कक्षा 9 इतिहास अध्याय 1
फ्रांसीसी क्रांति (The French Revolution)
📌 अध्याय का परिचय (Chapter Introduction)
14 जुलाई 1789 की सुबह पेरिस नगर में आतंक का माहौल था। राजा ने सेना को शहर में घुसने का आदेश दे दिया था। लगभग 7000 मर्द और औरतें टाउन हॉल के सामने इकट्ठे हुए और उन्होंने एक जन-सेना (Peoples’ Militia) बना ली। हथियारों और गोला-बारूद की खोज में उन्होंने बास्तील (Bastille) के किले की जेल को तोड़ दिया। बास्तील का किला राजा की निरंकुश (absolute) शक्तियों का प्रतीक था, इसलिए लोग इससे नफरत करते थे। भीड़ ने किले के कमांडर को मार डाला और वहाँ बंद सभी 7 कैदियों को छुड़ा लिया। किले को ढहा दिया गया और उसके पत्थर/अवशेष बाज़ार में उन लोगों को बेच दिए गए जो इस तबाही को स्मृति चिह्न के रूप में संजोना चाहते थे। यह घटना फ्रांसीसी क्रांति की एक प्रचंड शुरुआत थी।
1. 18वीं सदी के उत्तरार्ध में फ्रांसीसी समाज
1774 में बूर्बों (Bourbon) राजवंश का लुई XVI (Louis XVI) फ्रांस की गद्दी पर बैठा। उसकी उम्र सिर्फ 20 साल थी और उसकी शादी ऑस्ट्रिया की राजकुमारी मैरी एन्तोएनेत (Marie Antoinette) से हुई थी। राज्यारोहण के समय, राजा ने देखा कि फ्रांस का राजकोष (treasury) बिल्कुल खाली था।
खजाना खाली होने के मुख्य कारण (Reasons for Empty Treasury):
- लंबे युद्ध (Long Wars): फ्रांस लगातार कई सालों से युद्ध लड़ रहा था, जिससे उसके वित्तीय संसाधन पूरी तरह नष्ट हो गए थे।
- वर्साय का महल (Palace of Versailles): राजा के इस विशाल महल की देख-रेख, राजदरबार की शान-ओ-शौकत, सेना के रखरखाव, सरकारी कार्यालयों और विश्वविद्यालयों को चलाने का नियमित खर्च बहुत अधिक था।
- अमेरिका की मदद: लुई XVI ने अमेरिका के 13 उपनिवेशों (colonies) को उनके साझा दुश्मन ब्रिटेन से आज़ाद करवाने में मदद की। इस युद्ध के कारण फ्रांस पर लगभग 10 अरब लिव्रे (Livres – फ्रांस की तत्कालीन मुद्रा) का कर्ज़ और बढ़ गया, जबकि उस पर पहले से ही 2 अरब लिव्रे का कर्ज़ था।
- भारी ब्याज (High Interest): जिन ऋणदाताओं ने सरकार को कर्ज़ दिया था, वे अब 10% ब्याज मांग रहे थे। सरकार का बजट सिर्फ कर्ज़ का ब्याज चुकाने में ही खत्म हो रहा था।
समाज का विभाजन (Division of Society – The 3 Estates):
18वीं सदी में फ्रांस का समाज तीन हिस्सों (एस्टेट्स) में बंटा हुआ था। यह ‘पुरानी व्यवस्था’ (Old Regime) का हिस्सा था। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि टैक्स सिर्फ तीसरे एस्टेट के लोग ही देते थे।
- प्रथम एस्टेट (First Estate – पादरी वर्ग/Clergy): चर्च के लोग। इन्हें जन्म से ही विशेषाधिकार (privileges) मिले हुए थे। इनको राज्य को कोई टैक्स नहीं देना पड़ता था।
- द्वितीय एस्टेट (Second Estate – कुलीन वर्ग/Nobility): राजा के रिश्तेदार, अमीर लोग और ज़मींदार। इन्हें भी राज्य को टैक्स नहीं देना पड़ता था। इसके अलावा ये किसानों से ‘सामंती कर’ (Feudal dues) भी वसूलते थे।
- तृतीय एस्टेट (Third Estate – आम जनता): इसमें बड़े व्यवसायी, अदालती कर्मचारी, वकील, किसान, कारीगर, छोटे किसान, और भूमिहीन मज़दूर शामिल थे। फ्रांस की 90% आबादी किसानों की थी (लेकिन ज़मीन के मालिक बहुत कम थे)। सारा टैक्स इन्हीं को भरना पड़ता था।
करों (Taxes) के प्रकार:
- टाइद (Tithe): यह एक धार्मिक कर था जो चर्च द्वारा किसानों से वसूला जाता था। यह कृषि उपज के 10वें हिस्से (1/10) के बराबर होता था।
- टाइल (Taille): यह एक प्रत्यक्ष कर (Direct tax) था जो सीधे राज्य (सरकार) को दिया जाता था। इसके अलावा अनेक अप्रत्यक्ष (indirect) टैक्स भी थे जो नमक और तंबाकू जैसी रोज़मर्रा की उपभोग की वस्तुओं पर लगाए जाते थे।
जीने का संघर्ष (The Struggle to Survive / Subsistence Crisis):
1715 में फ्रांस की आबादी 2.3 करोड़ थी, जो 1789 आते-आते 2.8 करोड़ हो गई। आबादी बढ़ने से अनाज की मांग बहुत तेज़ी से बढ़ी, लेकिन उत्पादन उसी रफ्तार से नहीं बढ़ पाया। इसे ‘जीविका संकट का चक्र’ कहा जाता है:
- ज़्यादातर लोगों का मुख्य खाना पावरोटी (Bread) था, अनाज की कमी से इसकी कीमतें आसमान छूने लगीं।
- मज़दूर कारखानों में काम करते थे और उनकी मज़दूरी मालिक तय करते थे। महंगाई के हिसाब से मज़दूरी नहीं बढ़ी, जिससे अमीर और गरीब के बीच की खाई और गहरी हो गई।
- सूखे या ओले के प्रकोप से जब भी फसल खराब होती, तो गरीब लोग पावरोटी नहीं खरीद पाते थे। कमज़ोर शरीर के कारण बीमारियाँ और महामारियां फैलती थीं। यह भुखमरी (Subsistence crisis) की स्थिति थी जो पुरानी व्यवस्था वाले फ्रांस में अक्सर पैदा होती थी।
नए मध्यम वर्ग का उदय (Rise of the Middle Class):
18वीं सदी में एक नए सामाजिक समूह का उदय हुआ जिसे ‘मध्यम वर्ग’ (Middle Class) कहा गया। इन्होंने ऊनी और रेशमी कपड़ों के उत्पादन तथा समुद्री व्यापार से बहुत पैसा कमाया था। इनमें वकील और प्रशासनिक अधिकारी भी थे जो पढ़े-लिखे थे। इनका स्पष्ट मानना था कि समाज में किसी भी समूह को जन्म के आधार पर विशेषाधिकार (birth privileges) नहीं मिलने चाहिए, बल्कि किसी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत का आधार उसकी योग्यता होनी चाहिए।
🧠 दार्शनिकों का प्रभाव (Role of Philosophers)
इन महान दार्शनिकों ने लोगों को आज़ादी, समान नियमों और समान अवसरों का विचार दिया:
- जॉन लॉक (John Locke): अपनी पुस्तक “Two Treatises of Government” में उसने राजा के दैवीय और निरंकुश (absolute) अधिकारों के सिद्धांत को सिरे से खारिज कर दिया।
- रूसो (Jean Jacques Rousseau): उसने लॉक के विचार को आगे बढ़ाते हुए प्रस्ताव रखा कि सरकार जनता और उसके प्रतिनिधियों के बीच एक ‘सामाजिक अनुबंध’ (Social Contract) पर आधारित होनी चाहिए।
- मॉन्टेस्क्यू (Montesquieu): अपनी पुस्तक “The Spirit of the Laws” में उसने सरकार के अंदर सत्ता के केंद्रीकरण का विरोध किया और शक्तियों के विभाजन (विधायिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका के बीच) की मांग की। (जब अमेरिका के 13 उपनिवेश आज़ाद हुए, तो उन्होंने इसी मॉडल को अपनाया था)।
इन दार्शनिकों के विचारों पर कॉफी हाउसों और सैलूनों की गोष्ठियों में गरमागरम बहस होती थी। जो लोग पढ़-लिख नहीं सकते थे, उनके लिए इन पुस्तकों और अख़बारों को ज़ोर-ज़ोर से पढ़ा जाता था ताकि वे भी इन क्रांतिकारी विचारों को समझ सकें।
2. क्रांति की शुरुआत (The Outbreak of the Revolution)
पुराने राजतंत्र में फ्रांसीसी सम्राट अपनी मर्जी से कर (tax) नहीं लगा सकता था। नए करों के प्रस्ताव को मंज़ूरी देने के लिए उसे एस्टेट्स जेनरल (Estates General) की मीटिंग बुलानी पड़ती थी (यह एक राजनीतिक संस्था थी जिसमें तीनों एस्टेट अपने-अपने प्रतिनिधि भेजते थे)। अंतिम बार यह बैठक 1614 में बुलाई गई थी!
एस्टेट्स जेनरल की बैठक (5 मई 1789):
- लुई XVI ने नए करों का प्रस्ताव पारित करने के लिए वर्साय के एक आलीशान भवन में मीटिंग बुलाई। प्रथम और द्वितीय एस्टेट ने 300-300 प्रतिनिधि भेजे, जो आमने-सामने की कतारों में बैठे।
- तीसरे एस्टेट ने 600 प्रतिनिधि भेजे जिन्हें पीछे खड़ा रखा गया। तीसरे एस्टेट का प्रतिनिधित्व इसके पढ़े-लिखे और समृद्ध लोग कर रहे थे (किसानों, औरतों और कारीगरों का प्रवेश वर्जित था)। इनके साथ 40,000 पत्रों का एक पुलिंदा था जिसमें आम जनता की मांगें और शिकायतें दर्ज थीं।
- मतदान का नियम (Voting Rule): पिछले नियमों के अनुसार हर एस्टेट का 1 वोट होता था। लेकिन इस बार तीसरे एस्टेट ने मांग की कि पूरी असेंबली एक साथ मतदान करे, जिसमें हर सदस्य का 1 वोट हो। (यह रूसो द्वारा ‘द सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ में दिया गया लोकतांत्रिक सिद्धांत था)।
- राजा ने इस लोकतांत्रिक मांग को ठुकरा दिया। इसके विरोध में तीसरे एस्टेट के लोग असेंबली से वॉकआउट कर गए।
टेनिस कोर्ट की शपथ (20 जून 1789):
20 जून को तीसरे एस्टेट के प्रतिनिधि वर्साय के एक इंडोर टेनिस कोर्ट में इकट्ठे हुए। उन्होंने खुद को नेशनल असेंबली (National Assembly) घोषित कर दिया और शपथ ली कि जब तक वे फ्रांस के लिए एक ऐसा नया संविधान नहीं बना लेते जो राजा की शक्तियों पर अंकुश लगाएगा, तब तक वे वहां से नहीं हटेंगे।
इनका नेतृत्व मिराब्यो (Mirabeau) और आबे सीये (Abbé Sieyès) ने किया। मिराब्यो का जन्म एक कुलीन (अमीर) परिवार में हुआ था, लेकिन वह सामंती विशेषाधिकारों को खत्म करने के पक्ष में था। आबे सीये मूलतः एक पादरी था, लेकिन उसने तीसरे एस्टेट की आवाज़ उठाने के लिए ‘तीसरा एस्टेट क्या है?’ (What is the Third Estate?) नाम से एक बेहद प्रभावशाली पम्फलेट (पुस्तिका) लिखा।
आम जनता का विद्रोह (बास्तील पर हमला – 14 जुलाई):
एक तरफ नेशनल असेंबली संविधान का प्रारूप तैयार कर रही थी, दूसरी तरफ पूरा फ्रांस उबल रहा था। कड़ाके की सर्दी के कारण फसल बर्बाद हो गई थी और पावरोटी की कीमतें आसमान छू रही थीं। बेकरी मालिक स्थिति का फायदा उठाकर जमाखोरी कर रहे थे। घंटों लाइन में लगने के बाद, गुस्से में औरतों की भीड़ ने दुकानों पर धावा बोल दिया। इसी बीच राजा ने सेना को पेरिस में घुसने का आदेश दिया। जैसा कि अध्याय की शुरुआत में बताया गया है, 14 जुलाई 1789 को क्रोधित भीड़ ने बास्तील जेल को नेस्तनाबूद कर दिया।
गांवों में ‘महा-भय’ (The Great Fear):
गांवों में यह अफवाह फैल गई कि ज़मींदारों ने भाड़े के लुटेरों के गिरोह बुला लिए हैं जो किसानों की पकी हुई फसलें जलाने आ रहे हैं। इस डर से बौखलाए किसानों ने कुदालों और बेलचों से ज़मींदारों के महलों (Chateaux) पर हमला कर दिया। उन्होंने अन्न के गोदाम लूट लिए और लगान से संबंधित सारे दस्तावेज़ जलाकर राख कर दिए। बहुत से कुलीन लोग अपनी जागीरें छोड़कर पड़ोसी देशों में भाग गए।
परिणाम (Result): अपनी विद्रोही प्रजा की शक्ति का अनुमान लगाकर, लुई XVI डर गया और उसने नेशनल असेंबली को मान्यता दे दी। उसने यह भी मान लिया कि अब उसकी सत्ता पर संविधान का अंकुश होगा। 4 अगस्त 1789 की रात को असेंबली ने एक आदेश पारित किया जिससे सामंती व्यवस्था, करों (tithes), और पादरी वर्ग के सभी विशेषाधिकारों को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। चर्च के स्वामित्व वाली ज़मीनें ज़ब्त कर ली गईं।
3. फ्रांस एक संवैधानिक राजतंत्र बन गया (France Becomes a Constitutional Monarchy)
1791 में नेशनल असेंबली ने संविधान का प्रारूप पूरा कर लिया। इसका मुख्य उद्देश्य राजा की शक्तियों को सीमित करना था। अब शक्ति किसी एक व्यक्ति के हाथ में केंद्रित होने के बजाय, तीन अलग-अलग संस्थाओं में बांट दी गई: विधायिका (Legislature), कार्यपालिका (Executive), और न्यायपालिका (Judiciary)। राजा अब केवल कार्यपालिका का हिस्सा था और उसके पास असेंबली के फैसलों पर सिर्फ ‘वीटो’ (Veto) का अधिकार था।
नागरिकों का विभाजन (सक्रिय बनाम निष्क्रिय):
- सक्रिय नागरिक (Active Citizens): केवल उन पुरुषों को वोट देने का अधिकार था जिनकी उम्र 25 साल से ऊपर थी और जो कम से कम 3 दिन की मज़दूरी के बराबर टैक्स (कर) भरते थे। (लगभग 2.8 करोड़ की आबादी में से सिर्फ 40 लाख लोग ही सक्रिय नागरिक थे)।
- निष्क्रिय नागरिक (Passive Citizens): बाकी बचे हुए सारे पुरुष, सभी महिलाएं और बच्चों को वोट देने का कोई राजनीतिक अधिकार नहीं था।
पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणा पत्र:
संविधान की शुरुआत ‘पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणा पत्र’ के साथ हुई। इसमें जीवन का अधिकार (Right to Life), अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech), और कानून के समक्ष समानता (Equality before law) को स्थापित किया गया। इन्हें ‘नैसर्गिक और अहरणीय’ (Natural and inalienable) अधिकार माना गया, अर्थात् ये प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से प्राप्त थे और कोई भी सरकार इन्हें छीन नहीं सकती थी। राज्य का यह सर्वोच्च कर्तव्य था कि वह नागरिकों के इन नैसर्गिक अधिकारों की रक्षा करे।
🎨 राजनीतिक प्रतीक (Political Symbols)
18वीं सदी में फ्रांस में ज़्यादातर पुरुष और महिलाएं पढ़-लिख नहीं सकते थे। इसलिए महत्वपूर्ण विचारों को फैलाने के लिए छपे हुए शब्दों के बजाय प्रतीकों और आकृतियों का उपयोग किया गया:
- टूटी हुई ज़ंजीर: दासों को आज़ादी मिलने का प्रतीक।
- छड़ियों का गट्ठर: एकता में ही बल है (Unity is strength)। एक छड़ी को आसानी से तोड़ा जा सकता है, पूरे गट्ठर को नहीं।
- त्रिभुज के अंदर रोशनी बिखेरती आंख: सर्वदर्शी आंख ज्ञान का प्रतीक है, सूर्य की किरणें अज्ञानता के अंधेरे को मिटा देंगी।
- राजदंड (Scepter): शाही सत्ता का प्रतीक।
- अपनी पूंछ मुंह में लिए सांप: सनातनता (Eternity) का प्रतीक – अंगूठी का कोई आदि और अंत नहीं होता।
- लाल फ़्राइज़ियन टोपी: दासों द्वारा स्वतंत्र होने के बाद पहनी जाने वाली टोपी।
- नीला-सफ़ेद-लाल: फ्रांस के राष्ट्रीय रंग।
- पंखों वाली स्त्री: कानून का मानवीय रूप (Personification of Law)।
- विधि पट (Law Tablet): कानून सबके लिए समान है और उसकी नज़रों में सब बराबर हैं।
4. राजतंत्र का उन्मूलन और गणतंत्र की स्थापना (Abolition of Monarchy and The Republic)
लुई XVI ने संविधान पर हस्ताक्षर तो कर दिए थे, पर स्थिति अभी भी तनावपूर्ण थी। राजा चुपके-चुपके प्रशा (Prussia) के राजा के साथ गुप्त वार्ता कर रहा था और फ्रांस पर हमला करवाने की योजना बना रहा था। पड़ोसी देशों के शासक भी फ्रांस की क्रांति से डरे हुए थे। लेकिन इससे पहले कि वे हमला करते, अप्रैल 1792 में नेशनल असेंबली ने प्रशा और ऑस्ट्रिया के खिलाफ युद्ध (War) की घोषणा कर दी।
प्रांतों से हज़ारों स्वयंसेवक सेना में भर्ती होने के लिए जमा होने लगे। उन्होंने इस युद्ध को ‘यूरोप के राजाओं और कुलीनों के खिलाफ आम जनता की जंग’ के रूप में देखा। स्वयंसेवकों ने देशभक्ति के कई गीत गाए, जिनमें सबसे मशहूर था ‘मार्सिले’ (Marseillaise) जिसे कवि रॉजेट दी लाइल ने लिखा था। यह गीत पहली बार मार्सिले शहर के स्वयंसेवकों ने पेरिस की ओर कूच करते हुए गाया था, इसीलिए इसका नाम ‘मार्सिले’ पड़ा। आज यही फ्रांस का राष्ट्रगान है।
जैकोबिन क्लब और सौं-कुलॉत (Jacobin Club and Sans-culottes):
युद्ध के कारण फ्रांस में बहुत आर्थिक समस्याएं और रोज़मर्रा की चीज़ों की कमी आ गई। लोगों को लगा कि क्रांति को अभी और आगे बढ़ाना ज़रूरी है क्योंकि 1791 का संविधान सिर्फ अमीर वर्ग को ही राजनीतिक अधिकार दे रहा था। इस दौरान राजनीतिक नीतियों पर चर्चा करने के लिए ‘राजनीतिक क्लब’ बनने लगे, जिनमें जैकोबिन क्लब (Jacobin Club) सबसे प्रसिद्ध था। इसका नाम पेरिस के पूर्व कॉन्वेंट ऑफ सेंट जैकब के नाम पर पड़ा था।
- इसके सदस्य मुख्य रूप से समाज के कम समृद्ध (गरीब) हिस्से से थे – जैसे छोटे दुकानदार, कारीगर (जूता बनाने वाले, पेस्ट्री बनाने वाले, घड़ीसाज़), दिहाड़ी मज़दूर और नौकर।
- इनका निर्विवाद नेता मैक्सिमिलियन रोबेस्प्येर (Maximilian Robespierre) था।
- इन्होंने खुद को फैशन-परस्त अमीरों (जो घुटने तक पहनने वाली ‘ब्रीचेस’ या पैंट पहनते थे) से अलग दिखाने के लिए लंबी धारीदार पतलून (जैसे गोदी कामगार पहनते हैं) पहननी शुरू की। इसलिए जैकोबिनों को ‘सौं-कुलॉत’ (Sans-culottes) के नाम से जाना गया, जिसका शाब्दिक अर्थ है “बिना घुटने वाले”। पुरुष आज़ादी दिखाने के लिए लाल टोपी भी पहनते थे, लेकिन महिलाओं को ऐसा करने की अनुमति नहीं थी।
फ्रांस का गणतंत्र बनना (Republic):
गर्मियों में, जैकोबिनों ने पेरिस वालों को भड़काकर एक विशाल हिंसक विद्रोह की योजना बनाई। 10 अगस्त 1792 की सुबह उन्होंने ट्यूलेरिए (Tuileries) के महल पर धावा बोल दिया, राजा के रक्षकों को मार डाला और राजा को कई घंटों तक बंधक बनाए रखा। इसके बाद असेंबली ने शाही परिवार को जेल में डाल देने का प्रस्ताव पारित किया। नए चुनाव कराए गए, जिसमें एक बड़ा बदलाव यह हुआ कि अब 21 साल या उससे अधिक उम्र के सभी पुरुषों को (चाहे उनके पास संपत्ति हो या न हो) वोट देने का अधिकार मिल गया।
नवनिर्वाचित असेंबली को ‘कन्वेंशन’ (Convention) का नाम दिया गया। 21 सितंबर 1792 को कन्वेंशन ने फ्रांस से राजतंत्र (Monarchy) को हमेशा के लिए खत्म कर दिया और फ्रांस को एक गणतंत्र (Republic) घोषित कर दिया। गणतंत्र सरकार का वह रूप है जहाँ जनता सरकार और उसके प्रमुख का चुनाव करती है, यहाँ कोई वंशानुगत राजशाही नहीं होती।
21 जनवरी 1793 को लुई XVI को ‘देशद्रोह’ (Treason) के आरोप में पेरिस के ‘प्लेस डे ला कॉनकोर्ड’ (Place de la Concorde) में सार्वजनिक रूप से गिलोटिन पर चढ़ाकर फांसी दे दी गई। कुछ ही समय बाद रानी मैरी एन्तोएनेत का भी यही हश्र हुआ।
⚔️ आतंक का राज (The Reign of Terror): 1793 – 1794
सन् 1793 से 1794 तक के काल को फ्रांस के इतिहास में ‘आतंक का राज’ कहा जाता है। रोबेस्प्येर ने गणतंत्र की रक्षा के नाम पर नियंत्रण और दंड की अत्यंत सख्त नीति अपनाई।
- जो भी व्यक्ति उसे ‘गणतंत्र का दुश्मन’ लगता था (जैसे कुलीन, पादरी, अन्य राजनीतिक दलों के सदस्य, या उसकी अपनी पार्टी के वे लोग जो उसके काम करने के तरीके से असहमत थे), उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाता था।
- एक क्रांतिकारी न्यायालय (Revolutionary Tribunal) द्वारा उन पर मुकदमा चलाया जाता था। यदि अदालत उन्हें दोषी पाती, तो उन्हें तुरंत गिलोटिन (Guillotine) पर चढ़ाकर उनका सिर कलम कर दिया जाता था।
- (गिलोटिन दो खंभों के बीच लटकती आरी वाली एक मशीन थी जिससे अपराधी का सिर धड़ से अलग कर दिया जाता था। इस मशीन का नाम इसके आविष्कारक डॉ. गिलोटिन के नाम पर रखा गया था)।
- रोबेस्प्येर की सरकार ने कानून बनाकर मज़दूरी और कीमतों की अधिकतम सीमा तय कर दी। गोश्त और पावरोटी की राशनिंग कर दी गई। किसानों को अपना अनाज शहरों में ले जाकर सरकार द्वारा तय की गई निश्चित कीमतों पर ही बेचने के लिए बाध्य किया गया।
- महंगे सफ़ेद आटे के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई और सभी नागरिकों के लिए ‘समता रोटी’ (साबुत गेहूं की बनी एक जैसी रोटी) खाना अनिवार्य कर दिया गया।
- बोलचाल में भी बराबरी लाने के लिए, पारंपरिक ‘महोदय’ (Monsieur) और ‘महोदया’ (Madame) कहने की जगह सभी फ्रांसीसी पुरुषों और महिलाओं को नागरिक (Citoyen) और नागरिका (Citoyenne) कहकर संबोधित किया जाने लगा।
- चर्चों को बंद कर दिया गया और उनके भवनों को सैन्य बैरकों या दफ़्तरों में तब्दील कर दिया गया।
अंत में, रोबेस्प्येर ने अपनी नीतियों को इतनी सख्ती से लागू किया कि उसके अपने समर्थक भी त्राहि-त्राहि करने लगे और संयम की मांग करने लगे। अंततः जुलाई 1794 में एक न्यायालय ने उसे दोषी ठहराया और 27 जुलाई को गिरफ्तार करके, अगले ही दिन उसे भी उसी गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया जिससे उसने हज़ारों की जान ली थी।
डिरेक्ट्री का शासन (Directory Rules France):
जैकोबिन सरकार के पतन के बाद, सत्ता वापस मध्य वर्ग के संपन्न (अमीर) लोगों के हाथ में आ गई। एक नया संविधान बनाया गया जिसमें समाज के संपत्तिहीन (बिना संपत्ति वाले) तबके से वोट देने का अधिकार फिर से छीन लिया गया। इस नए संविधान में चुनी हुई दो विधान परिषदों (Legislative Councils) का प्रावधान था। इन परिषदों ने 5 सदस्यों वाली एक कार्यपालिका—‘डिरेक्ट्री’ (Directory)—को नियुक्त किया।
ऐसा इसलिए किया गया ताकि जैकोबिनों के समय की तरह सत्ता फिर से एक अकेले व्यक्ति (जैसे रोबेस्प्येर) के हाथ में केंद्रित न हो जाए। लेकिन फ्रांस का दुर्भाग्य यह रहा कि डिरेक्ट्री के सदस्यों और विधान परिषदों के बीच हमेशा टकराव होता रहता था। परिषदें अक्सर डिरेक्ट्री को बर्खास्त करने की कोशिश करती थीं। इस भारी राजनीतिक अस्थिरता ने सेना के एक अति-महत्वाकांक्षी जनरल, नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Bonaparte), के सैन्य तानाशाह के रूप में उदय का रास्ता पूरी तरह साफ़ कर दिया।
5. क्या महिलाओं के लिए भी क्रांति हुई?
