग्रेज़ों और 9 जापानियों की हत्या कर दी, जिससे डच और अंग्रेज़ों में गहरी दुश्मनी हो गई।
  • कोलाचेल का युद्ध (Battle of Colachel – 1741): त्रावणकोर (केरल) के राजा मार्तंड वर्मा ने डचों को बुरी तरह हराया।
  • ⚔️ वेदरा का युद्ध (Battle of Bedara / Chinsurah – 1759):
    रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने डचों को निर्णायक रूप से पराजित किया। इस हार के बाद डच भारत से पूरी तरह सिमट गए और सिर्फ इंडोनेशिया तक सीमित रह गए।
3. अंग्रेज़ (The British / English East India Company)

1599 ई. में ‘मर्चेंट एडवेंचरर्स’ (Merchant Adventurers) नामक व्यापारियों के एक समूह ने एक कंपनी बनाई जिसका नाम था: Governor and Company of Merchants of London Trading into the East Indies (यही बाद में East India Company कहलाई)।

31 दिसंबर 1600 को महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने एक चार्टर (राजलेख) द्वारा इस कंपनी को पूर्व के देशों के साथ व्यापार करने का 15 वर्षों का एकाधिकार (Monopoly) दे दिया। (ध्यान दें: 1600 ई. में भारत का मुग़ल सम्राट अकबर था, जिसकी मृत्यु 1605 में हुई)।

शुरुआती प्रयास और फैक्ट्रियां:

  • कैप्टन विलियम हॉकिन्स (1608-1611): यह 1608 में ‘हेक्टर’ (या रेड ड्रैगन) नामक जहाज से सूरत पहुँचा। 1609 में यह आगरा में जहाँगीर के दरबार में गया। यह जेम्स प्रथम का पत्र (जो अकबर के नाम था) लेकर आया था। यह तुर्की और फारसी भाषा का जानकार था। जहाँगीर ने खुश होकर इसे 400 का मनसब और ‘इंग्लिश खान’ की उपाधि दी, लेकिन पुर्तगालियों के दबाव के कारण सूरत में फैक्ट्री लगाने की अनुमति नहीं मिली।
  • स्वाली का युद्ध (Battle of Swally Hole – 1612): अंग्रेजी कैप्टन थॉमस बेस्ट (Thomas Best) ने सूरत के पास स्वाली में पुर्तगाली बेड़े को हरा दिया। इससे जहाँगीर अंग्रेज़ों से प्रभावित हुआ।
  • प्रथम फैक्ट्रियां:
    • 1611: अंग्रेज़ों ने अपनी पहली (लेकिन अस्थायी) फैक्ट्री दक्षिण भारत में मसूलीपट्टनम में खोली।
    • 1613: जहाँगीर की अनुमति से सूरत में प्रथम स्थायी फैक्ट्री (First Permanent Factory) स्थापित की गई।
  • सर थॉमस रो (Sir Thomas Roe, 1615-1619): यह जेम्स प्रथम का आधिकारिक राजदूत बनकर जहाँगीर के दरबार (अजमेर) में आया और मुग़ल साम्राज्य के सभी हिस्सों में व्यापार करने और फैक्ट्रियां लगाने का फरमान प्राप्त करने में सफल रहा।
साम्राज्य विस्तार के तीन प्रमुख स्तंभ 🏛️
1. मद्रास (Madras) – 1639:

फ्रांसिस डे (Francis Day) नामक अंग्रेज़ ने चंद्रगिरी के राजा से मद्रास को पट्टे (Lease) पर लिया। यहीं पर अंग्रेज़ों ने फोर्ट सेंट जॉर्ज (Fort St. George) नामक किलेबंद कोठी बनाई। 1641 में यह कोरोमंडल तट का मुख्यालय बन गया।

2. बंबई (Bombay) – 1661:

1661 में पुर्तगाली राजकुमारी ‘कैथरीन ऑफ ब्रगेंज़ा’ का विवाह ब्रिटेन के राजकुमार ‘चार्ल्स द्वितीय’ से हुआ। पुर्तगालियों ने बंबई द्वीप दहेज (Dowry) के रूप में चार्ल्स को दे दिया। 1668 में चार्ल्स ने इसे केवल 10 पाउंड वार्षिक किराए पर ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया। गेराल्ड ऑंगियर (Gerald Aungier) को आधुनिक बंबई का संस्थापक माना जाता है।