महिलाएं शुरू से ही फ्रांसीसी समाज में अहम बदलाव लाने वाली हर गतिविधि में सक्रिय रूप से शामिल थीं। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि उनकी सक्रिय भागीदारी क्रांतिकारी सरकार को उनका जीवन सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करेगी।
- तीसरे एस्टेट की ज़्यादातर औरतें जीविका चलाने के लिए कपड़े धोती थीं, सिलाई-बुनाई करती थीं, बाज़ारों में सब्ज़ी/फल बेचती थीं, या संपन्न लोगों के घरों में घरेलू नौकरानी का काम करती थीं।
- उनके पास शिक्षा या व्यावसायिक प्रशिक्षण (job training) तक पहुँचने का कोई अधिकार नहीं था। सिर्फ प्रथम और द्वितीय एस्टेट की लड़कियाँ या तीसरे एस्टेट के अमीर परिवारों की लड़कियाँ ही कॉन्वेंट में पढ़ सकती थीं, और उसके बाद उनकी शादी कर दी जाती थी।
- कामकाजी औरतों को अपने परिवार का पालन-पोषण भी करना पड़ता था (खाना पकाना, पानी लाना, पावरोटी के लिए लंबी लाइनों में लगना)। सबसे बड़ा भेदभाव यह था कि औरतों की मज़दूरी पुरुषों की तुलना में हमेशा बहुत कम होती थी।
महिलाओं की मांगें और राजनीतिक क्लब:
अपने हितों की वकालत करने और उन पर चर्चा करने के लिए महिलाओं ने अपने अख़बार निकाले और राजनीतिक क्लब शुरू किए। फ्रांस के विभिन्न शहरों में लगभग 60 महिला क्लब बनाए गए, जिनमें “द सोसाइटी ऑफ़ रेवोल्यूशनरी एंड रिपब्लिकन वीमेन” (The Society of Revolutionary and Republican Women) सबसे मशहूर था।
उनकी मुख्य और सबसे बड़ी मांग यह थी कि महिलाओं को भी पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए (1791 के संविधान में उन्हें ‘निष्क्रिय नागरिक’ का दर्ज़ा देकर बहुत निराश किया गया था)। वे मांग कर रही थीं कि उन्हें भी वोट देने का अधिकार मिले, वे भी असेंबली के लिए चुनी जा सकें, और उन्हें भी राजनीतिक पद प्राप्त करने का हक हो।
क्रांति के बाद महिलाओं को मिले अधिकार और संघर्ष:
प्रारंभिक क्रांतिकारी सरकार ने महिलाओं के जीवन में सुधार लाने वाले कुछ कानून ज़रूर बनाए:
- सरकारी स्कूल बनाए गए और सभी लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा अनिवार्य कर दी गई।
- पिता अब अपनी बेटियों की मर्जी के खिलाफ उनकी ज़बरदस्ती शादी नहीं करा सकते थे। शादी को अब एक स्वैच्छिक अनुबंध माना गया और उसे नागरिक कानूनों के तहत दर्ज किया जाने लगा।
- तलाक (Divorce) को कानूनी रूप दे दिया गया और अब पुरुष तथा महिला दोनों इसकी अर्ज़ी दे सकते थे।
- औरतों को व्यावसायिक प्रशिक्षण लेने, कलाकार बनने और छोटे-मोटे व्यवसाय चलाने की आज़ादी मिल गई।
लेकिन राजनीतिक अधिकारों के लिए महिलाओं का संघर्ष जारी रहा। ‘आतंक के राज’ (Reign of Terror) के दौरान रोबेस्प्येर की सरकार ने महिलाओं के सभी क्लबों को बंद करने और उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने वाले सख्त कानून लागू कर दिए। ओलम्प दे गूंज (Olympe de Gouges) जैसी कई प्रख्यात महिला नेताओं, जिन्होंने 1791 के संविधान का विरोध करते हुए अपना ‘महिला एवं नागरिक अधिकार घोषणा पत्र’ तैयार किया था, को गिरफ्तार कर लिया गया। ओलम्प दे गूंज पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया।
मताधिकार (वोट देने के अधिकार) और समान वेतन के लिए महिलाओं का यह आंदोलन अगली दो सदियों तक पूरी दुनिया में चलता रहा। अंततः, एक बहुत लंबे और कठिन संघर्ष के बाद 1946 में फ्रांस की महिलाओं ने मतदान का अधिकार (Right to Vote) हासिल किया।
6. दास प्रथा का उन्मूलन (The Abolition of Slavery)
जैकोबिन शासन का एक सबसे बड़ा और दूरगामी क्रांतिकारी कदम था – फ्रांसीसी उपनिवेशों (colonies) से दास प्रथा को खत्म करना। कैरेबियाई द्वीप जैसे मार्टिनिक, गॉडेलोप और सैन डोमिंगो – यूरोप में चीनी, कॉफ़ी, और नील (Indigo) के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता थे। पर यूरोपीय लोग उन अपरिचित और दूर देशों में जाकर काम करने के इच्छुक नहीं थे। इस श्रम (मज़दूरों) की कमी को पूरा करने के लिए एक अमानवीय त्रिकोणीय दास व्यापार (Triangular Slave Trade) शुरू हुआ जो यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका के बीच 17वीं सदी में शुरू हुआ था।
- फ्रांसीसी व्यापारी बोर्दो (Bordeaux) और नांते (Nantes) जैसे बंदरगाह शहरों से अफ्रीका के पश्चिमी तटों पर जाते थे, वहाँ वे स्थानीय सरदारों (Chieftains) से दासों (इंसानों) को खरीदते थे।
- इन दासों को जानवरों की तरह दागा जाता था (branding) और उन्हें हथकड़ियाँ पहनाकर जहाज़ों में तीन महीने की लंबी समुद्री यात्रा (अटलांटिक महासागर पार करके कैरेबियन तक) के लिए कसकर ठूंस दिया जाता था। अमेरिका पहुँचकर इन्हें बागान मालिकों को भारी मुनाफे पर बेच दिया जाता था। फ्रांस के इन बंदरगाह शहरों की आर्थिक समृद्धि इसी क्रूर दास व्यापार पर टिकी थी।
- 18वीं सदी में फ्रांस में इस प्रथा की बहुत निंदा हुई। नेशनल असेंबली में इस बात पर लंबी बहसें हुईं कि क्या ‘मनुष्य के अधिकार’ फ्रांस के उपनिवेशों में रहने वाली प्रजा पर भी लागू होने चाहिए। लेकिन असेंबली ने दास प्रथा के खिलाफ कोई कानून पास नहीं किया क्योंकि दास व्यापार पर निर्भर बड़े व्यवसायी इसका कड़ा विरोध कर रहे थे और सरकार उनका समर्थन खोना नहीं चाहती थी।
- अंत में 1794 में कन्वेंशन (जैकोबिन सरकार) ने एक ऐतिहासिक कानून पास किया जिसके तहत फ्रांसीसी उपनिवेशों के सभी दासों को आज़ाद कर दिया गया। पर यह आज़ादी सिर्फ 10 साल तक ही टिक पाई।
- जब नेपोलियन सत्ता में आया, तो उसने 1804 में दास प्रथा फिर से शुरू कर दी (ताकि बागान मालिकों को खुश कर सके)। बागान मालिकों को अपने आर्थिक हितों को साधने के लिए अफ्रीकी निग्रो (Negroes) लोगों को गुलाम बनाने की पूरी स्वतंत्रता मिल गई।
- अंतिम रूप से, फ्रांसीसी उपनिवेशों से दास प्रथा का पूर्ण और स्थायी उन्मूलन 1848 में किया गया।
7. क्रांति और रोज़ाना की ज़िंदगी (The Revolution and Everyday Life)
क्या राजनीति लोगों के पहनने के तरीके, उनकी बोलचाल की भाषा, और उनकी पढ़ने वाली किताबों को बदल सकती है? 1789 के बाद फ्रांस के पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के रोज़मर्रा के जीवन में वास्तव में ऐसे कई बड़े बदलाव आए। क्रांतिकारी सरकारों ने ‘स्वतंत्रता और समानता’ के आदर्शों को रोज़मर्रा के व्यवहार में उतारने के लिए कई कानून बनाए।
- सेंसरशिप की समाप्ति (Abolition of Censorship): बास्तील के पतन (1789) के ठीक बाद जो सबसे महत्वपूर्ण कानून लागू हुआ, वह था सेंसरशिप का अंत। पुराने राजतंत्र में कोई भी किताब, अख़बार, या नाटक राजा के सेंसर अधिकारियों की मंज़ूरी के बिना प्रकाशित या मंचित नहीं हो सकता था। लेकिन 1789 के ‘पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणा पत्र’ ने भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech and Expression) को एक नैसर्गिक अधिकार घोषित कर दिया।
- परिणामस्वरूप, फ्रांस के शहरों और गांवों दोनों जगह अख़बारों, पर्चों (pamphlets), किताबों और छपे हुए चित्रों की बाढ़ आ गई। इन सभी में फ्रांस में हो रहे राजनीतिक और सामाजिक बदलावों की निरंतर चर्चा होती थी।
- अब किसी भी घटना पर विरोधी विचार व्यक्त करना संभव था। नाटकों, गीतों, और उत्सवी जुलूसों में हज़ारों की संख्या में लोग शामिल होने लगे। यह स्वतंत्रता, न्याय और समानता के जटिल राजनीतिक दार्शनिक विचारों को आम जनता तक पहुँचाने और उन्हें समझने का एक बेहद लोकप्रिय तरीका बन गया, क्योंकि मुट्ठी भर शिक्षित लोगों के अलावा हर कोई मोटी-मोटी किताबें नहीं पढ़ सकता था।
🌟 निष्कर्ष और क्रांति की विरासत (Conclusion & Legacy)
1804 में नेपोलियन बोनापार्ट ने खुद को फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया और पुराने राजतंत्र को एक तरह से वापस ले आया। उसने पड़ोसी यूरोपीय देशों को जीतना शुरू किया और वहाँ के पुराने राजवंशों को बेदखल कर नए राज्य बनाए, जिनकी बागडोर उसने अपने परिवार के सदस्यों को सौंप दी। नेपोलियन खुद को यूरोप के आधुनिकीकरण का अग्रदूत मानता था। उसने निजी संपत्ति की सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनाए और दशमलव पद्धति (Decimal System) पर आधारित नाप-तौल की एक समान प्रणाली लागू की। शुरुआत में आम लोग उसे ‘मुक्तिदाता’ मानते थे जो उन्हें आज़ादी दिलाएगा, पर जल्द ही लोगों को सच्चाई समझ आ गई और उसकी सेना को हर जगह एक हमलावर के रूप में देखा जाने लगा। अंततः 1815 में वाटरलू (Waterloo) के युद्ध में उसकी करारी हार हुई। लेकिन नेपोलियन के कई आधुनिक कानूनों का प्रभाव उसके पतन के बाद भी लंबे समय तक यूरोप पर बना रहा।
विरासत (The Legacy): फ्रांसीसी क्रांति की सबसे महान और अमूल्य विरासत थे “स्वतंत्रता और जनवादी अधिकारों के विचार” (Ideas of Liberty and Democratic Rights)। ये विचार 19वीं सदी में फ्रांस से निकल कर पूरे यूरोप और दुनिया के कोने-कोने में फैले। इन्हीं विचारों के कारण यूरोप में सदियों पुरानी सामंती व्यवस्था (Feudal System) का नाश हुआ। उपनिवेशों (colonies) में रहने वाले लोगों ने भी एक संप्रभु राष्ट्र-राज्य स्थापित करने के लिए ‘स्वतंत्रता’ के इस फ्रांसीसी विचार को अपने स्वतंत्रता आंदोलनों में शामिल किया। भारत में, टीपू सुल्तान और राजा राममोहन रॉय ऐसे दो प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरण हैं जिन्होंने फ्रांसीसी क्रांति में उपजे इन नए क्रांतिकारी विचारों का स्वागत किया और उनसे बहुत अधिक प्रभावित हुए।
कक्षा 9 इतिहास अध्याय 2
यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति
(Socialism in Europe & The Russian Revolution)
📌 अध्याय का परिचय (Chapter Introduction)
फ्रांसीसी क्रांति ने समाज के ढांचे को पूरी तरह से बदलने की संभावनाओं के द्वार खोल दिए थे। 18वीं सदी से पहले यूरोप (और फ्रांस) का समाज एस्टेट्स और श्रेणियों में बंटा था, लेकिन फ्रांसीसी क्रांति के बाद दुनिया भर में (यहाँ तक कि भारत में राजा राममोहन रॉय और डेरोजियो जैसे विचारकों के बीच भी) व्यक्तिगत अधिकारों और सामाजिक सत्ता पर चर्चा शुरू हो गई।
हालांकि, यूरोप में हर कोई समाज का पूर्ण और अचानक बदलाव नहीं चाहता था। लोगों के विचारों में गहरी भिन्नता थी। कुछ लोग धीमा बदलाव चाहते थे, तो कुछ समाज का आमूल-चूल (Radical / पूरी तरह से) पुनर्गठन चाहते थे। इसी वैचारिक भिन्नता से 19वीं सदी की तीन प्रमुख राजनीतिक परंपराओं—उदारवादी (Liberals), रेडिकल (Radicals) और रूढ़िवादी (Conservatives) का जन्म हुआ।
1. सामाजिक परिवर्तन का युग (The Age of Social Change)
19वीं सदी के यूरोप में राजनीतिक और सामाजिक विचारों के ये तीन मुख्य समूह इस प्रकार थे:
1. उदारवादी (Liberals):
- ये ऐसा सहिष्णु राष्ट्र चाहते थे जिसमें सभी धर्मों को बराबर का सम्मान और जगह मिले। (उस समय यूरोप के देश आमतौर पर किसी एक धर्म का ही पक्ष लेते थे, जैसे ब्रिटेन ‘चर्च ऑफ इंग्लैंड’ का और ऑस्ट्रिया-स्पेन ‘कैथोलिक चर्च’ का समर्थन करते थे)।
- ये वंश आधारित शासकों की अनियंत्रित और निरंकुश सत्ता के घोर विरोधी थे। ये सरकार के समक्ष व्यक्ति के अधिकारों (Individual rights) की रक्षा करना चाहते थे।
- ये एक चुनी हुई संसदीय सरकार (Parliamentary Government) और एक प्रशिक्षित एवं स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary) के पक्ष में थे।
- सबसे महत्वपूर्ण बिंदु (Exam Point): ये ‘लोकतंत्रवादी’ (Democrats) नहीं थे। ये सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (सभी नागरिकों को वोट का अधिकार) के पक्ष में नहीं थे। इनका स्पष्ट मानना था कि वोट का अधिकार केवल संपत्तिधारियों (जिनके पास अपनी संपत्ति हो) को ही मिलना चाहिए और वे महिलाओं को वोट का अधिकार देने के बिल्कुल खिलाफ थे।
2. रेडिकल (Radicals):
- ये एक ऐसी सरकार चाहते थे जो देश की बहुमत आबादी (Majority of population) पर आधारित हो।
- इन्होंने महिलाओं के मताधिकार आंदोलनों (Suffragette movements) का पूरा समर्थन किया।
- उदारवादियों के विपरीत, ये बड़े ज़मींदारों और संपन्न कारखाना मालिकों को प्राप्त किसी भी प्रकार के विशेषाधिकारों के सख्त खिलाफ थे।
- वे निजी संपत्ति के विरोधी नहीं थे, लेकिन वे केवल चंद लोगों के हाथों में संपत्ति के संकेंद्रण (Concentration of wealth in a few hands) का कड़ा विरोध करते थे।
3. रूढ़िवादी (Conservatives):
- ये उदारवादियों और रेडिकलों दोनों के विचारों का कड़ा विरोध करते थे।
- फ्रांसीसी क्रांति से पहले ये किसी भी तरह के बदलाव को खारिज करते थे, लेकिन क्रांति की उथल-पुथल के बाद 19वीं सदी तक आते-आते इन्हें समझ आ गया कि समाज में थोड़ा-बहुत बदलाव अपरिहार्य (ज़रूरी) है।
- इनका मानना था कि अतीत (Past) का सम्मान किया जाना चाहिए, पुरानी परंपराओं को नहीं भूलना चाहिए, और बदलाव की प्रक्रिया बहुत धीमी (Gradual) होनी चाहिए।
2. औद्योगिक समाज और सामाजिक बदलाव (Industrial Society and Social Change)
यह वह समय था जब समाज गहरे सामाजिक और आर्थिक बदलावों से गुज़र रहा था। यह औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) का युग था। नए शहर बस रहे थे, नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित हो रहे थे और रेलवे का तेज़ी से विस्तार हो रहा था।
- औद्योगीकरण ने पुरुषों, महिलाओं और बच्चों—सभी को कारखानों में ला खड़ा किया।
- मज़दूरों की समस्याएं: काम के घंटे बहुत लंबे होते थे (अक्सर 12 से 15 घंटे) और इसके एवज़ में मज़दूरी बहुत ही कम थी। जब बाज़ार में औद्योगिक वस्तुओं की मांग कम होती तो बेरोज़गारी तेज़ी से फैल जाती थी। शहर बहुत तेज़ी से और अनियोजित ढंग से बस रहे थे, इसलिए आवास (Housing) और साफ-सफाई (Sanitation) की भारी समस्या पैदा हो गई थी।
- दिलचस्प बात यह थी कि ज़्यादातर कारखाने उदारवादियों और रेडिकलों की ही निजी संपत्ति थे। उन्होंने व्यापार से बहुत धन कमाया था। उनका मानना था कि अगर मज़दूर स्वस्थ होंगे और नागरिक पढ़े-लिखे होंगे, तो अर्थव्यवस्था बेहतर होगी। इसलिए वे जन्मजात विशेषाधिकारों का विरोध करते हुए मज़दूरों की इन समस्याओं का हल ढूंढना चाहते थे।
🧠 यूरोप में समाजवाद का आगमन (Coming of Socialism to Europe)
19वीं सदी के मध्य तक यूरोप में ‘समाजवाद’ (Socialism) एक बहुत जाना-माना विचार बन गया था जिसने सबका ध्यान आकर्षित किया। समाजवादी निजी संपत्ति (Private Property) के सख्त खिलाफ थे। उनका मानना था कि संपत्ति के निजी स्वामित्व की व्यवस्था ही समाज की सारी समस्याओं की जड़ है। क्यों? क्योंकि संपत्तिधारी केवल अपने निजी मुनाफे के बारे में सोचते हैं, उन मज़दूरों की भलाई के बारे में नहीं जिनकी कड़ी मेहनत से वह संपत्ति या मुनाफा पैदा होता है।
विभिन्न समाजवादियों के विचार (Visions of Socialism):
समाजवादियों के पास भविष्य का एक बिल्कुल अलग नज़रिया था। कुछ लोग ‘कोऑपरेटिव’ (सामूहिक उद्यम) में विश्वास करते थे:
- रॉबर्ट ओवेन (Robert Owen – इंग्लैंड): ये एक प्रमुख अंग्रेज़ उद्योगपति थे। इन्होंने इंडियाना (अमेरिका) में ‘नया समन्वय’ (New Harmony) नामक एक नए तरह के सामूहिक समुदाय (cooperative community) की स्थापना का प्रयास किया।
- लुई ब्लां (Louis Blanc – फ्रांस): ये चाहते थे कि केवल व्यक्तिगत पहल से काम नहीं चलेगा, बल्कि सरकार को पूंजीवादी उद्यमों की जगह ‘सामूहिक उद्यमों’ (cooperatives) को बढ़ावा देना चाहिए, जहाँ लोग मिलकर काम करें और मुनाफे को अपने द्वारा किए गए काम के अनुपात में बांट लें।
- कार्ल मार्क्स (Karl Marx – 1818-1883) और फ्रेडरिक एंगेल्स (Friedrich Engels – 1820-1895): इन दोनों ने इस दिशा में सबसे शक्तिशाली तर्क दिए। मार्क्स का मानना था कि औद्योगिक समाज ‘पूंजीवादी’ (Capitalist) समाज है। फैक्ट्रियों में लगी पूंजी पर पूंजीपतियों का मालिकाना हक है, और उनका मुनाफा मज़दूरों की मेहनत से पैदा होता है।
मार्क्स ने निष्कर्ष निकाला कि जब तक निजी पूंजीपति मुनाफा जमा करते रहेंगे, मज़दूरों की स्थिति कभी नहीं सुधरेगी। मज़दूरों को पूंजीवाद और निजी संपत्ति के शासन को उखाड़ फेंकना होगा। उन्होंने कहा कि भविष्य का समाज एक ‘कम्युनिस्ट समाज’ (Communist Society) होगा जहाँ सारी संपत्ति पर पूरे समाज (राज्य) का सामाजिक नियंत्रण होगा।
समाजवाद के लिए समर्थन (Support for Socialism):
1870 के दशक तक समाजवादी विचार पूरे यूरोप में फैल चुके थे। अपने प्रयासों में समन्वय लाने के लिए समाजवादियों ने ‘द्वितीय इंटरनेशनल’ (Second International – 1889) नाम से एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था बना ली।
- जर्मनी और इंग्लैंड में मज़दूरों ने काम के घंटे कम करने और मताधिकार के लिए संगठन बनाने शुरू कर दिए।
- जर्मनी में इन संगठनों ने ‘सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी’ (SPD) के साथ मिलकर काम किया और उसे संसदीय चुनाव जीतने में मदद की।
- 1905 तक ब्रिटेन के समाजवादियों और ट्रेड यूनियन वालों ने मिलकर ‘लेबर पार्टी’ (Labour Party) बना ली थी, और फ्रांस में ‘सोशलिस्ट पार्टी’ बन गई थी।
- हालांकि 1914 तक यूरोप में समाजवादी कहीं भी सरकार बनाने में सफल नहीं हुए, लेकिन कानून बनवाने में उनकी अहम भूमिका रही।
3. रूसी साम्राज्य – 1914 (The Russian Empire in 1914)
1914 में रूस और उसके विशाल साम्राज्य पर ज़ॉर निकोलस द्वितीय (Tsar Nicholas II) का शासन था। यह एक निरंकुश राजशाही थी, यानी राजा किसी संसद या जनता के प्रति जवाबदेह नहीं था। रूसी साम्राज्य बहुत विशाल था, इसमें आज का फिनलैंड, लातविया, लिथुआनिया, एस्टोनिया, पोलैंड के हिस्से, यूक्रेन और बेलारूस शामिल थे। यह प्रशांत महासागर तक फैला था और इसमें आज के मध्य एशियाई राज्य भी आते थे।
यहाँ का मुख्य धर्म ‘रूसी ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चियनिटी’ था, लेकिन साम्राज्य में कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, मुस्लिम और बौद्ध धर्म के लोग भी रहते थे।
अर्थव्यवस्था और समाज (Economy and Society):
- कृषि (Agriculture): 20वीं सदी की शुरुआत में रूस की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा—लगभग 85%—खेती पर निर्भर था। (इसके विपरीत फ्रांस और जर्मनी में यह अनुपात सिर्फ 40-50% था)। रूसी साम्राज्य के किसान अपनी ज़रूरत और बाज़ार दोनों के लिए उत्पादन करते थे, इसलिए रूस विश्व में अनाज का एक बड़ा निर्यातक (exporter) था।
- उद्योग (Industry): कारखाने बहुत कम थे। प्रमुख औद्योगिक इलाके सेंट पीटर्सबर्ग और मास्को थे। ज़्यादातर उत्पादन कारीगर ही करते थे, लेकिन कारीगरों की वर्कशॉप के साथ-साथ बड़े कारखाने भी मौजूद थे। 1890 के दशक में रूस में रेलवे नेटवर्क का विस्तार हुआ और उद्योगों में विदेशी निवेश तेज़ी से बढ़ा। इसके परिणामस्वरूप कोयले का उत्पादन दोगुना और स्टील का उत्पादन चार गुना हो गया।
- मज़दूरों की हालत (Workers’ Condition): सरकार ने न्यूनतम वेतन और काम के घंटे तय करने के लिए फैक्ट्री इंस्पेक्टर रखे थे, लेकिन नियमों का सरेआम उल्लंघन होता था। कारीगरों की इकाइयों में काम के घंटे 15 घंटे तक होते थे, जबकि कारखानों में 10 से 12 घंटे। मज़दूरों को उनके कौशल (skill) के आधार पर बांटा गया था। धातु कर्मी (Metalworkers) खुद को मज़दूरों में ‘साहब’ (aristocrats) मानते थे क्योंकि उनके काम में अधिक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती थी। 1914 तक महिलाओं की संख्या कारखानों में 31% हो गई थी, लेकिन उन्हें पुरुषों के मुकाबले काफी कम वेतन (आधा या तीन-चौथाई) मिलता था।
इतनी विविधताओं और पहनावे में अंतर के बावजूद, जब भी किसी को नौकरी से निकाला जाता या हड़ताल करनी होती थी, तो मज़दूर तुरंत एकजुट हो जाते थे (जैसे 1896-97 में कपड़ा उद्योग में और 1902 में धातु उद्योग में)। - किसान और ज़मीन (Peasants and Land): देहात की ज़्यादातर ज़मीन पर नवाबों, राजशाही और ऑर्थोडॉक्स चर्च का कब्ज़ा था। फ्रांस के किसानों (जो ज़मींदारों का सम्मान करते थे और उनके लिए लड़े भी थे) के बिल्कुल विपरीत, रूसी किसान नवाबों और ज़मींदारों से नफरत करते थे। वे अक्सर लगान देने से मना कर देते थे और कभी-कभी ज़मींदारों की हत्या भी कर देते थे (1902 में दक्षिणी रूस में बड़े पैमाने पर ऐसा हुआ, और 1905 में तो पूरे रूस में)।
रूसी किसानों की एक सबसे अनूठी विशेषता यह थी कि वे समय-समय पर अपनी सारी ज़मीन अपनी कम्यून (मीर / Mir) को सौंप देते थे और फिर कम्यून प्रत्येक परिवार की ज़रूरत के हिसाब से वह ज़मीन बांटता था। उनकी यह आदत ही उन्हें ‘स्वाभाविक रूप से समाजवादी’ बनाती थी।
4. रूस में समाजवाद (Socialism in Russia)
1914 से पहले रूस में सभी राजनीतिक पार्टियां गैर-कानूनी थीं। लोग छुपकर काम करते थे।
- रशियन सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी (RSDWP): कार्ल मार्क्स के विचारों को मानने वाले समाजवादियों ने 1898 में यह पार्टी बनाई। यह पार्टी मुख्य रूप से कारखानों के मज़दूरों के बीच काम करती थी। यह गुप्त रूप से अपना अख़बार निकालती थी और हड़तालें आयोजित करती थी।
- सोशलिस्ट रेवोल्यूशनरी पार्टी (Socialist Revolutionary Party – 1900): कुछ समाजवादियों का मानना था कि रूसी किसान जिस तरह ज़मीन बांटते हैं, उसके कारण किसान ही रूस में क्रांति की मुख्य शक्ति बनेंगे, मज़दूर नहीं। इसलिए 1900 में यह पार्टी बनी। यह पार्टी किसानों के अधिकारों के लिए लड़ती थी और मांग करती थी कि ज़मींदारों की ज़मीन तुरंत किसानों को सौंप दी जाए।
पार्टी का विभाजन (Bolsheviks vs Mensheviks):
लेनिन का मानना था कि किसान एक एकजुट समूह नहीं हैं (कुछ अमीर हैं, कुछ गरीब, कुछ मज़दूर हैं, कुछ मालिक), इसलिए वे सभी समाजवादी आंदोलन का हिस्सा नहीं हो सकते। संगठन की रणनीति और सदस्यता को लेकर सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी में गहरी दरार आ गई और वह दो हिस्सों में बंट गई:
- बोल्शेविक (Bolsheviks): इनके नेता व्लादिमीर लेनिन (Vladimir Lenin) थे। लेनिन का दृढ़ विश्वास था कि रूस जैसे दमनकारी और तानाशाही वाले समाज में पार्टी अत्यंत अनुशासित होनी चाहिए। इसमें केवल चुनिंदा, योग्य और पूर्णकालिक (full-time) क्रांतिकारियों को ही शामिल किया जाना चाहिए। (क्वालिटी पर ज़ोर)।
- मेन्शेविक (Mensheviks): इनके नेता जूलियस मातोव (Julius Martov) थे। इनका मानना था कि पार्टी जर्मनी की पार्टियों की तरह सभी लोगों के लिए खुली होनी चाहिए। (क्वांटिटी पर ज़ोर)।
🩸 1905 की क्रांति और ‘खूनी रविवार’ (Bloody Sunday)
रूस एक निरंकुश राजशाही था। 20वीं सदी की शुरुआत में उदारवादी, सोशल डेमोक्रेट और सोशलिस्ट रेवोल्यूशनरी मिलकर संविधान की मांग कर रहे थे। 1904 का साल रूसी मज़दूरों के लिए बहुत बुरा साबित हुआ। ज़रूरी चीज़ों की कीमतें इतनी तेज़ी से बढ़ीं कि मज़दूरों के वास्तविक वेतन (Real wages) में 20% की भारी गिरावट आ गई।
- उसी समय 1904 में ‘असेंबली ऑफ रशियन वर्कर्स’ का गठन हुआ था। जब प्यूतिलोव आयरन वर्क्स (Putilov Iron Works) कारखाने में इस असेंबली के 4 मज़दूरों को अचानक नौकरी से निकाल दिया गया, तो मज़दूरों का गुस्सा फूट पड़ा।
- अगले ही कुछ दिनों में सेंट पीटर्सबर्ग के लगभग 1,10,000 मज़दूर हड़ताल पर चले गए। वे काम के घंटे घटाकर 8 घंटे करने, वेतन बढ़ाने और काम की स्थिति सुधारने की मांग कर रहे थे।
- खूनी रविवार (Bloody Sunday): 9 जनवरी 1905 (पुराने रूसी कैलेंडर के अनुसार) को पादरी फादर गैपॉन (Father Gapon) के नेतृत्व में मज़दूरों का एक बहुत बड़ा, शांतिपूर्ण जुलूस ज़ॉर के महल (विंटर पैलेस) की ओर अपनी मांगें लेकर जा रहा था। जब जुलूस महल के पास पहुँचा, तो राजा की पुलिस और कोसेक (Cossacks – घुड़सवार सैनिकों) ने अचानक निहत्थे मज़दूरों पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं।
- इस भयानक घटना में 100 से अधिक मज़दूर मारे गए और लगभग 300 गंभीर रूप से घायल हुए। इतिहास में इस जघन्य हत्याकांड को ही ‘खूनी रविवार’ कहा जाता है। इसने 1905 की क्रांति की शुरुआत की।
परिणाम और ड्यूमा का निर्माण (Creation of Duma): इस घटना के बाद पूरे रूस में हड़तालों की लहर दौड़ गई। विरोध में विश्वविद्यालय बंद कर दिए गए। वकीलों, डॉक्टरों और इंजीनियरों ने ‘यूनियन ऑफ यूनियंस’ बना ली और संविधान सभा की मांग की।
भारी दबाव के आगे झुकते हुए, ज़ॉर ने एक निर्वाचित परामर्शदाता संसद—ड्यूमा (Duma)—के गठन की अनुमति दे दी। हालांकि ज़ॉर अपनी सत्ता पर कोई अंकुश नहीं चाहता था, इसलिए उसने पहली ड्यूमा को मात्र 75 दिनों में, और दूसरी ड्यूमा को 3 महीने में बर्खास्त कर दिया। फिर उसने मतदान के कानून ही बदल दिए ताकि तीसरी ड्यूमा में सिर्फ रूढ़िवादी राजनेता ही भर जाएं और उसे कोई चुनौती न मिले।
5. पहला विश्व युद्ध और रूसी साम्राज्य (First World War and the Russian Empire)
1914 में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया। यह दो बड़े गुटों के बीच था: केंद्रीय शक्तियां (जर्मनी, ऑस्ट्रिया, तुर्की) बनाम मित्र राष्ट्र (फ्रांस, ब्रिटेन, रूस और बाद में इटली व रोमानिया)।
- शुरुआत में रूसियों ने बड़े उत्साह के साथ ज़ॉर का साथ दिया, लेकिन जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचने लगा, ज़ॉर ने ड्यूमा की मुख्य पार्टियों से सलाह लेना बंद कर दिया, जिससे उसका जनसमर्थन तेज़ी से गिरने लगा।
- रूस में जर्मन-विरोधी भावनाएं बहुत तेज़ हो गईं। लोगों ने जर्मन लगने वाले नाम ‘सेंट पीटर्सबर्ग’ का नाम बदलकर पेत्रोग्राद (Petrograd) रख दिया। ज़रीना (महारानी) अलेक्सांद्रा के जर्मन मूल का होने और रासपुतिन (Rasputin) नामक एक भ्रष्ट और पाखंडी संन्यासी के प्रभाव ने राजशाही को जनता के बीच बेहद अलोकप्रिय बना दिया।
- पूर्वी मोर्चे पर रूस की सेनाएं जर्मनी और ऑस्ट्रिया से बहुत बुरी तरह हार रही थीं। 1914 से 1917 के बीच लगभग 70 लाख रूसी सैनिक मारे गए, जो एक दिल दहला देने वाला आंकड़ा था। पीछे हटती हुई रूसी सेना ने रास्ते में अपनी ही फसलों और इमारतों को जला दिया ताकि दुश्मन सेना टिक न सके। इस तबाही से रूस में 30 लाख लोग शरणार्थी (Refugees) बन गए।
- अर्थव्यवस्था पर प्रहार: युद्ध ने उद्योगों को पूरी तरह तबाह कर दिया। बाल्टिक सागर पर जर्मनी का कब्ज़ा होने से रूस को बाहर से मिलने वाली औद्योगिक सामग्री बंद हो गई। 1916 तक रेलवे लाइनें टूटने लगीं। सेहतमंद पुरुषों को युद्ध में झोंक दिया गया, जिससे कारखानों में मज़दूरों की कमी हो गई। शहरों में रहने वालों के लिए पावरोटी और आटे की भारी किल्लत हो गई, जिससे 1916 की सर्दियों में राशन की दुकानों पर दंगे होना आम बात हो गई।
6. पेत्रोग्राद में फरवरी क्रांति (The February Revolution of 1917)
फरवरी 1917 की सर्दियों में राजधानी पेत्रोग्राद शहर की हालत बहुत खराब थी। शहर की बनावट ही ऐसी थी कि उसने वर्ग-विभाजन को और उभार दिया। नेवा नदी (River Neva) के दाएं किनारे पर मज़दूरों के क्वार्टर और कारखाने थे जहाँ भीषण भोजन की कमी थी, और बाएं किनारे पर राजा का महल (विंटर पैलेस), ड्यूमा की इमारत और अमीरों के आलीशान घर थे। उसी फरवरी में ज़ॉर ने ड्यूमा को भंग करने की कोशिश की।
क्रांति का दिन-प्रतिदिन घटनाक्रम:
- 22 फरवरी: दाएं किनारे की एक बड़ी फैक्ट्री में अचानक तालाबंदी (Lockout) कर दी गई। अगले दिन इसके समर्थन में 50 अन्य फैक्ट्रियों के मज़दूर हड़ताल पर चले गए।
- 23 फरवरी (अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस): इन हड़तालों में महिलाओं ने बहुत सक्रिय रूप से नेतृत्व किया और कारखानों में काम रोक दिया। इसीलिए इसी दिन को बाद में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। मज़दूर बाएं किनारे तक पहुँच गए और सरकार को कर्फ्यू लगाना पड़ा।
- 24 और 25 फरवरी: प्रदर्शनकारी फिर से सड़कों पर लौट आए। 25 फरवरी को सरकार ने ड्यूमा को आधिकारिक रूप से बर्खास्त कर दिया, जिससे राजनेता भी गुस्से में सड़कों पर उतर आए।
- 27 फरवरी: प्रदर्शनकारियों ने पुलिस मुख्यालयों पर हमला कर दिया और उन्हें तहस-नहस कर दिया। लोग रोटी, बेहतर वेतन, काम के घंटे कम करने और लोकतंत्र के नारे लगाते हुए सड़कों पर जमा हो गए। सरकार ने सेना (कैवेलरी) को गोलियां चलाने का आदेश दिया, लेकिन सैनिकों ने अपने ही मज़दूर भाइयों पर गोली चलाने से साफ इनकार कर दिया। उल्टे, एक रेजिमेंट की बैरक में अपने ही अफसर को गोली मार दी गई और 3 अन्य रेजिमेंटों ने भी बगावत कर दी। सैनिक और मज़दूर एक साथ मिल गए।
- उसी शाम, सैनिकों और मज़दूरों ने मिलकर उसी इमारत में अपनी एक परिषद बनाई जहाँ ड्यूमा की बैठक होती थी। इसी परिषद को ‘पेत्रोग्राद सोवियत’ (Petrograd Soviet) कहा गया।
राजशाही का अंत: अगले दिन एक प्रतिनिधिमंडल ज़ॉर से मिलने गया। सैन्य कमांडरों की सलाह मानते हुए, 2 मार्च 1917 को ज़ॉर निकोलस द्वितीय ने अपनी गद्दी छोड़ दी। इस तरह 300 साल पुराने रोमनोव राजवंश (Romanov Dynasty) का अंत हुआ और फरवरी क्रांति ने राजशाही को उखाड़ फेंका। सोवियत और ड्यूमा के नेताओं ने मिलकर देश चलाने के लिए एक अंतरिम सरकार (Provisional Government) बना ली और तय किया कि रूस का भविष्य ‘संविधान सभा’ तय करेगी जिसे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से चुना जाएगा।
💡 अप्रैल थीसिस (April Theses) – लेनिन की वापसी
फरवरी क्रांति के बाद, निर्वासित (exile) जीवन बिता रहे बोल्शेविक नेता व्लादिमीर लेनिन अप्रैल 1917 में स्विट्ज़रलैंड से रूस लौट आए। लेनिन का मानना था कि अंतरिम सरकार (जिसमें ज़मींदार, उद्योगपति और सेना के अधिकारी हावी थे) असली क्रांति नहीं ला सकती। उन्होंने घोषणा की कि अब सोवियतों (मज़दूर परिषदों) को सत्ता अपने हाथ में ले लेनी चाहिए। लेनिन ने अपनी तीन स्पष्ट और प्रसिद्ध मांगें रखीं, जिन्हें ‘अप्रैल थीसिस’ (April Theses) कहा जाता है:
- युद्ध तुरंत समाप्त किया जाए (प्रथम विश्व युद्ध से रूस तुरंत बाहर निकले)।
- सारी ज़मीन तुरंत किसानों को सौंप दी जाए।
- सभी बैंकों का राष्ट्रीयकरण (Nationalization) किया जाए।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अपने नए क्रांतिकारी उद्देश्यों को स्पष्ट करने के लिए बोल्शेविक पार्टी का नाम बदलकर ‘कम्युनिस्ट पार्टी’ (Communist Party) रख दिया जाए। शुरू में कई बोल्शेविक नेताओं को लगा कि अभी समाजवादी क्रांति का समय नहीं आया है, लेकिन अगली गर्मियों की घटनाओं ने उनकी सोच बदल दी।
1917 की गर्मियाँ (Summer of 1917):
गर्मियों में मज़दूर आंदोलन फैल गया। कारखानों को चलाने के तरीकों पर सवाल उठाने वाली ‘फैक्ट्री कमेटियां’ बनने लगीं। सेना में ‘सिपाही समितियां’ बनीं। जैसे-जैसे सोवियतों की ताकत बढ़ी, अंतरिम सरकार (अलेक्जेंडर केरेन्स्की के नेतृत्व में) की ताकत कम होने लगी। सरकार ने मज़दूरों और बोल्शेविक नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया (जुलाई के प्रदर्शनों का कठोर दमन किया गया)। उसी समय गांवों में किसानों और समाजवादी क्रांतिकारियों ने ‘भूमि समितियों’ का गठन कर लिया और जुलाई से सितंबर के बीच ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया।
7. अक्टूबर क्रांति (The October Revolution of 1917)
अंतरिम सरकार और बोल्शेविकों के बीच टकराव बढ़ता जा रहा था। लेनिन को डर था कि सरकार तानाशाही स्थापित कर लेगी। इसलिए सितंबर में उन्होंने सरकार के खिलाफ विद्रोह की गुप्त योजना शुरू कर दी। सेना और फैक्ट्रियों में मौजूद बोल्शेविकों को इकट्ठा किया गया।
- 16 अक्टूबर 1917: लेनिन ने पेत्रोग्राद सोवियत और बोल्शेविक पार्टी को सत्ता कब्ज़ाने के लिए राज़ी कर लिया। विद्रोह को अंजाम देने के लिए लियोन ट्रॉट्स्की (Leon Trotsky) के नेतृत्व में एक ‘सैन्य क्रांतिकारी समिति’ (Military Revolutionary Committee) बनाई गई। योजना की तारीख को पूरी तरह गुप्त रखा गया।
- 24 अक्टूबर: विद्रोह शुरू हो गया। प्रधानमंत्री केरेन्स्की (Kerensky) खतरे को भांपते हुए वफादार सैनिकों को बुलाने के लिए शहर से बाहर भाग गए। सरकार के वफादार सैनिकों ने दो बोल्शेविक अख़बारों के दफ्तरों को सील कर दिया और विंटर पैलेस की सुरक्षा के लिए टेलीफोन/टेलीग्राफ दफ्तरों पर कब्ज़ा कर लिया।
- क्रांतिकारी समिति का पलटवार: तुरंत एक्शन लेते हुए, ट्रॉट्स्की की समिति ने अपने समर्थकों को सरकारी कार्यालयों पर कब्ज़ा करने और मंत्रियों को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। रात होते-होते ‘अरोरा’ (Aurora) नामक युद्धपोत ने विंटर पैलेस पर ज़बरदस्त गोलाबारी शुरू कर दी। अन्य युद्धपोतों ने नेवा नदी के रास्ते सैन्य ठिकानों को अपने नियंत्रण में ले लिया।
- रात होने तक पूरा शहर क्रांतिकारी समिति के नियंत्रण में था और सभी मंत्रियों ने आत्मसमर्पण कर दिया था। मॉस्को में कुछ भारी लड़ाई हुई, लेकिन दिसंबर तक बोल्शेविकों ने मॉस्को-पेत्रोग्राद इलाके पर पूरी तरह अपना कब्ज़ा जमा लिया था। ‘अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस’ ने इस कब्ज़े को अपनी मंज़ूरी दे दी।
8. अक्टूबर के बाद क्या बदला? (What Changed After October?)