3. कलकत्ता (Calcutta) – 1690:

जॉब चार्नॉक (Job Charnock) ने तीन गाँवों—सुतानाती, कालीकाता और गोबिंदपुर—की जमींदारी 1200 रुपये में प्राप्त की। इन्हीं को मिलाकर आधुनिक कलकत्ता शहर बसाया गया। 1700 ई. में यहाँ फोर्ट विलियम (Fort William) का निर्माण हुआ, जिसके पहले प्रेसिडेंट चार्ल्स आयर (Charles Eyre) बने। 1774 से 1911 तक कलकत्ता ब्रिटिश भारत की राजधानी रहा।

महत्वपूर्ण फरमान (Crucial Farmans):

  • सुनहरा फरमान (Golden Farman – 1632): गोलकुंडा के सुल्तान ने 500 पैगोडा वार्षिक कर के बदले अंग्रेज़ों को गोलकुंडा के बंदरगाहों पर स्वतंत्रतापूर्वक व्यापार करने की छूट दे दी।
  • शाह शुजा का फरमान (1651): बंगाल के सूबेदार शाह शुजा (शाहजहाँ का बेटा) ने 3000 रुपये वार्षिक के बदले बंगाल में व्यापार की छूट दी।
  • मैग्ना कार्टा (The Magna Carta of EIC – 1717): 1715 में जॉन सुरमन के नेतृत्व में एक ब्रिटिश दल मुग़ल सम्राट फर्रुखसियर (Farrukhsiyar) के दरबार में गया। इस दल में डॉक्टर विलियम हैमिल्टन भी था, जिसने फर्रुखसियर की एक गंभीर बीमारी का इलाज कर दिया। खुश होकर फर्रुखसियर ने 1717 में एक शाही फरमान जारी किया।
    इसके तहत 3000 रुपये वार्षिक के बदले बंगाल में ‘कर-मुक्त’ (Tax-free) व्यापार और कंपनी के पास (Dastak) को मान्यता दी गई। इतिहासकार ओर्म (Orme) ने इसे कंपनी का ‘मैग्ना कार्टा’ (महाअधिकार पत्र) कहा है।
4. डेनिश (The Danes / Denmark)

डेनमार्क की ‘डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी’ की स्थापना 1616 में हुई।

  • इन्होंने अपनी पहली फैक्ट्री 1620 में ट्रैंकोबार (Tranquebar – तमिलनाडु) में स्थापित की।
  • इनकी दूसरी और सबसे प्रमुख फैक्ट्री 1676 में सेरामपुर (Serampore – बंगाल) में स्थापित हुई। सेरामपुर इनका मुख्यालय था।
  • ये भारत में अपना व्यापारिक साम्राज्य स्थापित करने में विफल रहे। इनका मुख्य ध्यान ईसाई धर्म के प्रचार (Missionary activities) पर रहा।
  • अंततः 1845 ई. में इन्होंने अपनी सारी भारतीय बस्तियां ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बेच दीं और भारत से चले गए।
5. फ्रांसीसी (The French)

फ्रांसीसी भारत आने वाले सबसे अंतिम प्रमुख यूरोपीय थे, लेकिन उन्होंने अंग्रेज़ों को सबसे कड़ी टक्कर दी।