बोल्शेविक पूरी तरह से निजी संपत्ति के खिलाफ थे और वे इसे जड़ से खत्म करना चाहते थे। सत्ता में आते ही उन्होंने समाज में भारी बदलाव किए:
- नवंबर 1917 में ज़्यादातर बैंकों और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण (Nationalized) कर दिया गया। यानी अब उनका स्वामित्व और प्रबंधन सीधे सरकार के हाथ में था।
- ज़मीन को ‘सामाजिक संपत्ति’ (Social Property) घोषित कर दिया गया और किसानों को ज़मींदारों की ज़मीनों पर कब्ज़ा करने की खुली छूट दे दी गई।
- शहरों में बड़े मकानों का परिवारों की ज़रूरत के हिसाब से बंटवारा कर दिया गया, ताकि बेघर लोगों को छत मिल सके।
- कुलीन वर्ग की पुरानी पदवियों (Titles) के इस्तेमाल पर सख्त रोक लगा दी गई। बदलाव को दिखाने के लिए सेना और अधिकारियों की नई वर्दियां डिज़ाइन की गईं (जैसे 1918 में प्रसिद्ध सोवियत टोपी ‘बुदेनोव्का’ – Budeonovka का चुनाव हुआ)।
- बोल्शेविक पार्टी का नाम बदलकर आधिकारिक रूप से ‘रूसी कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक)’ रख दिया गया।
- जनवरी 1918 में जब संविधान सभा के चुनावों में बोल्शेविकों को बहुमत नहीं मिला और सभा ने उनके प्रस्तावों को खारिज कर दिया, तो लेनिन ने सभा को ही बर्खास्त कर दिया। रूस अब एक एक-दलीय राज्य (One-Party State) बन गया था, जहाँ केवल कम्युनिस्ट पार्टी को ही चुनाव लड़ने का अधिकार था। ट्रेड यूनियनों को पार्टी के नियंत्रण में रखा गया।
- मार्च 1918 में, अपने राजनीतिक सहयोगियों के भारी विरोध के बावजूद, लेनिन ने ब्रेस्ट-लिटोव्स्क (Brest Litovsk) की संधि करके जर्मनी के साथ अपमानजनक शांति समझौता कर लिया और रूस को प्रथम विश्व युद्ध से बाहर निकाल लिया।
- एक खूंखार सीक्रेट पुलिस (जिसे शुरू में चेका / Cheka और बाद में OGPU और NKVD कहा गया) बनाई गई, जो बोल्शेविकों की आलोचना करने वालों को ढूंढ-ढूंढ कर कड़ी सज़ा देती थी।
रूस का गृह युद्ध (The Civil War: 1918-1920):
जब बोल्शेविकों ने ज़मीन पुनर्वितरण (बांटने) का आदेश दिया, तो रूसी सेना टूटने लगी क्योंकि ज़्यादातर सैनिक दरअसल किसान ही थे और वे ज़मीन का अपना हिस्सा लेने के लिए सेना छोड़कर घर जाना चाहते थे। बोल्शेविकों के इस सत्ता कब्ज़े का गैर-बोल्शेविक समाजवादियों, उदारवादियों और राजा के समर्थकों ने कड़ा विरोध किया। उन्होंने अपनी टुकड़ियाँ बनानी शुरू कर दीं।
अब रूस मुख्य रूप से तीन गुटों में बंट गया:
- ‘रेड्स’ (Reds): बोल्शेविक कम्युनिस्ट।
- ‘ग्रीन्स’ (Greens): सोशलिस्ट रेवोल्यूशनरी (समाजवादी क्रांतिकारी)।
- ‘वाइट्स’ (Whites): ज़ॉर (राजा) के समर्थक रूढ़िवादी।
ग्रीन्स और वाइट्स को फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन और जापान की सरकारों का समर्थन और हथियार मिल रहे थे क्योंकि ये देश रूस में समाजवाद के बढ़ने से खौफज़दा थे। इसके परिणामस्वरूप रूस में भयंकर गृह युद्ध छिड़ गया जिसमें लूटमार, भुखमरी और मारकाट मची। वाइट्स ने ज़मीन पर कब्ज़ा करने वाले किसानों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया, जिससे जनता का समर्थन पूरी तरह रेड्स (बोल्शेविकों) की तरफ हो गया।
अंततः 1920 तक बोल्शेविकों ने गैर-रूसी राष्ट्रवादियों और मुस्लिम जदीदियों (Jadidists – मुस्लिम समाज के आधुनिकीकरण के समर्थक) के सहयोग से पूर्व रूसी साम्राज्य के ज़्यादातर हिस्सों पर नियंत्रण पा लिया। दिसंबर 1922 में बोल्शेविकों ने रूसी साम्राज्य से बने नए राष्ट्र को सोवियत संघ (USSR – Union of Soviet Socialist Republics) का नाम दिया।
9. समाजवादी समाज का निर्माण (Making a Socialist Society)
गृह युद्ध के दौरान भी बोल्शेविकों ने बैंकों और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण जारी रखा था। शांति स्थापित होने के बाद, उन्होंने आर्थिक विकास के लिए केंद्रीयकृत नियोजन (Centralized Planning) की शुरुआत की।
- सरकारी अधिकारियों ने यह तय किया कि अर्थव्यवस्था कैसे काम करेगी और इसके लक्ष्य क्या होंगे। इसी आधार पर पंचवर्षीय योजनाएं (Five Year Plans) बनाई गईं। पहली दो योजनाओं (1927-32 और 1933-38) के दौरान सरकार का पूरा ध्यान औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने पर था, जिसके लिए सरकार ने सभी कीमतें स्थिर कर दीं।
- नियोजन का असर दिखा और औद्योगिक उत्पादन बहुत तेज़ी से बढ़ा। मैग्नीटोगोर्स्क (Magnitogorsk) शहर में एक विशाल स्टील प्लांट मात्र 3 साल के रिकॉर्ड समय में बनकर तैयार हो गया।
- लेकिन इस तेज़ निर्माण के कारण मज़दूरों के काम करने की स्थितियां बहुत अमानवीय थीं। कड़ाके की ठंड (माइनस 40 डिग्री) में भी मज़दूरों को शौचालय के लिए चौथी मंज़िल से नीचे भागना पड़ता था। पहले साल में ही काम 550 बार रुका।
- इसके समाधान के लिए सरकार ने विस्तारित शिक्षा प्रणाली विकसित की। कारखानों के मज़दूरों और किसानों को विश्वविद्यालयों में दाखिला दिलाने के विशेष इंतज़ाम किए गए। महिला मज़दूरों के बच्चों के लिए कारखानों में ‘क्रेच’ (बालवाड़ियाँ) खोले गए। सस्ती सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं शुरू की गईं और मज़दूरों के लिए मॉडल क्वार्टर बनाए गए।
🌾 स्तालिनवाद और सामूहिकीकरण (Stalinism and Collectivization)
1924 में लेनिन की मृत्यु के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की कमान जोसेफ स्तालिन (Joseph Stalin) के कठोर हाथों में आ गई। नियोजित अर्थव्यवस्था का शुरुआती दौर कृषि क्षेत्र में भारी तबाही लेकर आया। 1927-28 के आसपास सोवियत संघ के शहरों में अनाज की भारी कमी पैदा हो गई। सरकार ने अनाज की कीमतें तय कर दी थीं, लेकिन किसान उस कम दाम पर सरकार को अनाज बेचने को तैयार नहीं थे।
- स्तालिन का मानना था कि अमीर किसान (जिन्हें रूस में ‘कुलक’ / Kulaks कहा जाता था) और व्यापारी अधिक मुनाफे की उम्मीद में जानबूझकर अनाज की जमाखोरी कर रहे हैं।
- 1928 में पार्टी के सदस्यों ने अनाज उत्पादक इलाकों का दौरा किया, ज़बरदस्ती अनाज खरीदा और कुलकों के ठिकानों पर छापे मारे। जब इससे भी अनाज की कमी दूर नहीं हुई, तो स्तालिन ने सामूहिकीकरण (Collectivization) का क्रूर और सख्त कार्यक्रम शुरू किया। तर्क यह दिया गया कि छोटे खेतों का आधुनिकीकरण नहीं किया जा सकता, इसलिए राज्य के नियंत्रण वाले विशाल कृषि फार्म बनाने होंगे।
- 1929 से सरकार ने सभी किसानों को मजबूर किया कि वे अपने निजी खेत छोड़कर सामूहिक खेतों (जिन्हें ‘कोल्खोज’ / Kolkhoz कहा जाता था) में एक साथ काम करें। किसानों की ज़मीन और औज़ार कोल्खोज (सामूहिक फार्म) को सौंप दिए गए और मुनाफे को सबमें बांटा जाने लगा।
- गुस्साए किसानों ने विरोध में अपने ही जानवरों (गाय-बैल, सूअर) को मारना शुरू कर दिया। 1929 से 1931 के बीच मवेशियों की संख्या एक-तिहाई कम हो गई। जो किसान इसका विरोध करते थे, उन्हें कड़ी सज़ा दी जाती थी, निर्वासित (exile/देश निकाला) कर दिया जाता था।
- इतनी सख्ती और खून-खराबे के बावजूद उत्पादन तुरंत नहीं बढ़ा। इसके विपरीत, 1930-1933 के बीच लगातार खराब फसल के कारण सोवियत इतिहास का सबसे बड़ा अकाल पड़ा जिसमें 40 लाख से अधिक लोग मारे गए। स्तालिन की नीतियों की आलोचना करने वाले पार्टी के ही कई सदस्यों पर ‘समाजवाद के खिलाफ साज़िश’ रचने का आरोप लगाकर उन्हें जेलों और श्रम शिविरों (Labour Camps) में डाल दिया गया (1939 तक 20 लाख से ज़्यादा लोग जेलों में थे)।
10. रूसी क्रांति का वैश्विक प्रभाव (Global Influence)
बोल्शेविकों ने जिस हिंसक तरीके से सत्ता पर कब्ज़ा किया था और जिस तानाशाही तरीके से वे देश चला रहे थे (एक दलीय शासन, सीक्रेट पुलिस), उससे यूरोप की कई मौजूदा समाजवादी पार्टियां पूरी तरह सहमत नहीं थीं। इसके बावजूद, एक ‘मेहनतकश (मज़दूर) वर्ग के राज्य’ की स्थापना ने पूरी दुनिया के शोषित लोगों में एक नई उम्मीद जगाई।
- पूरी दुनिया के कई देशों में नई ‘कम्युनिस्ट पार्टियों’ का गठन हुआ (जैसे ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी)।
- बोल्शेविकों ने उपनिवेशों (Colonies – जैसे भारत, चीन) की जनता को भी अपने अधिकारों के लिए लड़ने और साम्राज्यवादी यूरोपीय शासकों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए प्रोत्साहित किया।
- उन्होंने दुनिया भर के समाजवादियों का एक अंतर्राष्ट्रीय महासंघ बनाया जिसे कॉमिन्टर्न (Comintern – Communist International – 1919) कहा गया।
- कई गैर-रूसी लोगों और भारत जैसे देशों के नेताओं (जैसे एम. एन. रॉय) ने मास्को की ‘कम्युनिस्ट यूनिवर्सिटी ऑफ द वर्कर्स ऑफ द ईस्ट’ में राजनीतिक शिक्षा प्राप्त की।
- दूसरे विश्व युद्ध (1939-45) के शुरू होने तक, सोवियत संघ ने समाजवाद को पूरी दुनिया में एक नई पहचान और महाशक्ति की हैसियत दिला दी थी।
- हालाँकि 20वीं सदी के अंत तक दुनिया भर में यह मान लिया गया कि सोवियत संघ की कार्यप्रणाली समाजवादी आदर्शों के अनुरूप नहीं थी (वहाँ लोकतंत्र नहीं था और दमन बहुत था), फिर भी यह सच है कि समाजवाद और समानता के विचार आज भी दुनिया भर में गहराई से सम्मानित हैं।
कक्षा 9 इतिहास अध्याय 3
नात्सीवाद और हिटलर का उदय
(Nazism and the Rise of Hitler)
📌 अध्याय का परिचय (Chapter Introduction)
1945 के वसंत में हेल्मुत नामक एक 11 वर्षीय जर्मन लड़के ने अपने पिता (जो एक प्रमुख चिकित्सक और कट्टर नात्सी समर्थक थे) को अपनी माँ से यह कहते सुना कि “क्या अब मुझे पूरे परिवार को खत्म कर देना चाहिए या अकेले आत्महत्या कर लेनी चाहिए?” अगले दिन उसके पिता ने अपने ही दफ्तर में खुद को गोली मार ली। दरअसल, मई 1945 में जर्मनी ने मित्र राष्ट्रों (Allies) के सामने पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया था। हिटलर और उसके प्रचार मंत्री गोएबल्स (Goebbels) ने बर्लिन के एक बंकर में अप्रैल में ही आत्महत्या कर ली थी। हेल्मुत के पिता को डर था कि मित्र राष्ट्र अब उनके साथ वैसा ही बर्ताव करेंगे जैसा नात्सियों ने यहूदियों और अपाहिजों के साथ किया था।
नूर्नबर्ग ट्रिब्यूनल (Nuremberg Tribunal): युद्ध के बाद, नात्सी युद्ध-बंदियों पर मुकदमा चलाने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय सैनिक अदालत बनाई गई। नात्सियों पर ‘शांति के खिलाफ अपराध’, ‘युद्ध अपराध’ और ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ (Crimes against Humanity) का मुकदमा चला। नात्सियों ने यूरोप के लगभग 60 लाख यहूदियों, 2 लाख जिप्सियों, 10 लाख पोलैंडवासियों और 70 हज़ार अपाहिज/बीमार जर्मन नागरिकों का योजनाबद्ध तरीके से कत्लेआम किया था। अदालत ने केवल 11 प्रमुख नात्सियों को मौत की सज़ा दी, जिसे कई लोगों ने उनके द्वारा किए गए भयानक अपराधों के मुकाबले बहुत छोटी सज़ा माना।
1. वाइमर गणराज्य का जन्म (Birth of the Weimar Republic)
बीसवीं सदी की शुरुआत में जर्मनी एक बहुत ताकतवर साम्राज्य था। 1914 में उसने ऑस्ट्रियाई साम्राज्य के साथ मिलकर मित्र राष्ट्रों (इंग्लैंड, फ्रांस, रूस) के खिलाफ प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) लड़ा। शुरू में जर्मनी को सफलता मिली, उसने फ्रांस और बेल्जियम पर कब्ज़ा कर लिया। लेकिन 1917 में अमेरिका के मित्र राष्ट्रों में शामिल होने से जर्मनी कमज़ोर पड़ गया और अंततः नवंबर 1918 में घुटने टेकने पर मजबूर हो गया।
वाइमर गणराज्य की स्थापना और उसकी कमज़ोरियाँ:
- जर्मनी की हार के बाद वहाँ के सम्राट (कैसर विल्हेम द्वितीय) ने पद छोड़ दिया। इसके बाद संसदीय पार्टियों ने वाइमर (Weimar) नामक स्थान पर एक राष्ट्रीय सभा बुलाई।
- उन्होंने एक लोकतांत्रिक संविधान पारित किया जिसमें एक संघीय ढांचा और ‘सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार’ (महिलाओं सहित सभी को वोट का अधिकार) शामिल था। जर्मन संसद को राइकस्टैग (Reichstag) कहा जाता था।
- संविधान की दो जन्मजात कमज़ोरियाँ: इस नए गणराज्य की जड़ें बहुत कमज़ोर थीं। पहली कमी थी ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व’ (Proportional Representation) का नियम, जिसके कारण किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलना लगभग असंभव था और हमेशा गठबंधन सरकारें बनती थीं (14 वर्षों में 20 बार सरकारें बदलीं)। दूसरी सबसे बड़ी कमी थी अनुच्छेद 48 (Article 48), जो राष्ट्रपति को आपातकाल लागू करने, नागरिक अधिकारों को रद्द करने और केवल अध्यादेशों (decrees) के ज़रिए शासन चलाने का असीमित अधिकार देता था। इन्हीं कमियों ने आगे चलकर तानाशाही का रास्ता साफ़ किया।
📜 वर्साय की शांति संधि (The Treaty of Versailles – 1919)
यह जर्मनी पर थोपी गई एक बहुत ही कठोर, एकतरफा और अपमानजनक संधि थी:
- जर्मनी को अपने सारे विदेशी उपनिवेश (Colonies), 13% भू-भाग, 75% लौह भंडार और 26% कोयला भंडार फ्रांस, पोलैंड, डेनमार्क और लिथुआनिया के हवाले करने पड़े।
- मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी की सेना को भंग कर दिया (Demilitarized) ताकि वह दोबारा सिर न उठा सके।
- युद्ध अपराध बोध अनुच्छेद (War Guilt Clause): इस अनुच्छेद के तहत पूरे युद्ध और उसके भयानक नुकसान के लिए केवल जर्मनी को ज़िम्मेदार ठहराया गया।
- हर्जाने के तौर पर जर्मनी पर 6 अरब पाउंड (6 Billion Pounds) का भारी जुर्माना लगाया गया।
- जर्मनी के खनिज-समृद्ध इलाके राइनलैंड (Rhineland) पर 1920 के दशक में मित्र राष्ट्रों ने कब्ज़ा कर लिया।
जर्मनी के लोग इस संधि को एक कलंक मानते थे। जो लोग इस नए वाइमर गणराज्य का समर्थन करते थे (जैसे समाजवादी, कैथोलिक और डेमोक्रेट्स), उन्हें रूढ़िवादी लोग चिढ़ाकर ‘नवंबर के अपराधी’ (November Criminals) कहते थे और उन्हें आसान निशाना बनाया जाता था।
युद्ध का असर (The Effects of the War):
इस युद्ध ने पूरे यूरोप को मनोवैज्ञानिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया था। यूरोप जो पहले ‘कर्ज़ देने वाला महाद्वीप’ था, अब ‘कर्ज़दारों का महाद्वीप’ बन गया।
- समाज में सैनिकों को आम नागरिकों से ज़्यादा सम्मान दिया जाने लगा। राजनेता और प्रचारक इस बात पर ज़ोर देने लगे कि पुरुषों को आक्रामक, ताक़तवर और मर्दाना होना चाहिए।
- खंदकों (Trenches) की ज़िंदगी का महिमामंडन किया गया, हालाँकि सच्चाई यह थी कि सैनिक चूहों, लाशों और ज़हरीली गैसों के बीच घुट-घुट कर बहुत दयनीय जीवन जी रहे थे।
- तानाशाही और आक्रामक राष्ट्रीयता को बढ़ावा मिला, और नवजात लोकतंत्र एक कमज़ोर और अस्थिर विचार लगने लगा।
राजनीतिक रेडिकलवाद और आर्थिक संकट:
- स्पार्टकिस्ट लीग (Spartacist League): जिस समय वाइमर गणराज्य बन रहा था, रूस की बोल्शेविक क्रांति की तर्ज़ पर जर्मनी में ‘स्पार्टकिस्ट लीग’ ने विद्रोह कर दिया। वे सोवियत शैली की सरकार चाहते थे। लेकिन वाइमर गणराज्य ने पुराने सैनिकों के संगठन (जिन्हें ‘फ्री कोर’ / Free Corps कहा जाता था) की मदद से इस विद्रोह को बेरहमी से कुचल दिया। इसके बाद स्पार्टकिस्टों ने ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ जर्मनी’ बना ली। इसके बाद कम्युनिस्ट और समाजवादी एक-दूसरे के पक्के दुश्मन बन गए और वे कभी भी मिलकर हिटलर का सामना नहीं कर पाए।
- अति-मुद्रास्फीति (Hyperinflation – 1923): जर्मनी ने प्रथम विश्व युद्ध कर्ज़ लेकर लड़ा था और उसे हर्जाना भी स्वर्ण (Gold) में चुकाना पड़ रहा था। 1923 में जब स्वर्ण भंडार खत्म होने लगे, तो जर्मनी ने हर्जाना देने से मना कर दिया। जवाब में फ्रांस ने उसके मुख्य औद्योगिक इलाके रूर (Ruhr) पर कब्ज़ा कर लिया जहाँ कोयले का विशाल भंडार था।
बदले में, जर्मनी ने अंधाधुंध कागज़ी मुद्रा (मार्क) छापना शुरू कर दिया। इससे मुद्रा का मूल्य बुरी तरह गिर गया। अप्रैल में 1 अमेरिकी डॉलर 24,000 मार्क के बराबर था, जो अगस्त में 46 लाख और दिसंबर तक 9.8 करोड़ मार्क हो गया! एक पैकेट ब्रेड खरीदने के लिए लोगों को बैलगाड़ी भरकर नोट ले जाने पड़ते थे। इस खतरनाक आर्थिक स्थिति को ‘अति-मुद्रास्फीति’ (Hyperinflation) कहा जाता है। अंततः अमेरिका ने ‘डॉवेस योजना’ (Dawes Plan) लाकर और कर्ज़ की शर्तें आसान करके जर्मनी को इस संकट से निकाला।
2. हिटलर का उदय (Hitler’s Rise to Power)
एडोल्फ हिटलर का जन्म 1889 में ऑस्ट्रिया के ब्राउनाउ (Braunau) में हुआ था। उसका बचपन बहुत गरीबी में बीता। जवानी में वह चित्रकार बनना चाहता था लेकिन सफल नहीं हुआ। प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने पर वह जर्मन सेना में भर्ती हो गया। उसने शुरुआत में एक संदेशवाहक (Messenger) के रूप में काम किया और अपनी बहादुरी के लिए कई मेडल (Iron Cross) जीते। 1918 में जर्मनी की हार और विशेषकर वर्साय की संधि ने उसे आगबबूला कर दिया और उसने राजनीति में आने का फैसला किया।
नात्सी पार्टी की स्थापना और प्रोपेगैंडा:
- 1919 में हिटलर ने ‘जर्मन वर्कर्स पार्टी’ नामक एक छोटे से समूह की सदस्यता ली। अपनी उत्कृष्ट भाषण कला और संगठन क्षमता से उसने जल्द ही इस पर नियंत्रण कर लिया और इसका नाम बदलकर ‘नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी’ रख दिया। इसी को बाद में नात्सी पार्टी (Nazi Party) कहा गया।
- 1923 में उसने बावरिया और म्यूनिख (Munich) पर कब्ज़ा करने और बर्लिन तक मार्च करने की योजना बनाई, लेकिन वह पकड़ा गया। उस पर देशद्रोह का मुकदमा चला, हालाँकि उसे बहुत कम सज़ा के बाद जल्द ही छोड़ दिया गया।
- नात्सी रैलियों का जादुई प्रभाव: हिटलर जन-समर्थन जुटाने के लिए रैलियों और प्रोपेगैंडा की अहमियत को बहुत अच्छी तरह समझता था। नात्सियों ने स्वस्तिक (Swastika) छपे हुए लाल झंडे, नात्सी सैल्यूट (सलामी), और भाषणों के बाद एक खास ताल में तालियाँ बजाने का तरीका अपनाया। इन विशाल और अनुशासित रैलियों ने जनता के मन में यह छवि बिठा दी कि केवल नात्सी पार्टी ही जर्मनी को एकजुट और मज़बूत कर सकती है।
महामंदी (The Great Depression – 1929) का प्रभाव:
नात्सीवाद वास्तव में 1929 की वैश्विक आर्थिक महामंदी के बाद ही एक बड़ा जन-आंदोलन बन पाया।
- 1929 में अमेरिका का वॉल स्ट्रीट एक्सचेंज (शेयर बाज़ार) पूरी तरह क्रैश हो गया। जो अमेरिका अब तक जर्मनी को कर्ज़ दे रहा था, उसने अपनी मदद रोक दी और कर्ज़ वापस मांगने लगा। जर्मनी की अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह गई।
- 1932 तक जर्मनी का औद्योगिक उत्पादन 40% गिर गया। लगभग 60 लाख लोग बेरोज़गार हो गए। बेरोज़गार नौजवान गले में तख्तियां लटकाए घूमते थे: “मैं कोई भी काम करने को तैयार हूँ।” लोग अपराध का रास्ता अपनाने लगे।
- मध्यम वर्ग (वेतनभोगी, छोटे व्यापारी और पेंशनभोगी) को डर सताने लगा कि उनकी बचत खत्म हो रही है। उन्हें ‘सर्वहाराकरण’ (Proletarianisation) का डर था—यानी उन्हें खौफ था कि वे भी मज़दूर वर्ग के स्तर पर आ गिरेंगे या बेरोज़गार हो जाएंगे।
- हिटलर एक मसीहा के रूप में: ऐसे घोर संकट और निराशा के समय में नात्सी प्रोपेगैंडा ने लोगों को एक बेहतर भविष्य की उम्मीद दिखाई। हिटलर एक ज़बरदस्त वक्ता (Orator) था। उसके शब्दों में जादू था। उसने वादा किया कि वह एक मज़बूत राष्ट्र बनाएगा, वर्साय की संधि के अन्याय का बदला लेगा, बेरोज़गारों को रोज़गार देगा, और जर्मनी को विदेशी साज़िशों से मुक्त करेगा।
परिणामस्वरूप, जो नात्सी पार्टी 1928 के राइकस्टैग चुनावों में केवल 2.6% वोट पा सकी थी, वह 1932 के चुनावों में 37% वोटों के साथ जर्मन संसद की सबसे बड़ी पार्टी बन गई।
3. लोकतंत्र का ध्वंस (The Destruction of Democracy)
30 जनवरी 1933 को राष्ट्रपति हिंडनबर्ग (Hindenburg) ने हिटलर को कैबिनेट के सबसे शक्तिशाली पद, चांसलर (Chancellor) का पद ऑफर किया। सत्ता हासिल करने के बाद हिटलर ने लोकतांत्रिक शासन की संरचनाओं को बड़ी चालाकी से ध्वस्त करना शुरू कर दिया।
- अग्नि अध्यादेश (Fire Decree): 27 फरवरी 1933 को संसद भवन (Reichstag) में रहस्यमय तरीके से आग लग गई। इसका फायदा उठाते हुए हिटलर ने 28 फरवरी को ‘अग्नि अध्यादेश’ जारी किया, जिसके ज़रिए वाइमर संविधान द्वारा दी गई अभिव्यक्ति, प्रेस और सभा करने की आज़ादी को अनिश्चित काल के लिए निलंबित (रद्द) कर दिया गया।
- कम्युनिस्टों का दमन: इसके तुरंत बाद हिटलर ने अपने सबसे बड़े राजनीतिक दुश्मनों, कम्युनिस्टों, पर निशाना साधा और उनमें से ज़्यादातर को रातों-रात नवनिर्मित कॉन्सेन्ट्रेशन कैंपों (Concentration Camps – यातना शिविरों) में बंद कर दिया।
🚨 विशेषाधिकार अधिनियम (The Enabling Act – 3 मार्च 1933)
यह वह ऐतिहासिक कानून था जिसने जर्मनी में आधिकारिक रूप से तानाशाही (Dictatorship) स्थापित कर दी।
- इस कानून ने संसद को हाशिए पर धकेल दिया और हिटलर को केवल ‘अध्यादेशों’ (Decrees) के ज़रिए शासन करने के पूर्ण अधिकार दे दिए।
- नात्सी पार्टी और उससे जुड़े संगठनों को छोड़कर सभी राजनीतिक पार्टियों और स्वतंत्र ट्रेड यूनियनों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया।
- अर्थव्यवस्था, मीडिया, सेना और न्यायपालिका पर राज्य (और परोक्ष रूप से हिटलर) का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया।
सुरक्षा बलों का आतंक:
समाज पर नियंत्रण रखने के लिए हिटलर ने खूंखार पुलिस बल बनाए। नियमित ‘हरी वर्दी वाली पुलिस’ और एसए (SA – स्टॉर्म ट्रूपर्स) के अलावा उसने कई नए बल बनाए:
- गेस्टापो (Gestapo – खूंखार गुप्तचर राज्य पुलिस)
- एसएस (SS – सुरक्षा बल)
- एसडी (SD – सुरक्षा सेवा)
इन बलों को असीमित संवैधानिक अधिकार दिए गए। वे किसी को भी बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकते थे, यातना शिविरों (Concentration camps) में भेज सकते थे, या उन्हें हमेशा के लिए गायब कर सकते थे। इस खौफनाक पुलिसिया आतंक के कारण नात्सी राज्य को इतिहास का सबसे खूंखार आपराधिक राज्य माना गया।
4. पुनर्निर्माण और विदेशी नीति (Reconstruction & Foreign Policy)
हिटलर ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की ज़िम्मेदारी मशहूर अर्थशास्त्री ह्यालमार शाख्त (Hjalmar Schacht) को सौंपी।
- शाख्त ने ‘डेफिसिट फाइनेंसिंग’ (घाटे की अर्थव्यवस्था) का सहारा लेते हुए राज्य द्वारा वित्तपोषित (State-funded) रोज़गार सृजन कार्यक्रमों के ज़रिए ‘पूर्ण उत्पादन और पूर्ण रोज़गार’ का लक्ष्य रखा।
- इसी प्रोजेक्ट के तहत जर्मनी के मशहूर ‘सुपर हाईवे’ (Autobahns) बने और आम जनता की कार ‘फॉक्सवैगन’ (Volkswagen) का निर्माण हुआ, जिससे अर्थव्यवस्था को बहुत गति मिली।
आक्रामक विदेश नीति (Aggressive Foreign Policy):
विदेश नीति के मोर्चे पर हिटलर को त्वरित और हैरान करने वाली सफलताएँ मिलीं:
- 1933 में उसने जर्मनी को ‘लीग ऑफ नेशंस’ (League of Nations) से बाहर निकाल लिया, यह कहकर कि यह संधि जर्मनी के साथ भेदभाव करती है।
- 1936 में उसने वर्साय की संधि का खुला उल्लंघन करते हुए राइनलैंड (Rhineland) पर दोबारा सैन्य कब्ज़ा कर लिया।
- 1938 में उसने “एक जन, एक साम्राज्य, एक नेता” (One people, One empire, One leader) के नारे के साथ ऑस्ट्रिया का जर्मनी में विलय कर लिया। इसके बाद उसने चेकोस्लोवाकिया के जर्मन-भाषी इलाके (सुडेटेनलैंड) को हड़प लिया और फिर पूरे देश पर कब्ज़ा कर लिया। इन सभी कदमों में उसे इंग्लैंड का मौन समर्थन मिल रहा था, क्योंकि इंग्लैंड भी अंदर ही अंदर मानता था कि वर्साय की संधि जर्मनी के साथ बहुत कठोर थी।
द्वितीय विश्व युद्ध की ओर: अर्थशास्त्री शाख्त ने हिटलर को सलाह दी कि जब तक देश का बजट घाटे में है, तब तक हथियारों पर अंधाधुंध पैसा खर्च न करे। हिटलर को ऐसी ‘डरपोक’ सलाह पसंद नहीं थी, इसलिए शाख्त को पद से हटा दिया गया। हिटलर ने आर्थिक संकट से उबरने का रास्ता ‘युद्ध और विस्तार’ को चुना। उसका मानना था कि देश की सीमाएँ बढ़ाकर ही ज़्यादा संसाधन जुटाए जा सकते हैं।
- सितंबर 1939 में जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया। इसी के साथ द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया, क्योंकि फ्रांस और इंग्लैंड ने पोलैंड के समर्थन में जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी।
- सितंबर 1940 में जर्मनी, इटली और जापान के बीच एक त्रिपक्षीय संधि (Tripartite Pact) हुई, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिटलर का दावा और मज़बूत हो गया।
- ऐतिहासिक भूल (Historic Blunder): जून 1941 में हिटलर ने अपनी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी भूल की—उसने सोवियत संघ (रूस) पर हमला कर दिया। उसका सपना पूर्वी यूरोप में जर्मनों के रहने की जगह (Lebensraum) हासिल करना था। लेकिन अब जर्मनी को दो मोर्चों पर एक साथ लड़ना पड़ रहा था (पश्चिम में शक्तिशाली ब्रिटिश बमबारी और पूर्व में खूंखार सोवियत लाल सेना)। सोवियत सेना ने स्तालिनग्राद (Stalingrad) में जर्मन सेना को कुचल दिया और उन्हें पीछे धकेलते हुए बर्लिन तक खदेड़ दिया, जिससे अगली आधी सदी तक पूर्वी यूरोप पर सोवियत संघ का वर्चस्व स्थापित हो गया।
- अमेरिका की एंट्री: अमेरिका युद्ध से दूर रहना चाहता था क्योंकि वह पहले विश्व युद्ध के आर्थिक नुकसान से उबर रहा था। लेकिन जब जापान ने प्रशांत महासागर में अपनी ताकत बढ़ाते हुए अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर (Pearl Harbor) पर बमबारी की, तो अमेरिका भी युद्ध में कूद पड़ा। युद्ध मई 1945 में हिटलर की हार और जापान के हिरोशिमा (Hiroshima) पर अमेरिकी परमाणु बम गिराने के साथ समाप्त हुआ।
5. नात्सी विश्वदृष्टिकोण (The Nazi Worldview)
नात्सियों के अपराध कोई छिटपुट घटनाएं नहीं थीं, बल्कि वे एक सुव्यवस्थित विचारधारा और दुनिया को देखने के एक बहुत ही विकृत नज़रिए का हिस्सा थीं। नात्सी विचारधारा में सभी लोग बराबर नहीं थे, बल्कि उन्हें एक नस्लीय पदानुक्रम (Racial Hierarchy) में रखा गया था।
- सबसे ऊपर: सुनहरे बालों और नीली आंखों वाले नॉर्डिक जर्मन आर्य (Nordic German Aryans)। हिटलर के अनुसार ये दुनिया की सबसे शुद्ध और श्रेष्ठ नस्ल थी जिसे दुनिया पर राज करने का प्राकृतिक हक था।
- सबसे नीचे: यहूदी (Jews)। इन्हें आर्यों का सबसे कट्टर दुश्मन, ‘समाज का वायरस’ और जर्मनी की हार सहित सभी बुराइयों की जड़ माना जाता था।
- बीच में बाकी नस्लें थीं, जिन्हें उनके बाहरी रंग-रूप के आधार पर स्थान दिया गया था।
विज्ञान का दुरुपयोग:
हिटलर ने अपने नस्लवादी विचारों को सही ठहराने के लिए चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) और हर्बर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) के वैज्ञानिक सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल किया। डार्विन ने ‘प्राकृतिक चयन’ का सिद्धांत दिया था (प्रकृति में बदलाव), और स्पेंसर ने ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ (Survival of the fittest – जो सबसे योग्य है, वही ज़िंदा बचेगा) का विचार दिया था। नात्सियों ने तर्क दिया कि सबसे शक्तिशाली नस्ल (आर्य) ज़िंदा रहेगी और कमज़ोर नस्लें नष्ट हो जाएंगी। (जबकि डार्विन एक प्रकृतिविद् थे और उन्होंने कभी इंसानी समाजों के संदर्भ में इस सिद्धांत की वकालत नहीं की थी)।
लेबेन्सराउम (Lebensraum – Living Space):
हिटलर की भू-राजनीतिक विचारधारा का दूसरा प्रमुख पहलू था ‘लेबेन्सराउम’ यानी रहने की जगह (Living Space)। उसका मानना था कि अपने लोगों को बसाने के लिए नए इलाकों (विशेषकर पूर्वी यूरोप और रूस) पर कब्ज़ा करना ज़रूरी है। इससे मातृभूमि का क्षेत्रफल बढ़ेगा, जर्मन राष्ट्र के भौतिक संसाधन बढ़ेंगे, और नए क्षेत्रों में बसने वाले जर्मन लोग अपनी मातृभूमि से गहरे जुड़े रहेंगे। पोलैंड पर हमला इसी सोच का पहला प्रायोगिक परिणाम था।
नस्लीय राज्य की स्थापना और ‘यूथेनेशिया’ (Euthanasia):
सत्ता में आते ही नात्सियों ने एक ‘शुद्ध और स्वस्थ नॉर्डिक आर्य समाज’ बनाने की अपनी योजना लागू कर दी। उन्होंने उन सभी लोगों का सफाया करना शुरू कर दिया जिन्हें वे ‘अवांछित’ (Undesirable) मानते थे।
- यूथेनेशिया कार्यक्रम (Euthanasia Programme): इस कुख्यात ‘दया-मृत्यु’ कार्यक्रम के तहत नात्सी अफसरों ने उन सभी जर्मन नागरिकों (जिन्हें शारीरिक या मानसिक रूप से अयोग्य / अपाहिज माना गया) को ज़हरीले इंजेक्शन देकर या गैस चैंबरों में मार डाला। (हेल्मुत के पिता इसी कार्यक्रम में शामिल थे)।
- जर्मनी में रहने वाले जिप्सियों (सिंती और रोमा समुदाय) और अश्वेतों (Blacks) को भी अवांछित घोषित कर दिया गया और उन्हें यातना शिविरों में डाल दिया गया।
- रूसियों और पोलैंडवासियों को ‘उप-मानव’ (Sub-human) माना गया और जब जर्मनी ने उनके इलाकों पर कब्ज़ा किया, तो उन्हें जानवरों की तरह गुलाम बनाकर कठोर काम करवाया गया जहाँ कई भूख और थकावट से मर गए।
6. नात्सी जर्मनी में युवा और मातृत्त्व (Youth and Motherhood)
हिटलर का मानना था कि एक मज़बूत नात्सी समाज तभी बन सकता है जब बच्चों को बचपन से ही नात्सी विचारधारा की घुट्टी पिलाई जाए। इसके लिए स्कूलों के अंदर और बाहर दोनों जगह बच्चों पर पूरा वैचारिक नियंत्रण होना ज़रूरी था।
स्कूलों की सफाई (Purification of Schools):
- सत्ता में आते ही सभी स्कूलों की ‘सफाई’ की गई। जो शिक्षक यहूदी थे या जिन्हें राजनीतिक रूप से अविश्वसनीय माना जाता था, उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और बाद में गैस चैंबरों में मार दिया गया।
- जर्मन और यहूदी बच्चे एक साथ नहीं बैठ सकते थे, न ही खेल सकते थे। यहूदी बच्चों को स्कूलों से निकाल दिया गया।
- नात्सी विचारों को सही ठहराने के लिए पाठ्यक्रम (Syllabus) को दोबारा लिखा गया। ‘नस्लीय विज्ञान’ (Racial Science) नामक एक नया विषय शुरू किया गया ताकि यहूदियों के प्रति नफरत को वैज्ञानिक आधार दिया जा सके। गणित की कक्षाओं में भी यहूदियों के खिलाफ नफरत फैलाई जाती थी।
- खेलकूद को भी बच्चों में हिंसा और आक्रामकता पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया गया। हिटलर का मानना था कि बॉक्सिंग (मुक्केबाज़ी) बच्चों को फौलादी दिल वाला, क्रूर और मर्दाना बना सकती है।
युवा संगठन (Youth Organisations):
बच्चों को ‘राष्ट्रीय समाजवाद’ (National Socialism) की भावना सिखाने का जिम्मा युवा संगठनों को सौंपा गया:
- 10 साल के लड़कों को ‘युंगफोक’ (Jungvolk) नामक संस्था में शामिल होना पड़ता था।
- 14 साल के सभी लड़कों को नात्सी युवा संगठन ‘हिटलर यूथ’ (Hitler Youth) का सदस्य बनना अनिवार्य था। यहाँ उन्हें युद्ध की पूजा करना, लोकतंत्र की निंदा करना, और यहूदियों/कम्युनिस्टों से कट्टर नफरत करना सिखाया जाता था।
- 18 साल की उम्र में उन्हें सेना में अनिवार्य सेवा (Labour service) देनी पड़ती थी।
- लड़कियों के लिए भी एक अलग संगठन था जिसे ‘लीग ऑफ जर्मन गर्ल्स’ (League of German Girls) कहा जाता था।
👩👧 मातृत्त्व का नात्सी कल्ट (The Nazi Cult of Motherhood)
नात्सी जर्मनी में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देने वाले लोकतांत्रिक विचारों का घोर विरोध किया गया। उनका मानना था कि समानता का विचार समाज को नष्ट कर देगा। लड़कों को आक्रामक और कठोर बनना सिखाया गया, जबकि लड़कियों को बताया गया कि उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य एक अच्छी माँ बनना और ‘शुद्ध आर्य रक्त’ वाले शक्तिशाली बच्चे पैदा करना है।
- महिलाओं को यहूदियों से दूर रहने, अपना घर संभालने और बच्चों को नात्सी मूल्य सिखाने की ज़िम्मेदारी दी गई।
- जो औरतें नस्लीय रूप से अवांछित (जैसे अपाहिज या यहूदी) बच्चे पैदा करती थीं, उन्हें कड़ी सज़ा दी जाती थी।
- जो औरतें नस्लीय रूप से ‘शुद्ध’ और ज़्यादा बच्चे पैदा करती थीं, उन्हें इनाम दिए जाते थे। उन्हें अस्पतालों, थिएटरों और रेलगाड़ियों में विशेष छूट मिलती थीं। 4 बच्चे पैदा करने वाली माँ को कांस्य (Bronze) क्रॉस, 6 बच्चों वाली को सिल्वर (Silver) क्रॉस, और 8 या उससे ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाली को गोल्ड (Gold) क्रॉस से सम्मानित किया जाता था।
- जो आर्य महिलाएं इन नियमों (आचार संहिता) का उल्लंघन करती थीं (जैसे यहूदियों से संबंध रखना), उनका सिर मूंडकर और मुँह काला करके गले में तख्ती लटकाकर पूरे शहर में घुमाया जाता था, जिस पर लिखा होता था: “मैंने राष्ट्र को कलंकित किया है।” कई महिलाओं को जेल में डाल दिया गया और उनके नागरिक अधिकार छीन लिए गए।
7. महाध्वंस / होलोकास्ट (The Holocaust) और नात्सी प्रोपेगैंडा
नात्सियों ने अपने नस्लीय सपनों को पूरा करने के लिए अकल्पनीय क्रूरता की हदें पार कर दीं। उन्होंने यहूदियों, जिप्सियों और राजनीतिक विरोधियों का पूरी तरह सफाया करने का अभियान चलाया। इसे ही इतिहास में होलोकास्ट (Holocaust) या महाध्वंस कहा जाता है। यहूदियों को खत्म करने की प्रक्रिया 3 चरणों में हुई:
- चरण 1: बहिष्कार (Exclusion 1933-39) – “तुम्हें हमारे बीच नागरिक के रूप में रहने का हक नहीं है।”
न्यूरेमबर्ग नागरिकता कानून (1935) के तहत केवल जर्मन रक्त वालों को ही नागरिक माना गया। यहूदियों और जर्मनों की शादी पर रोक लगा दी गई। यहूदियों के व्यवसाय का बहिष्कार किया गया और उन्हें सरकारी नौकरियों से निकाल दिया गया। नवंबर 1938 में ‘क्रिस्टलनाख्ट’ (Kristallnacht – Night of Broken Glass) की घटना हुई, जिसमें पूरे जर्मनी में यहूदियों की संपत्तियों को तोड़ा गया, उनकी दुकानों को लूटा गया और उनके पूजा घरों (सिनगॉग) को जला दिया गया। - चरण 2: घेटोइज़ेशन (Ghettoisation 1940-44) – “तुम्हें हमारे बीच रहने का हक नहीं है।”
सितंबर 1941 से सभी यहूदियों के लिए कपड़ों पर ‘डेविड का पीला सितारा’ (Yellow Star of David) लगाना अनिवार्य कर दिया गया ताकि उन्हें दूर से पहचाना जा सके। उन्हें समाज से अलग करके घेटो (Ghettos – बहुत ही गंदी और अमानवीय बस्तियों) में धकेल दिया गया, जैसे लॉड्ज़ (Lodz) और वारसा (Warsaw) के घेटो। यहाँ लोग भूख, गंदगी और बीमारियों से तिल-तिल कर मरते थे। - चरण 3: सर्वनाश (Annihilation 1941 onwards) – “तुम्हें ज़िंदा रहने का हक नहीं है।”
पूरे यूरोप के यहूदियों को मालगाड़ियों में ठूंस-ठूंस कर पूर्वी यूरोप में बनाए गए विनाश शिविरों (Death Camps) में लाया गया, जैसे बेल्ज़ेक, सोबिबोर, त्रेब्लिंका और ऑशविट्ज़ (Auschwitz)। यहाँ उन्हें गैस चैंबरों (Gas Chambers) में डालकर कीड़े-मकोड़ों की तरह ज़हरीली गैस से कुछ ही मिनटों में मार दिया जाता था। यह बड़े पैमाने पर औद्योगिक हत्या थी।
प्रोपेगैंडा (Propaganda) की कला:
नात्सी शासन भाषा और मीडिया का इस्तेमाल बड़ी होशियारी से करता था। उन्होंने कभी भी आधिकारिक दस्तावेजों में ‘हत्या’ (Murder) या ‘मौत’ (Death) जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। वे हत्या के लिए ‘अंतिम समाधान’ (Final Solution), ‘विशेष व्यवहार’ (Special Treatment), और गैस चैंबरों के लिए ‘संक्रमण-मुक्ति क्षेत्र’ (Disinfection areas) जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते थे। गैस चैंबर स्नानागार (बाथरूम) जैसे दिखते थे जिनमें नकली फव्वारे लगे होते थे।
नात्सियों ने यहूदियों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए कई प्रोपेगैंडा फिल्में बनाईं, जिनमें सबसे कुख्यात फिल्म थी ‘द इटरनल ज्यू’ (The Eternal Jew)। इसमें यहूदियों को चूहों और कीड़ों की तरह दिखाया गया था। नात्सी प्रोपेगैंडा का असर इतना गहरा था कि चार्लोट बेराट (Charlotte Beradt) ने अपनी किताब ‘थर्ड राइक ऑफ ड्रीम्स’ (Third Reich of Dreams) में बताया है कि कैसे कई यहूदी खुद भी अपने बारे में फैलाए गए नात्सी स्टीरियोटाइप्स (Stereotypes) पर विश्वास करने लगे थे और गैस चैंबर में जाने से पहले ही सपनों में अपने आप को उसी हीन रूप में देखने लगे थे।
महाध्वंस के बारे में दुनिया को कैसे पता चला?