  • कंपनी की स्थापना (1664): फ्रांस के सम्राट लुई 14वें (Louis XIV) के प्रसिद्ध वित्त मंत्री कोलबर्ट (Colbert) के प्रयासों से ‘कम्पैनी डेस इंडेस ओरिएंटलेस’ (Compagnie des Indes Orientales) की स्थापना हुई। यह एक पूर्णतः सरकारी कंपनी थी, जिसका सारा खर्च और नियंत्रण राजा के पास था (यही बाद में इसके पतन का एक बड़ा कारण बना)।
  • फैक्ट्रियों की स्थापना:
    • 1668: फ्रेंको कैरो (Francois Caron) के नेतृत्व में सूरत में पहली फ्रांसीसी फैक्ट्री।
    • 1669: मरकारा (Marcara) द्वारा मसूलीपट्टनम में दूसरी फैक्ट्री।
  • पांडिचेरी (Puducherry) – 1673: फ्रेंकोइस मार्टिन और बेलैंग डी लेस्पिने ने वलिकोंडापुरम के सूबेदार शेर खान लोदी से एक गाँव प्राप्त किया जिसे पांडिचेरी के रूप में विकसित किया गया। मार्टिन इसका पहला गवर्नर बना। यहाँ फोर्ट लुई (Fort Louis) बनाया गया।
  • चंद्रनगर (Chandernagore) – 1690: बंगाल के नवाब शाइस्ता खान से जगह प्राप्त कर कलकत्ता के पास चंद्रनगर नामक प्रसिद्ध फ्रांसीसी बस्ती बसाई।
  • विस्तार: फ्रांसीसियों ने 1721 में मॉरीशस, 1725 में माहे (मालाबार तट) और 1739 में कराइकल पर अधिकार किया। गवर्नर डुपले (Dupleix) के समय फ्रांसीसी शक्ति अपने चरम पर थी। डुपले ने ही सबसे पहले भारत में ‘सहायक संधि’ (Subsidiary Alliance) की अवधारणा शुरू की थी।
आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष (कर्नाटक युद्ध) ⚔️

भारत में व्यापार और राजनीतिक वर्चस्व के लिए अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों के बीच दक्षिण भारत (कर्नाटक क्षेत्र) में तीन भयंकर युद्ध हुए। (परीक्षा के लिए इनकी संधियाँ (Treaties) बहुत महत्वपूर्ण हैं)।

युद्ध (Carnatic War) वर्ष (Period) तात्कालिक कारण (Reason) समाप्ति / संधि (Treaty) – Very Imp
प्रथम कर्नाटक युद्ध 1746 – 1748 ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध (यूरोप की घटना)। बार्नेट द्वारा फ्रांसीसी जहाज पकड़ना। (इसमें सेंट थोमे / अडयार का युद्ध लड़ा गया)। ए-ला-शापेल की संधि (Treaty of Aix-la-Chapelle – 1748). मद्रास अंग्रेज़ों को वापस मिला।
द्वितीय कर्नाटक युद्ध 1749 – 1754 हैदराबाद और कर्नाटक के नवाब पद के लिए आंतरिक उत्तराधिकार विवाद। (अंग्रेज़ों ने अनवरुद्दीन/नासिर जंग का, फ्रांसीसियों ने चंदा साहब/मुजफ्फर जंग का साथ दिया। इसमें अंबूर का युद्ध हुआ)। पांडिचेरी की संधि (Treaty of Pondicherry – 1755). डुपले को वापस बुला लिया गया जो फ्रांसीसियों की बड़ी भूल थी।
तृतीय कर्नाटक युद्ध 1756 – 1763 यूरोप में ‘सप्तवर्षीय युद्ध’ (Seven Years’ War) का शुरू होना। क्लाइव और वाटसन द्वारा चंद्रनगर पर कब्ज़ा। पेरिस की संधि (Treaty of Paris – 1763). फ्रांसीसियों को कारखाने वापस मिले लेकिन वे किलेबंदी नहीं कर सकते थे।
वांडीवाश का युद्ध (Battle of Wandiwash – 22 Jan 1760):

यह तृतीय कर्नाटक युद्ध के दौरान लड़ा गया एक निर्णायक युद्ध था। इसमें अंग्रेज़ सेनापति सर आयर कूट (Sir Eyre Coote) ने फ्रांसीसी सेनापति काउंट डी लाली (Comte de Lally) को बुरी तरह पराजित किया। इस युद्ध ने भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य के सपने को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

निष्कर्ष (Conclusion)

इस प्रकार, व्यापार के इरादे से आई यूरोपीय कंपनियों में अंततः ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी सबसे शक्तिशाली बनकर उभरी। उसने पुर्तगालियों और डचों को व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में पीछे छोड़ा और फ्रांसीसियों को सैन्य युद्धों (कर्नाटक युद्धों) में पराजित कर भारत के भाग्य का स्वामी बनने का मार्ग प्रशस्त किया।

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