जब तक युद्ध चल रहा था, नात्सियों ने अपने अपराधों को दुनिया से छुपाने की पूरी कोशिश की। लेकिन जब 1945 में जर्मनी हारा, तब दुनिया को इन मौत के कारखानों की भयानक सच्चाई का पता चला। जो यहूदी इन कैंपों में बच गए थे, वे चाहते थे कि दुनिया उनकी अकल्पनीय पीड़ा को जाने। कई लोगों ने डायरियाँ लिखीं, नोटबुक में विवरण दर्ज किए और दस्तावेज़ों को दूध के डिब्बों में डालकर ज़मीन में गाड़ दिया ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि नात्सी शासन मानव इतिहास का सबसे काला अध्याय था।
कक्षा 9 इतिहास अध्याय 4
वन समाज और उपनिवेशवाद
(Forest Society and Colonialism)
📌 अध्याय का परिचय (Chapter Introduction)
जंगल हमेशा से मानव जीवन का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। हमारे रोज़मर्रा के जीवन की अनगिनत चीज़ें—किताब का कागज़, मेज़-कुर्सी, दरवाज़े, खिड़कियाँ, मसाले, बीड़ी बनाने के तेंदू पत्ते, गोंद, शहद, और कॉफी—जंगलों से ही आती हैं। औद्योगीकरण के दौर में (सन 1700 से 1995 के बीच) औद्योगीकरण, खेती, चरागाहों और ईंधन के लिए दुनिया के कुल क्षेत्रफल का लगभग 9.3% हिस्सा (139 लाख वर्ग किलोमीटर) जंगल साफ कर दिए गए। वनों के इस अंधाधुंध विनाश को ‘वन विनाश’ (Deforestation) कहा जाता है। इस वन विनाश के साथ हमने पौधों और जानवरों की अनगिनत प्रजातियों की विविधता को भी हमेशा के लिए खो दिया। इस अध्याय में हम पढ़ेंगे कि ब्रिटिश शासन (उपनिवेशवाद) के दौरान भारत और डच शासन के दौरान इंडोनेशिया में जंगलों का विनाश क्यों और कैसे हुआ, और इसका आदिवासी वन समाजों पर क्या प्रभाव पड़ा।
1. वनों का विनाश क्यों? (Why Deforestation?)
भारत में वनों का विनाश कोई नई बात नहीं थी, लेकिन औपनिवेशिक काल (ब्रिटिश शासन) में यह बहुत तेज़ी से और व्यवस्थित तरीके से हुआ। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
(क) ज़मीन की बेहतरी (Expansion of Agriculture):
- 1600 ई. में भारत के कुल भू-भाग के लगभग छठे हिस्से (1/6) पर खेती होती थी। आज यह आंकड़ा आधे तक पहुँच गया है।
- अंग्रेज़ों की नज़र में जंगल ‘उजाड़ और अनुत्पादक’ (Wilderness and Unproductive) थे। वे मानते थे कि जंगलों को काटकर वहाँ खेती की जानी चाहिए ताकि राज्य की आय (Revenue/लगान) बढ़ सके।
- 19वीं सदी के यूरोप में बढ़ती आबादी के कारण खाद्यान्नों (अनाज) की मांग बहुत बढ़ गई थी। इसके अलावा, इंग्लैंड के कारखानों को कच्चे माल के लिए व्यावसायिक फसलें (जैसे- जूट, चीनी, गेहूं, कपास) चाहिए थीं। इसलिए अंग्रेज़ों ने भारत में नकदी फसलों के उत्पादन को भारी बढ़ावा दिया।
- 19वीं सदी की शुरुआत में औपनिवेशिक सरकार ने जंगलों को तेज़ी से साफ करना शुरू किया। 1880 से 1920 के बीच खेती योग्य ज़मीन के क्षेत्रफल में 67 लाख हेक्टेयर की भारी वृद्धि हुई।
(ख) पटरियों पर स्लीपर (Sleepers on the Tracks):
- 19वीं सदी की शुरुआत (1820 के दशक) तक इंग्लैंड में ओक (Oak) के जंगल खत्म होने लगे थे, जिससे शाही नौसेना (Royal Navy) के जहाज़ बनाने के लिए इमारती लकड़ी की भारी कमी हो गई। अंग्रेज़ों ने भारत के जंगलों में खोजी दल (Search Parties) भेजे और जहाज़ बनाने के लिए भारत से भारी मात्रा में लकड़ी इंग्लैंड भेजी जाने लगी।
- रेलवे का विस्तार: 1850 के दशक में भारत में रेलवे का जाल बिछना शुरू हुआ। औपनिवेशिक व्यापार और सैनिकों की आवाजाही के लिए रेलवे ज़रूरी था। रेलवे लाइनों के लिए पटरियों को जोड़े रखने के लिए लकड़ी के ‘स्लीपरों’ (Sleepers) की ज़रूरत थी। (एक मील लंबी रेलवे लाइन के लिए 1760 से 2000 स्लीपरों की आवश्यकता होती थी)।
- शुरुआती रेलवे इंजनों को चलाने के लिए ईंधन (Fuel) के रूप में भी भारी मात्रा में लकड़ी की ही ज़रूरत होती थी। 1890 तक आते-आते 25,500 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी लाइनें बिछ चुकी थीं, जो 1946 तक बढ़कर 7,65,000 किलोमीटर हो गईं। केवल 1850 के दशक में मद्रास प्रेसीडेंसी में स्लीपरों के लिए हर साल 35,000 पेड़ काटे जाते थे। सरकार ने जंगलों को काटने के ठेके दिए और ठेकेदारों ने अंधाधुंध जंगल साफ कर दिए।
(ग) बागान (Plantations):
यूरोप में चाय, कॉफी और रबर की भारी मांग थी। इस मांग को पूरा करने के लिए अंग्रेज़ों ने भारत के प्राकृतिक जंगलों के एक बड़े हिस्से को साफ कर दिया और वहाँ चाय व कॉफी के बागान (Plantations) लगा दिए। सरकार ने यूरोपियन बागान मालिकों को कौड़ियों के भाव विशाल ज़मीनें दे दीं और उन्होंने जंगलों की बाड़बंदी कर दी। असम, दार्जिलिंग और नीलगिरि में चाय बागान स्थापित किए गए, जहाँ झारखंड के संताल व उरांव, और छत्तीसगढ़ के गोंड आदिवासियों को बहुत ही कठोर और अमानवीय परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर किया गया।
2. व्यावसायिक वानिकी की शुरुआत (The Rise of Commercial Forestry)
अंग्रेज़ों को डर था कि जिस तरह से स्थानीय लोग जंगलों का उपयोग कर रहे हैं और ठेकेदार अंधाधुंध पेड़ काट रहे हैं, उससे जंगल पूरी तरह नष्ट हो जाएंगे। इसलिए, उन्होंने एक जर्मन विशेषज्ञ डाइट्रिच ब्रैंडिस (Dietrich Brandis) को भारत का पहला वन महानिरीक्षक (Inspector General of Forests) नियुक्त किया।
🌳 ब्रैंडिस और वैज्ञानिक वानिकी (Brandis & Scientific Forestry)
ब्रैंडिस का मानना था कि जंगलों के प्रबंधन के लिए लोगों को संरक्षण के विज्ञान में प्रशिक्षित करना होगा और इसके लिए एक कानूनी व्यवस्था बनानी होगी।
- 1864: ब्रैंडिस ने ‘भारतीय वन सेवा’ (Indian Forest Service) की स्थापना की।
- 1865: ‘भारतीय वन अधिनियम’ (Indian Forest Act) बनाया गया।
- 1906: देहरादून में ‘इंपीरियल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (Imperial Forest Research Institute) की स्थापना की गई। यहाँ जिस पद्धति की शिक्षा दी जाती थी उसे ‘वैज्ञानिक वानिकी’ (Scientific Forestry) कहा गया।
- वैज्ञानिक वानिकी क्या थी? इस व्यवस्था में प्राकृतिक जंगलों (जहाँ विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे एक साथ होते थे) को पूरी तरह काट दिया गया और उनकी जगह सीधी कतारों में एक ही प्रजाति (जैसे टीक या साल) के पेड़ लगाए गए। इसे बागान कहा गया। वन विभाग के अधिकारी सर्वे करते थे कि हर साल कितने पेड़ काटे जाने हैं और काटे गए क्षेत्र में दोबारा पेड़ लगाए जाते थे। (हालाँकि, आज के पर्यावरणविद् मानते हैं कि यह ‘वैज्ञानिक’ नहीं था, बल्कि इससे जंगलों की जैव-विविधता खत्म हो गई)।
वन अधिनियमों का प्रभाव (Impact of Forest Acts):
1865 के वन अधिनियम को 1878 और 1927 में दो बार संशोधित (Amended) किया गया। 1878 के अधिनियम ने जंगलों को 3 श्रेणियों में बाँट दिया:
- आरक्षित वन (Reserved Forests): ये सबसे अच्छे और कीमती इमारती लकड़ी वाले जंगल थे। ग्रामीणों को इन जंगलों में घुसने, लकड़ी काटने या जानवर चराने की बिल्कुल मनाही थी।
- सुरक्षित वन (Protected Forests)
- ग्रामीण वन (Village Forests)
ग्रामीणों को केवल सुरक्षित और ग्रामीण वनों से घर बनाने या ईंधन के लिए लकड़ी लेने की थोड़ी-बहुत छूट थी, वह भी वन अधिकारियों की अनुमति से।
3. लोगों का जीवन कैसे प्रभावित हुआ? (How were the lives of people affected?)
वन अधिकारियों और ग्रामीणों की सोच में ज़मीन-आसमान का अंतर था। ग्रामीण एक ऐसा जंगल चाहते थे जहाँ उनकी ज़रूरत की हर चीज़ मिल जाए। दूसरी ओर, वन विभाग को ऐसे पेड़ (टीक और साल) चाहिए थे जो सीधे, लंबे और सख़्त हों ताकि उनसे जहाज़ और रेलवे स्लीपर बनाए जा सकें।
- रोज़मर्रा का जीवन (Everyday Life): जंगल के आसपास रहने वाले लोगों के लिए जंगल ही उनका जीवन था। वन कानून लागू होने के बाद कंद-मूल-फल इकट्ठा करना, जड़ी-बूटियाँ खोजना, और शिकार करना गैर-कानूनी (Illegal) हो गया। वे सूखे हुए लौकी के खोल को पानी की बोतल के रूप में, पत्तों को जोड़कर दोने-पत्तल के रूप में, और बांस को बाड़ बनाने व टोकरी बुनने के लिए इस्तेमाल करते थे। महुआ के पेड़ से उन्हें खाने के फूल और रोशनी के लिए तेल मिलता था।
- ये सब अधिकार छिन जाने के बाद, जंगल से लकड़ी चुराने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं बचा। पकड़े जाने पर वनरक्षक उनसे रिश्वत (Bribe) ऐंठते थे। पुलिस कांस्टेबल और वनरक्षक उनसे मुफ्त में खाना मांगकर उन्हें प्रताड़ित करते थे।
घुमंतू खेती पर रोक (Ban on Shifting Cultivation):
एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों में ‘घुमंतू खेती’ या ‘झूम खेती’ (Shifting Cultivation) की बहुत पुरानी परंपरा थी।
स्थानीय नाम: दक्षिण-पूर्व एशिया में ‘लादिंग’ (Lading), मध्य अमेरिका में ‘मिल्पा’ (Milpa), अफ्रीका में ‘चितमेन’ या ‘तावी’, और श्रीलंका में ‘चेना’। भारत में इसे ध्या, पेंदा, बेवर, नेवड़, झूम, पोडू, खांदाद या कुमरी कहा जाता है।
- इस खेती में जंगल के कुछ हिस्सों को बारी-बारी से काटा और जलाया जाता था। पहली बारिश के बाद राख में बीज बो दिए जाते थे और अक्टूबर-नवंबर तक फसल काट ली जाती थी। 2-3 साल खेती करने के बाद उस ज़मीन को 12 से 18 साल के लिए परती (खाली) छोड़ दिया जाता था ताकि वहाँ फिर से जंगल उग आए।
- अंग्रेज़ों ने इस पर रोक क्यों लगाई? अंग्रेज़ों का मानना था कि जिस ज़मीन पर घुमंतू खेती की जाती है, वहाँ रेलवे के लिए इमारती लकड़ी वाले पेड़ (टीक/साल) नहीं उग सकते। साथ ही, जंगल जलाते समय मूल्यवान इमारती लकड़ी के जल जाने का खतरा रहता था। सबसे बड़ी बात, घुमंतू किसानों से लगान (Tax) वसूलना सरकार के लिए बहुत मुश्किल था।
- प्रतिबंध के कारण कई वन समुदायों को अपने पुश्तैनी घर छोड़ने पड़े, कुछ ने बगावत कर दी, और कइयों को विस्थापित होकर मज़दूरी करने पर मजबूर होना पड़ा।
शिकार पर पाबंदी (Ban on Hunting):
जंगल के नए कानूनों ने शिकार करने के अधिकार भी छीन लिए। जो आदिवासी हिरन या तीतर का शिकार करके पेट भरते थे, उन्हें अब ‘अवैध शिकार’ (Poaching) के आरोप में सज़ा दी जाने लगी।
एक तरफ जहाँ गरीब आदिवासियों का छोटे-मोटे जानवरों का शिकार करना गैर-कानूनी कर दिया गया, वहीं दूसरी तरफ अंग्रेज़ अफसरों और भारतीय राजाओं-नवाबों के लिए बड़े जानवरों (बाघ, तेंदुआ, भालू) का शिकार करना एक ‘खेल’ (Sport) और मर्दानगी का प्रतीक बन गया। अंग्रेज़ों ने बाघों और भेड़ियों को जंगली, बर्बर और समाज के लिए खतरनाक मानकर उन्हें मारने पर नकद इनाम रखे।
नतीजा यह हुआ कि 1875 से 1925 के बीच 80,000 बाघ, 1,50,000 तेंदुए और 2,00,000 भेड़िये मार गिराए गए। अकेले जॉर्ज यूल (George Yule) नामक अंग्रेज़ अफसर ने 400 बाघ मारे। सरगुजा के महाराजा ने 1957 तक 1,157 बाघों और 2,000 तेंदुओं का शिकार किया था।
4. वनों में विद्रोह (Rebellion in the Forest)
भारत और दुनिया भर में कई वन समुदायों ने अपने अधिकारों के लिए बगावत की। भारत में संताल परगना में सिधु-कानू, छोटानागपुर में बिरसा मुंडा, और आंध्र प्रदेश में अल्लूरी सीताराम राजू इसके प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरण हैं। इस अध्याय में हम बस्तर के विद्रोह का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
🔥 बस्तर का विद्रोह (भूमकाल) – 1910 (The Rebellion of Bastar)
स्थिति (Location): बस्तर छत्तीसगढ़ के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित है, जिसकी सीमाएँ आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और महाराष्ट्र से मिलती हैं। इंद्रावती नदी बस्तर के बीचों-बीच पूरब से पश्चिम की ओर बहती है। यहाँ मारिया (Marias), मुड़िया (Murias), गोंड (Gonds), धुर्वा (Dhurwas), भतरा और हलबा जैसे कई आदिवासी समुदाय रहते हैं। इनका मानना है कि धरती, नदी और जंगल उन्हें उनके देवताओं से मिले हैं। इसके बदले वे हर कृषि त्योहार पर धरती माता को चढ़ावा चढ़ाते हैं। यदि वे दूसरे गाँव के जंगल से कुछ लकड़ी लेना चाहते हैं, तो वे एक छोटा सा शुल्क देते हैं जिसे ‘देवसारी’, ‘दांड’ या ‘मान’ कहा जाता है।
विद्रोह के कारण:
- 1905 में औपनिवेशिक सरकार ने जंगल के दो-तिहाई हिस्से को ‘आरक्षित’ (Reserved) करने का प्रस्ताव रखा।
- घुमंतू खेती, शिकार और वन उत्पादों के संग्रह पर सख्त रोक लगा दी गई।
- कुछ गांवों को ‘वन ग्राम’ (Forest Villages) के रूप में इस शर्त पर रहने दिया गया कि वे वन विभाग के लिए मुफ्त में पेड़ काटेंगे, लकड़ी ढोएंगे और जंगल को आग से बचाएंगे। बाकी सभी को बिना किसी सूचना या मुआवज़े के बेदखल कर दिया गया।
- भयानक अकाल (1899-1900 और 1907-1908) और लगान में भारी वृद्धि ने लोगों का गुस्सा भड़का दिया।
विद्रोह का नेतृत्व और घटनाक्रम:
- इस आंदोलन को संगठित करने में कांगेर वन क्षेत्र के धुर्वा (Dhurwa) समुदाय की अहम भूमिका थी, क्योंकि वनों का आरक्षण सबसे पहले यहीं लागू हुआ था।
- हालाँकि इस विद्रोह का कोई एक अकेला नेता नहीं था, लेकिन नेथानार गांव के गुंडा धुर (Gunda Dhur) इस आंदोलन (जिसे ‘भूमकाल’ कहा गया) के सबसे प्रमुख और जुझारू व्यक्ति माने जाते हैं।
- 1910 में आम की टहनियाँ, मिट्टी के ढेले, मिर्च और तीर गाँव-गाँव में घुमाए जाने लगे। यह अंग्रेज़ों के खिलाफ बगावत का खुला संदेश था। बाज़ारों को लूटा गया, पुलिस थानों, स्कूलों और अंग्रेज़ अधिकारियों व व्यापारियों के घरों को जला दिया गया।
- दमन: अंग्रेज़ों ने बगावत को कुचलने के लिए भारी सेना भेजी। आदिवासियों ने शांति से बातचीत करनी चाही, पर अंग्रेज़ों ने उनके तंबूओं को घेरकर उन पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं। इसके बाद जो लोग भाग गए, उन्हें पकड़कर कोड़े मारे गए। अंग्रेज़ों को बस्तर पर दोबारा नियंत्रण पाने में तीन महीने (फरवरी से मई) लग गए। लेकिन गुंडा धुर कभी अंग्रेज़ों के हाथ नहीं आया।
नतीजा: बस्तर के आदिवासियों की यह एक बड़ी रणनीतिक जीत थी कि सरकार को आरक्षण का काम कुछ समय के लिए रोकना पड़ा और आरक्षित क्षेत्र को घटाकर 1910 के प्रस्ताव से लगभग आधा कर दिया गया।
5. जावा के जंगलों में बदलाव (Forest Transformations in Java)
जावा आज इंडोनेशिया का एक प्रमुख द्वीप है और मुख्य रूप से चावल उत्पादन के लिए जाना जाता है। लेकिन एक समय यहाँ भी घने जंगल थे। भारत की ही तरह, इंडोनेशिया डचों (Dutch) का उपनिवेश (Colony) था। डचों ने जावा में भी ठीक वैसे ही वन कानून लागू किए जैसे अंग्रेज़ों ने भारत में किए थे।
जावा के कलांग समुदाय (The Kalangs of Java):
- जावा के कलांग (Kalangs) समुदाय के लोग बहुत कुशल लकड़हारे (woodcutters) और घुमंतू किसान थे। उनका कौशल इतना महत्वपूर्ण था कि 1755 में जब माताराम रियासत बंटी, तो 6000 कलांग परिवारों को दोनों नए राज्यों के बीच बराबर-बराबर बांटा गया था। उनके बिना राजाओं के महल बनाना नामुमकिन था।
- जब डचों ने जंगलों पर कब्ज़ा किया, तो उन्होंने कलांगों को अपने अधीन काम करने के लिए मजबूर किया। इसके विरोध में 1770 में कलांगों ने डच किले पर हमला कर दिया, लेकिन डचों ने इस विद्रोह को क्रूरता से कुचल दिया।
वैज्ञानिक वानिकी और ‘ब्लांडोंगडिएन्स्टेन’ (Scientific Forestry):
- 19वीं सदी में डचों ने जावा में सख्त वन कानून लागू कर दिए। ग्रामीणों का जंगलों में प्रवेश पूरी तरह वर्जित कर दिया गया। लकड़ी केवल नदी की नाव बनाने या घर बनाने के लिए विशिष्ट स्थानों से ही काटी जा सकती थी, वह भी कड़ी निगरानी में।
- सड़कों पर जानवर चराने या बिना परमिट लकड़ी ले जाने पर कड़ी सज़ा दी जाती थी।
- डचों को रेलवे स्लीपरों और जहाज़ों के लिए मुफ्त श्रम (Labour) चाहिए था। उन्होंने ‘ब्लांडोंगडिएन्स्टेन’ (Blandongdiensten) प्रणाली शुरू की। इसके तहत कुछ गांवों को लगान (Tax) से इस शर्त पर छूट दी गई कि वे डचों को मुफ्त में अपनी भैंसें और मज़दूर उपलब्ध कराएंगे ताकि लकड़ी ढोई जा सके। बाद में इस छूट के बजाय मामूली सी मज़दूरी दी जाने लगी, लेकिन वन भूमि पर उनके अधिकार हमेशा के लिए छीन लिए गए।
💪 सामिन की चुनौती (Samin’s Challenge)
1890 के दशक में, रान्दुब्लातुंग (Randublatung) गांव (जो एक प्रमुख सागौन / Teak के जंगलों का क्षेत्र था) के एक साहसी किसान सुरोंतिको सामिन (Surontiko Samin) ने डच नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाई।
- सामिन का तर्क बहुत सीधा और तार्किक था: “हवा, पानी, ज़मीन और लकड़ी राज्य (सरकार) ने नहीं बनाई है, इसलिए राज्य का इन पर मालिकाना हक नहीं हो सकता।”
- जल्द ही यह एक व्यापक आंदोलन बन गया। सामिन के दामाद भी इसका हिस्सा बने और 1907 तक 3000 परिवार इस विचारधारा से जुड़ गए।
- विरोध का तरीका (अहिंसक सत्याग्रह की तरह): जब डच अधिकारी ज़मीन का सर्वेक्षण (Survey) करने आते थे, तो सामिनवादी किसान विरोध में अपनी ज़मीन पर लेट जाते थे। उन्होंने लगान (Tax) और जुर्माना भरने से साफ इनकार कर दिया, और बेगार (मुफ्त मज़दूरी) करने से भी मना कर दिया।
6. युद्ध और वन विनाश (War and Deforestation)
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध का भारत और इंडोनेशिया दोनों के जंगलों पर भयानक विनाशकारी प्रभाव पड़ा।
- भारत में: अंग्रेज़ों ने अपनी युद्ध-संबंधी ज़रूरतों (जहाज़ों, खाइयों और हथियारों के लिए) को पूरा करने के लिए वन विभाग की सारी कार्ययोजनाओं को ताक पर रख दिया और भारत के प्राकृतिक जंगलों को बेतहाशा काटा।
- जावा (इंडोनेशिया) में: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब जापानियों ने जावा पर हमला किया, तो भागने से ठीक पहले डचों ने ‘भस्म करो और भागो’ (Scorched Earth Policy) की नीति अपनाई। उन्होंने सागौन (Teak) के विशाल लट्ठों के ढेरों और आरा-मशीनों (Sawmills) को आग लगा दी ताकि वे किसी भी कीमत पर जापानियों के हाथ न लगें।
- जापानियों ने जावा पर कब्ज़ा करने के बाद, अपने युद्ध उद्योगों के लिए जंगलों का और भी बेरहमी से दोहन किया। उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों को जंगल काटने के लिए मजबूर किया। इस उथल-पुथल भरे दौरान कई स्थानीय लोगों ने भी इस स्थिति का फायदा उठाकर खेती के लिए जंगल साफ कर लिए।
🌟 वानिकी में नए बदलाव (New Developments in Forestry)
1980 के दशक तक आते-आते एशिया और अफ्रीका की सरकारों को यह समझ में आने लगा कि ‘वैज्ञानिक वानिकी’ और वन समुदायों को जंगल से बाहर रखने की नीतियाँ पूरी तरह विफल रही हैं। इससे जंगल बचने के बजाय और तेज़ी से खत्म हुए हैं और सरकार व आदिवासियों के बीच हिंसक संघर्ष बढ़े हैं।
- अब ‘इमारती लकड़ी’ जुटाने के बजाय ‘जंगलों का संरक्षण’ (Conservation of Forests) सरकारों का सबसे बड़ा लक्ष्य बन गया है।
- सरकारों ने मान लिया है कि इस लक्ष्य को तभी हासिल किया जा सकता है जब स्थानीय लोगों और वन समुदायों को इस प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
- भारत में मिज़ोरम से लेकर केरल तक कई घने जंगल सिर्फ इसलिए बच पाए क्योंकि ग्रामीणों ने ‘सरना’, ‘देवराकुडु’, ‘कान’, और ‘राई’ (पवित्र उपवन/Sacred Groves) के नाम पर उनकी रक्षा की। वे इन जंगलों को देवताओं का निवास मानते हैं।
- आज बहुत से गांवों में ग्रामीण अपनी बारी लगाकर (गश्त लगाकर) खुद अपने जंगलों की रखवाली करते हैं, और वन रक्षकों (Forest Guards) पर निर्भर नहीं रहते। स्थानीय वन समुदाय और पर्यावरणविद् अब वन प्रबंधन के नए, लोकतांत्रिक और टिकाऊ तरीकों के बारे में सोच रहे हैं।
कक्षा 9 इतिहास अध्याय 5
आधुनिक विश्व में चरवाहे
(Pastoralists in the Modern World)
📌 अध्याय का परिचय (Chapter Introduction)
घुमंतू (Nomads) वे लोग होते हैं जो किसी एक जगह पर टिक कर नहीं रहते, बल्कि अपनी आजीविका (रोटी-रोज़ी) की तलाश में अपने जानवरों (भेड़, बकरी, गाय, ऊंट आदि) के रेवड़ के साथ एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते हैं। आधुनिक इतिहास की किताबों और अर्थशास्त्र की चर्चाओं में अक्सर इन घुमंतू चरवाहों को कोई जगह नहीं मिलती, मानो अतीत में उनका कोई वजूद ही न हो और वे आधुनिक समाज के लिए ज़रूरी न हों। लेकिन इस अध्याय में हम भारत और अफ्रीका के घुमंतू चरवाहों की कहानी पढ़ेंगे। हम जानेंगे कि उपनिवेशवाद (अंग्रेज़ों के शासन) ने उनके जीवन पर क्या असर डाला और उन्होंने आधुनिक समाज के इन बदलावों का सामना कैसे किया।
1. घुमंतू चरवाहे और उनकी आवाजाही (Nomadic Pastoralists in India)
भारत के अलग-अलग हिस्सों (पहाड़ों, पठारों, मैदानों और रेगिस्तानों) में विभिन्न चरवाहा समुदाय रहते हैं। उनके घूमने का मुख्य कारण मौसम का बदलाव और जानवरों के लिए चारे की तलाश होता है।
(क) पहाड़ों में (In the Mountains):
- गुज्जर बकरवाल (जम्मू-कश्मीर): ये भेड़-बकरियों के बड़े-बड़े रेवड़ (झुंड) पालते हैं। 19वीं सदी में ये अच्छे चारे की तलाश में यहाँ आकर बस गए थे। सर्दियों में जब ऊंचे पहाड़ों पर बर्फ जम जाती है, तो ये अपने जानवरों को शिवालिक की निचली पहाड़ियों में ले आते हैं जहाँ सूखी झाड़ियां उनके जानवरों का चारा बनती हैं। अप्रैल के अंत में ये उत्तर की ओर ‘पीर पंजाल’ के दर्रों को पार करके कश्मीर की घाटी में गर्मियों की हरी-भरी चारागाहों में चले जाते हैं। गर्मियों में बर्फ पिघलने से पूरी घाटी पौष्टिक घासों से भर जाती है। इन चरवाहों के समूह को ‘काफिला’ (Kafila) कहा जाता है।
- गद्दी चरवाहे (हिमाचल प्रदेश): ये भी मौसमी बदलाव के अनुसार ऊपर-नीचे आते-जाते हैं। सर्दियों में ये शिवालिक की निचली पहाड़ियों में रहते हैं। अप्रैल में ये उत्तर की ओर जाते हैं और लाहौल-स्पीति में गर्मियाँ बिताते हैं। बर्फ पिघलने पर ये और ऊंचाई पर स्थित चारागाहों में चले जाते हैं। सितंबर तक ये दोबारा वापस लौटना शुरू कर देते हैं।
- भोटिया, गुज्जर और शेरपा (उत्तराखंड): ये भी इसी तरह सर्दियों में तराई के ‘भाभर’ (Bhabar – सूखे जंगल का इलाका) और गर्मियों में ऊंचाई पर स्थित ‘बुग्याल’ (Bugyal – ऊंचे पहाड़ों पर स्थित घास के मैदान) के बीच आवाजाही करते हैं। यह मौसमी आवाजाही (Cyclic movement) उनके जानवरों को हमेशा हरा और पौष्टिक चारा उपलब्ध कराती है।
(ख) पठारों, मैदानों और रेगिस्तानों में:
पहाड़ों के अलावा देश के सूखे पठारों और रेगिस्तानों में भी लाखों चरवाहे रहते हैं। यहाँ चरागाहों का मिलना सर्दी-गर्मी पर नहीं, बल्कि बारिश और सूखे (Monsoon and Dry Season) पर निर्भर करता है।
- धंगर (Dhangar – महाराष्ट्र): 20वीं सदी की शुरुआत में इनकी आबादी लगभग 4.6 लाख थी। ये मुख्य रूप से गड़रिए (भेड़ पालक) हैं, कुछ कंबल बुनते हैं और कुछ भैंस पालते हैं। मानसून के दौरान ये महाराष्ट्र के मध्य पठार (जो एक सूखा इलाका है) में रहते हैं और वहाँ केवल बाजरा उगाते हैं। अक्टूबर में बाज़रे की कटाई के बाद ये पश्चिम की ओर कोंकण (Konkan) के हरे-भरे इलाके में चले जाते हैं। कोंकण के किसान इनका स्वागत करते हैं क्योंकि धंगरों के जानवर खरीफ की फसल कटने के बाद खेतों की ठूंठ खाते हैं और उनका गोबर खेतों के लिए बेहतरीन खाद (Manure) का काम करता है। वापसी में कोंकणी किसान उन्हें चावल देते हैं जो धंगर अपने सूखे पठार पर ले जाते हैं।
- गोला, कुरुमा और कुरुबा (कर्नाटक और आंध्र प्रदेश): गोला लोग गाय-भैंस पालते हैं, जबकि कुरुमा और कुरुबा भेड़-बकरियां पालते हैं और हाथ के बुने कंबल बेचते हैं। ये भी बरसात और सूखे मौसम के हिसाब से अपनी जगह बदलते हैं। सूखे के महीनों में वे तटीय इलाकों की ओर चले जाते हैं, और बरसात शुरू होते ही वापस अपने सूखे पठारों की ओर लौट आते हैं क्योंकि उनकी भेड़ें दलदली मानसून के मौसम को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं।
- बंजारे (Banjaras): ये उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के जाने-माने घुमंतू हैं। ये चारे की तलाश में बहुत दूर-दूर तक जाते हैं और रास्ते में अपने जानवरों (बैल आदि) के बदले अनाज और चारा खरीदते-बेचते हैं। वे अक्सर हल जोतने वाले जानवरों का व्यापार करते हैं।
- राइका (Raikas – राजस्थान): राजस्थान के रेगिस्तान में बारिश बहुत कम और अनिश्चित होती है, और फसलें अक्सर खराब हो जाती हैं। इसलिए राइका लोग खेती के साथ-साथ जानवर भी पालते हैं। बरसात में ये बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर और बीकानेर के अपने गाँवों में रहते हैं क्योंकि तब वहीं चारा मिल जाता है। अक्टूबर आते ही ये चारे-पानी की तलाश में बाहर निकल पड़ते हैं। राइकाओं का एक समूह (मारू राइका) ऊंट (Camels) पालता है, जबकि दूसरा समूह भेड़-बकरियां पालता है। ऊंट पालने वाले को ऊंट-पालक या ऊंट-मेले का विशेषज्ञ माना जाता है।
🧠 चरवाहों की सफलता का राज़ (Secret of their Survival)
चरवाहों का जीवन कोई अंधाधुंध या बेमकसद भटकना नहीं था। उनकी सफलता मुख्य रूप से इन बारीक बातों पर निर्भर थी:
- उन्हें यह सटीक अंदाज़ा होना चाहिए था कि किसी इलाके में कितने समय तक चारा और पानी मिलेगा, और कब वहाँ से निकलना है।
- उन्हें एक इलाके से गुज़रने के लिए सही समय चुनना पड़ता था और रास्ते के किसानों के साथ अच्छे संबंध बनाने पड़ते थे, ताकि उनके जानवर खेतों की सफाई करें और गोबर से खेत उपजाऊ बनें।
- उन्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए खेती, व्यापार और पशुपालन—तीनों को एक साथ संतुलित करना आता था।
2. औपनिवेशिक शासन और चरवाहों का जीवन (Colonial Rule and Pastoral Life)
अंग्रेज़ों के औपनिवेशिक शासनकाल (Colonial rule) में चरवाहों की ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। उनके चरागाह बुरी तरह सिमट गए, उनकी आवाजाही पर कड़ी पाबंदियां लग गईं और उन पर भारी टैक्स थोप दिए गए। यह सब 4 प्रमुख कारणों (या कानूनों) से हुआ:
1. परती/बंजर भूमि के नियम (Waste Land Rules):
अंग्रेज़ों की नज़र में जो ज़मीन खेती के काम नहीं आ रही थी, वह ‘बंजर’ या ‘बेकार’ (Waste land) थी। ঔपनिवेशिक अधिकारी मानते थे कि ज़मीन से न केवल उत्पादन (अनाज/जूट/कपास) होना चाहिए, बल्कि उससे राज्य को लगान (Tax) भी मिलना चाहिए। 19वीं सदी के मध्य से अंग्रेज़ों ने देश के विभिन्न हिस्सों में ‘परती भूमि नियम’ लागू किए। इन नियमों के तहत खाली पड़ी ज़मीनों को कब्ज़े में लेकर कुछ खास लोगों (मुखियाओं) को दे दिया गया ताकि वे वहाँ खेती कर सकें और उन्हें रियायतें दी गईं। यही खाली ज़मीनें दरअसल चरवाहों के चरागाह थे। इन चरागाहों के खेती में बदलने से चारे की भारी कमी हो गई और चरवाहों के अस्तित्व पर संकट आ गया।
2. वन अधिनियम (Forest Acts):
19वीं सदी के मध्य में अंग्रेज़ों ने विभिन्न प्रांतों में वन कानून लागू किए ताकि वे इमारती लकड़ी पैदा करने वाले जंगलों को बचा सकें। इन कानूनों ने जंगलों को दो मुख्य श्रेणियों में बांट दिया:
- आरक्षित वन (Reserved Forests): जहाँ देवदार और साल जैसी कीमती इमारती लकड़ियाँ पैदा होती थीं। इन जंगलों में चरवाहों के घुसने पर सख्त पाबंदी लगा दी गई।
- संरक्षित वन (Protected Forests): यहाँ चरवाहों को कुछ छूट दी गई, लेकिन उन पर कड़ी नज़र रखी जाने लगी। उन्हें जंगल में जाने के लिए ‘परमिट’ (Permit) लेना पड़ता था जिसमें उनके आने-जाने की तारीखें और जंगल में बिताए जाने वाले दिनों की संख्या तय होती थी। अब वे अपनी मर्जी से जंगल में नहीं रह सकते थे, भले ही वहाँ कितना ही हरा चारा क्यों न हो। तय सीमा से ज़्यादा रुकने पर उन पर भारी जुर्माना लगाया जाता था।
3. अपराधी जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act – 1871):
अंग्रेज़ अधिकारी घुमंतू लोगों को शक और नफरत की नज़र से देखते थे। वे ऐसे लोगों को पसंद करते थे जो एक जगह टिक कर रहते हों, क्योंकि उनसे टैक्स वसूलना और उन पर नियंत्रण रखना आसान था। जो लोग एक जगह से दूसरी जगह घूमते थे (बंजारे, व्यापारी, चरवाहे), अंग्रेज़ उन्हें स्वाभाविक अपराधी मानते थे।
1871 में औपनिवेशिक सरकार ने ‘अपराधी जनजाति अधिनियम’ (Criminal Tribes Act) पास किया। इस काले कानून के तहत कई दस्तकार, व्यापारी और चरवाहा समुदायों को ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया गया। उन्हें एक तय बस्ती (Notified village settlements) के बाहर निकलने की मनाही कर दी गई और स्थानीय पुलिस उन पर हमेशा कड़ी नज़र रखने लगी। बिना परमिट के उनका कहीं भी आना-जाना गैर-कानूनी हो गया।
4. चराई कर (Grazing Tax):
अपनी आमदनी (Revenue) का हर संभव स्रोत बढ़ाने के लिए अंग्रेज़ों ने ज़मीन, नहर के पानी, नमक और यहाँ तक कि जानवरों पर भी टैक्स लगा दिया। 19वीं सदी के मध्य में चरवाहों पर ‘चराई कर’ (Grazing Tax) लगा दिया गया। प्रति जानवर टैक्स की दर तेज़ी से बढ़ाई गई।
- 1850 से 1880 के बीच यह टैक्स ठेकेदारों द्वारा वसूला जाता था। ठेकेदार सरकार को एक तय रकम देते थे और फिर अपना मुनाफा कमाने के लिए चरवाहों से बेतहाशा भारी रकम ऐंठते थे।
- बाद में 1880 के दशक से सरकार ने सीधे चरवाहों से कर वसूलना शुरू कर दिया। हर चरवाहे को एक ‘पास’ (Pass) दे दिया गया। जंगल में घुसने से पहले उन्हें पास दिखाना पड़ता था और उनके जानवरों की गिनती करके टैक्स लिया जाता था।
3. चरवाहों ने इन बदलावों का सामना कैसे किया? (How did Pastoralists Cope?)
इन भारी पाबंदियों और चारे की भयानक कमी (जिसके कारण सूखे के समय बड़ी संख्या में कुपोषण से जानवर भूखे मरने लगे) के बावजूद, चरवाहों ने हार नहीं मानी। उन्होंने नए हालात के हिसाब से खुद को ढाल लिया:
- जानवरों की संख्या कम कर दी: जब चरागाह कम हो गए, तो चरवाहों ने अपने रेवड़ (झुंड) का आकार छोटा कर लिया, क्योंकि अब बहुत सारे जानवरों को चराना संभव नहीं था।
- नए चरागाहों की खोज: जब एक जगह पाबंदी लगी, तो वे दूसरी जगह जाने लगे। (उदाहरण के लिए: 1947 के भारत-पाक विभाजन के बाद ऊंट पालने वाले राइका अब सिंध नदी के किनारे (पाकिस्तान) नहीं जा सकते थे, इसलिए वे अब अपना रास्ता बदलकर हरियाणा के खेतों में जाने लगे जहाँ कटाई के बाद उनके जानवर खेत साफ करते हैं)।
- किसानी और मज़दूरी: कुछ अमीर चरवाहों ने ज़मीन खरीद ली और एक जगह बस कर खेती या साहूकारी करने लगे। दूसरी ओर गरीब चरवाहों के जानवर खत्म हो गए, इसलिए उन्हें अपनी रोज़ी-रोटी के लिए कस्बों और शहरों में मज़दूरी करनी पड़ी।
इन सब के बावजूद, चरवाहे आज भी ज़िंदा हैं और उनकी संख्या कई इलाकों में बढ़ भी रही है। चरवाहे केवल अतीत का अवशेष नहीं हैं। दुनिया भर के पर्यावरणविद् अब मानते हैं कि सूखे और पहाड़ी इलाकों के लिए घुमंतू चरवाही जीवन ही सबसे अनुकूल और टिकाऊ (Sustainable) तरीका है।
4. अफ्रीका में चरवाहा जीवन (Pastoralism in Africa)
दुनिया की आधी से ज़्यादा चरवाहा आबादी (लगभग 2.2 करोड़) आज भी अफ्रीका में रहती है। इनमें बेदुइंस (Bedouins), बर्बर्स (Berbers), मासाई (Maasai), सोमाली (Somali), बोरान (Boran) और तुर्काना (Turkana) जैसे समुदाय शामिल हैं। इनमें से ज़्यादातर लोग अर्ध-शुष्क (Semi-arid) घास के मैदानों या रेगिस्तानों में रहते हैं जहाँ खेती करना बहुत मुश्किल है। ये गाय-बैल, ऊंट, बकरी, भेड़ और गधे पालते हैं और दूध, मांस, खाल व ऊन बेचते हैं। इस अध्याय में हम पूर्वी अफ्रीका के ‘मासाई’ (Maasai) समुदाय का गहराई से अध्ययन करेंगे।
🌍 मासाई समुदाय (The Maasai Community)
मासाई मुख्य रूप से पूर्वी अफ्रीका (कीनिया / Kenya और तंजानिया / Tanzania) के निवासी हैं। ‘मासाई’ शब्द ‘मा’ (Ma) से बना है जिसका अर्थ है ‘मेरे लोग’ (My People)। पारंपरिक रूप से ये घुमंतू चरवाहे हैं जो अपने दूध और मांस के लिए पूरी तरह अपने पशुओं पर निर्भर रहते हैं। मासाई मानते हैं कि ज़मीन जोतना (खेती करना) प्रकृति के खिलाफ है। औपनिवेशिक शासन के दौरान इनका जीवन और इनकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो गई।
(क) चरागाहों का खो जाना (Where have the grazing lands gone?):
19वीं सदी के अंत तक मासाई लैंड (Maasailand) उत्तरी कीनिया से लेकर तंजानिया के स्टेप्स (Steppes) तक एक बहुत बड़े इलाके में फैला हुआ था।
- अफ्रीका का बंटवारा (1885): यूरोपीय शक्तियों (खासकर ब्रिटेन और जर्मनी) ने अफ्रीका को आपस में बांट लिया। 1885 में उन्होंने एक कृत्रिम रेखा (International Boundary) खींचकर मासाई लैंड को दो हिस्सों में चीर दिया—आधा ‘ब्रिटिश कीनिया’ में और आधा ‘जर्मन तांगानिका’ (Tanganyika) में चला गया।
- ज़मीन छिन जाना: अंग्रेज़ों ने सबसे अच्छी चरागाहों (Best pastures) पर कब्ज़ा कर लिया और उन्हें गोरे आबादकारों (White Settlers) को दे दिया। मासाईयों को दक्षिण कीनिया और उत्तरी तंजानिया के एक बहुत ही सूखे, छोटे और बंजर इलाके में धकेल दिया गया जहाँ बारिश न के बराबर होती थी। उन्होंने अपने पूर्व-औपनिवेशिक चरागाहों का लगभग 60% हिस्सा हमेशा के लिए खो दिया।
- नेशनल पार्क (National Parks): अंग्रेज़ों ने मासाईयों के बेहतरीन चरागाहों और पानी के स्रोतों को ‘गेम रिज़र्व’ या ‘नेशनल पार्क’ में बदल दिया। (उदाहरण: कीनिया का मासाई मारा (Maasai Mara) और साम्बुरू (Samburu) नेशनल पार्क, और तंजानिया का सेरेन्गेटी (Serengeti) नेशनल पार्क)। इन पार्कों में मासाईयों के घुसने, जानवर चराने या शिकार करने पर सख्त पाबंदी लगा दी गई। सेरेन्गेटी पार्क अकेले 14,760 वर्ग किलोमीटर में फैला था, जो मासाईयों के चरागाहों से छीना गया था। अब उन्हें पंगानी (Pangani) और अथि (Athi) जैसी नदियों तक जाने से रोक दिया गया।
सबसे अच्छी ज़मीनें छिन जाने और बचे-खुचे सूखे इलाके में बहुत सारे जानवरों के जमा हो जाने से, चारे की भयंकर कमी हो गई। सूखे के सालों में मासाईयों के जानवर भारी संख्या में भूखे मरने लगे। एक आंकड़े के अनुसार, 1933 और 1934 के लगातार दो सालों के सूखे में मासाईयों के आधे से ज़्यादा जानवर मर गए थे। (1930 में उनके पास 7,20,000 मवेशी, 8,20,000 भेड़ें और 1,71,000 गधे थे, जो आधे रह गए)।
(ख) सरहदें बंद हो गईं (The Borders are Closed):
19वीं सदी में चरवाहे चारे की तलाश में मीलों दूर तक जाते थे। लेकिन 19वीं सदी के अंत में औपनिवेशिक सरकार ने उनकी आवाजाही पर कड़ी पाबंदियां लगा दीं।
- मासाईयों को एक विशेष आरक्षित क्षेत्र (Reserves) की सीमाओं के भीतर कैद कर दिया गया। वे बिना विशेष परमिट के इस सीमा के बाहर नहीं जा सकते थे। परमिट पाना बहुत मुश्किल था और नियम तोड़ने पर कड़ी सज़ा (जेल या जुर्माना) मिलती थी।
- गोरे आबादकार इन चरवाहों को ‘बर्बर’ (Savage), ‘खतरनाक’ और ‘अपराधी’ मानते थे और उनसे कोई संबंध नहीं रखना चाहते थे। हालाँकि, गोरे लोग पूरी तरह चरवाहों से कट कर नहीं रह सकते थे क्योंकि उन्हें खानों (Mines) और सड़कें/शहर बनाने के लिए मासाई मज़दूरों की ज़रूरत होती थी।
5. मासाई समाज में बदलाव (Changes in Maasai Society)
औपनिवेशिक शासन से पहले मासाई समाज उम्र और काम के आधार पर दो मुख्य सामाजिक श्रेणियों (Age-sets) में बंटा हुआ था:
- वरिष्ठ जन (Elders): ये समाज के बड़े-बुज़ुर्ग थे। इनका काम समुदाय के मामलों पर चर्चा करना, झगड़े सुलझाना और फैसले लेना था। वे समाज को दिशा-निर्देश देते थे।
- योद्धा (Warriors): ये नौजवानों का समूह था। इनका मुख्य काम कबीले की रक्षा करना और दूसरे कबीलों के जानवरों पर हमला करके उन्हें छीनना (Cattle Raids) था। उस समाज में जहाँ जानवर ही संपत्ति थे, वहाँ जिसके पास जितने ज़्यादा जानवर होते थे, वह उतना ही शक्तिशाली माना जाता था। योद्धा अपनी बहादुरी और मर्दानगी साबित करने के लिए जानवरों के हमले (Raids) करते थे, जिसे समाज में एक जायज़ काम माना जाता था।
अंग्रेज़ों द्वारा समाज का ताना-बाना नष्ट करना:
मासाईयों के मामलों का प्रबंधन करने के लिए अंग्रेज़ों ने कई नए नियम थोप दिए जिन्होंने इस पूरी व्यवस्था को खत्म कर दिया:
- अंग्रेज़ों ने मासाईयों के विभिन्न उप-समूहों के लिए अपने पसंदीदा ‘मुखिया’ (Chiefs) नियुक्त कर दिए और कबीले की सारी ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप दी।
- उन्होंने ‘कैटल रेड’ (जानवरों पर हमले) और आपसी युद्धों पर सख्त कानूनी पाबंदी लगा दी।
- नतीजा: इससे पारंपरिक वरिष्ठ जनों (Elders) की सत्ता छिन गई और योद्धाओं (Warriors) का रुतबा पूरी तरह खत्म हो गया। अब कबीले में मुखिया की चलती थी।
अमीर और गरीब के बीच की गहरी खाई:
औपनिवेशिक बदलावों के कारण मासाई समाज में ‘अमीर’ और ‘गरीब’ का एक नया भेद पैदा हो गया:
- अमीर चरवाहे (मुखिया): अंग्रेज़ों द्वारा नियुक्त ‘मुखिया’ के पास नियमित आमदनी थी। वे उस पैसे से जानवर, ज़मीन और सामान खरीद सकते थे। वे गरीब पड़ोसियों को कर्ज़ (Loan) देते थे। सूखे के समय भी उनके पास गुज़ारा करने के लिए पैसे होते थे। वे शहर में रहकर व्यापार करने लगे और उनका परिवार गांवों में जानवर पालता था। इस तरह उनकी एक नई अमीर क्लास बन गई।
- गरीब चरवाहे: ज़्यादातर मासाई गरीब थे जो केवल अपने जानवरों पर निर्भर थे। युद्ध या सूखे के दौरान उनके सारे जानवर मारे जाते थे। उनके पास गुज़ारे का कोई और साधन नहीं था। उन्हें मजबूर होकर काम की तलाश में शहरों की ओर भागना पड़ा। वे चारकोल (कोयला) जलाने का काम करने लगे, या सड़क और भवन निर्माण में दिहाड़ी मज़दूर (Wage labourers) बन गए।
🌟 निष्कर्ष (Conclusion)
आधुनिक विश्व में चरवाहों की ज़िंदगी ने बहुत बड़े और दुखद बदलाव देखे हैं। नई सरहदों, वन कानूनों और चरागाहों के छिन जाने से उनकी आवाजाही पर रोक लग गई। लेकिन इसके बावजूद चरवाहों ने हार नहीं मानी है। वे अपने रेवड़ (जानवरों की संख्या) घटा लेते हैं, नए रास्ते खोज लेते हैं, और राजनीतिक दबाव बनाकर अपने अधिकारों की मांग करते हैं। दुनिया के कई पर्यावरणविद् अब यह मानने लगे हैं कि सूखे और पहाड़ी क्षेत्रों (Ecologically fragile regions) में रहने के लिए घुमंतू चरवाही जीवन ही सबसे वैज्ञानिक और टिकाऊ तरीका है। चरवाहे अतीत के किसी भूले-बिसरे युग के लोग नहीं हैं; उनकी जीवनशैली आज के आधुनिक विश्व के लिए भी एक बड़ी सीख है।
Geography(भूगोल )
कक्षा 9 भूगोल अध्याय 1
भारत – आकार और स्थिति
(India – Size and Location)
📌 अध्याय का परिचय (Chapter Introduction)
भारत विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है, जिसकी जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता तक जाती हैं। पिछले पाँच दशकों (50 वर्षों) में भारत ने सामाजिक और आर्थिक रूप से बहुमुखी उन्नति की है। कृषि, उद्योग, तकनीकी और सर्वांगीण आर्थिक विकास में भारत ने अद्भुत प्रगति की है। भारत का विश्व इतिहास बनाने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इस अध्याय में हम पृथ्वी के ग्लोब पर भारत की सटीक भौगोलिक स्थिति (Location) और इसके विशाल आकार (Size) के बारे में बहुत गहराई से जानेंगे।
1. स्थिति (Location)
भारत एक बहुत विशाल देश है। यह भूमध्य रेखा (Equator – 0°) के ऊपर, पूरी तरह से उत्तरी गोलार्द्ध (Northern Hemisphere) में स्थित है। देशांतर रेखाओं के हिसाब से यह पूर्वी गोलार्द्ध (Eastern Hemisphere) में आता है। पृथ्वी पर किसी भी देश की सटीक स्थिति का पता अक्षांश (Latitudes – आड़ी रेखाएं) और देशांतर (Longitudes – खड़ी रेखाएं) से लगाया जाता है।
(क) भारत का अक्षांशीय और देशांतरीय विस्तार:
- अक्षांशीय विस्तार (Latitudinal Extent): भारत की मुख्य भूमि का विस्तार दक्षिण में 8°4′ उत्तर (N) से लेकर उत्तर में 37°6′ उत्तर (N) अक्षांश के बीच है।
- देशांतरीय विस्तार (Longitudinal Extent): भारत का देशांतरीय विस्तार पश्चिम में 68°7′ पूर्व (E) से लेकर पूर्व में 97°25′ पूर्व (E) देशांतर के बीच है।
☀️ दिन और रात की अवधि पर अक्षांश का प्रभाव
अक्षांश का प्रभाव दक्षिण से उत्तर की ओर दिन और रात की अवधि (duration) पर पड़ता है।
- कन्याकुमारी (8°4′ N): यह भारत का सबसे दक्षिणी बिंदु (मुख्य भूमि का) है और भूमध्य रेखा (Equator) के बहुत करीब है। इसलिए यहाँ सूर्य की किरणें लगभग सीधी पड़ती हैं और दिन और रात की लंबाई में लगभग कोई अंतर महसूस नहीं होता (मुश्किल से 45 मिनट का अंतर)।
- कश्मीर (37°6′ N): यह भूमध्य रेखा से बहुत दूर उत्तर में है। इसलिए यहाँ गर्मियों और सर्दियों में दिन और रात की लंबाई में बहुत बड़ा अंतर (लगभग 5 घंटे तक का) महसूस होता है। सर्दियों में रातें बहुत लंबी और दिन छोटे होते हैं।
(ख) कर्क रेखा (Tropic of Cancer):
कर्क रेखा (23°30′ उत्तर) भारत को लगभग दो बराबर भागों में बाँटती है। यह रेखा पश्चिम से पूर्व की ओर भारत के 8 राज्यों से होकर गुज़रती है।
क्रमशः (पश्चिम से पूर्व): 1. गुजरात, 2. राजस्थान (बहुत छोटा हिस्सा), 3. मध्य प्रदेश, 4. छत्तीसगढ़, 5. झारखंड, 6. पश्चिम बंगाल, 7. त्रिपुरा और 8. मिज़ोरम।
कर्क रेखा के दक्षिण का हिस्सा उष्ण कटिबंधीय (Tropical) और उत्तर का हिस्सा उपोष्ण कटिबंधीय (Sub-tropical) जलवायु वाला है।
(ग) द्वीप समूह (Island Groups):
मुख्य भूभाग के अलावा भारत के दो प्रमुख द्वीप समूह हैं:
- दक्षिण-पूर्व (South-East) में: बंगाल की खाड़ी में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह स्थित हैं।
- दक्षिण-पश्चिम (South-West) में: अरब सागर में लक्षद्वीप द्वीप समूह स्थित हैं (जो प्रवाल/Coral से बने हैं)।
- (नोट / ‘क्या आप जानते हैं?’: भारतीय संघ राज्य का सबसे दक्षिणी बिंदु ‘इंदिरा बिंदु’ (Indira Point – 6°45′ N) था जो अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में स्थित था। लेकिन 2004 की भयंकर सुनामी लहरों के कारण यह बिंदु पूरी तरह समुद्र में जलमग्न हो गया।)
2. आकार (Size)
भारत न केवल 140 करोड़ की विशाल आबादी में, बल्कि अपने भौगोलिक क्षेत्रफल में भी दुनिया के सबसे बड़े देशों में गिना जाता है।
(क) क्षेत्रफल और विश्व में स्थान (Area and Rank):
- भारत के भूभाग का कुल क्षेत्रफल लगभग 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर (3.28 million sq. km) है।
- भारत का क्षेत्रफल विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का मात्र 2.4 प्रतिशत (2.4%) है, लेकिन यहाँ दुनिया की 17.5% आबादी रहती है।
- आकार के हिसाब से भारत विश्व का सातवाँ (7th) सबसे बड़ा देश है।
- विश्व के 7 बड़े देश (घटते क्रम में):
- रूस (Russia – 17.09 लाख वर्ग किमी)
- कनाडा (Canada – 9.98 लाख वर्ग किमी)
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA – 9.83 लाख वर्ग किमी)
- चीन (China – 9.60 लाख वर्ग किमी)
- ब्राज़ील (Brazil – 8.51 लाख वर्ग किमी)
- ऑस्ट्रेलिया (Australia – 7.69 लाख वर्ग किमी)
- भारत (India – 3.28 लाख वर्ग किमी)
(ख) सीमाएँ और विस्तार (Boundaries and Extent):
- स्थलीय सीमा (Land Boundary): भारत की स्थलीय सीमा रेखा बहुत विशाल है, जो लगभग 15,200 किलोमीटर है।
- तटीय सीमा (Coastline): मुख्य भूमि, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप द्वीप समूह को मिलाकर भारत की कुल समुद्री तट रेखा 7,516.6 किलोमीटर है।
🗺️ भारत का मानचित्र (Map of India)
भारत का उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम विस्तार लगभग समान (30°) है, लेकिन किलोमीटर में उत्तर-दक्षिण विस्तार अधिक है.
📏 उत्तर-दक्षिण लंबाई: 3,214 km | 📏 पूर्व-पश्चिम चौड़ाई: 2,933 km
नोट: भारत के बीचों-बीच से 82°30′ E (मानक याम्योत्तर) और 23°30′ N (कर्क रेखा) गुज़रती है।
(ग) भौगोलिक विशेषताएँ (Geographical Features):
भारत के उत्तर-पश्चिम, उत्तर तथा उत्तर-पूर्वी सीमा पर नवीन वलित पर्वत (Young Fold Mountains – हिमालय) स्थित हैं। इसके दक्षिण का भूभाग (प्रायद्वीपीय पठार) उत्तर में चौड़ा है और 22° उत्तरी अक्षांश से हिन्द महासागर की ओर यह त्रिभुजाकार (Tapering) होता गया है और संकरा हो गया है। इसके कारण हिन्द महासागर दो सागरों में बंट जाता है—पश्चिम में अरब सागर और पूर्व में बंगाल की खाड़ी।
⏱️ समय का अंतर और मानक याम्योत्तर (Standard Meridian) का गणित
भारत का अक्षांशीय और देशांतरीय विस्तार लगभग 30° है। (97°25′ E – 68°7′ E ≈ 30°)
- पृथ्वी को 1° देशांतर (Longitude) घूमने में 4 मिनट का समय लगता है।
- चूंकि भारत का विस्तार 30° है, इसलिए 30° × 4 मिनट = 120 मिनट = 2 घंटे।
- यही कारण है कि गुजरात (पश्चिम) से अरुणाचल प्रदेश (पूर्व) के स्थानीय समय में 2 घंटे का अंतर है। अरुणाचल प्रदेश में सूर्य गुजरात से 2 घंटे पहले उगता है।
- घड़ियों का समय एक समान (Uniform Time) बनाए रखने के लिए 82°30′ पूर्व (82°30’E) देशांतर रेखा को भारत की मानक याम्योत्तर (Standard Meridian of India) माना गया है।
- यही रेखा क्यों? क्योंकि यह रेखा देश के लगभग बीचों-बीच से गुज़रती है और यह 7°30′ (अंतर्राष्ट्रीय मानक) का गुणक है। यह रेखा उत्तर प्रदेश में मिर्ज़ापुर से होकर गुज़रती है। इसी रेखा के समय को ‘भारतीय मानक समय’ (IST) माना जाता है, जो पूरे देश में लागू होता है।
3. भारत तथा विश्व (India and the World)
भारतीय भूखंड एशिया महाद्वीप के पूर्व और पश्चिम के बिल्कुल बीच में स्थित है। भारत, एशिया महाद्वीप का दक्षिणी विस्तार है।
(क) हिन्द महासागर और केंद्रीय स्थिति (Central Location):
- हिन्द महासागर, जो पश्चिम में यूरोपीय देशों और पूर्व में एशियाई देशों को मिलाता है, भारत को एक महत्त्वपूर्ण केंद्रीय स्थिति (Strategic Central Location) प्रदान करता है।
- दक्षिण का पठार (Deccan Peninsula) हिन्द महासागर में शीर्षवत् फैला हुआ है। इसके कारण भारत पश्चिमी तट से पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप के साथ, तथा पूर्वी तट से दक्षिण-पूर्व और पूर्वी एशिया के साथ घनिष्ठ व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध बनाए हुए है।
- हिन्द महासागर में किसी भी अन्य देश की तटीय सीमा भारत जैसी लंबी नहीं है। भारत की इसी महत्त्वपूर्ण स्थिति के कारण इस महासागर का नाम एक देश (भारत / Indian Ocean) के नाम पर रखा गया है। विश्व का कोई अन्य महासागर किसी देश के नाम पर नहीं है।
(ख) स्वेज नहर का महत्त्व (Importance of Suez Canal):
सन् 1869 में स्वेज नहर (Suez Canal) के खुलने से भारत और यूरोप के बीच की दूरी 7,000 किलोमीटर कम हो गई। पहले जहाज़ों को केप ऑफ गुड होप (पूरे अफ्रीका महाद्वीप) का चक्कर लगाकर आना पड़ता था, लेकिन स्वेज नहर ने भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़कर एक सीधा और छोटा जलमार्ग दे दिया, जिससे व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
(ग) विचारों और वस्तुओं का आदान-प्रदान (Exchange of Ideas & Goods):
भारत का विश्व के देशों के साथ संपर्क युगों पुराना है, परन्तु यह संबंध समुद्री जलमार्गों की अपेक्षा भू-भागों (Land routes) से होकर अधिक था। प्राचीन काल में यात्री और व्यापारी उत्तरी पर्वतों के दर्रों (Passes – पहाड़ों के बीच के रास्ते) से होकर भारत आते-जाते थे, क्योंकि प्राचीन समय में समुद्री मार्ग ज़्यादा ज्ञात नहीं थे।
- भारत से विश्व को: इन मार्गों से प्राचीन समय से विचारों और वस्तुओं का आदान-प्रदान होता रहा है। भारत के उपनिषदों के विचार, रामायण, पंचतंत्र की कहानियाँ, भारतीय अंक (Numerals) और दशमलव प्रणाली (Decimal System) आदि संसार के विभिन्न भागों तक पहुँच सके। इसके अलावा भारतीय मसाले, मलमल (Muslin) का कपड़ा और व्यापार के अन्य सामान भारत से अन्य देशों में ले जाए जाते थे।
- विश्व से भारत को: इसके विपरीत, भारत पर भी विदेशी प्रभाव पड़ा। यूनानी मूर्तिकला (Greek sculpture), और पश्चिम एशिया की वास्तुकला के प्रतीक—मीनारों और गुंबदों (Domes and Minarets)—का प्रभाव हमारे देश के कई भागों (विशेषकर उत्तर भारत) में देखा जा सकता है।
4. भारत के पड़ोसी देश (India’s Neighbours)
भारत का दक्षिण एशिया में एक महत्त्वपूर्ण और अद्वितीय स्थान है। वर्तमान में भारत में 28 राज्य (States) और 8 केंद्र शासित प्रदेश (Union Territories) हैं।
🏛️ 1947 से पहले का भारत: प्रांत और रियासतें
आज़ादी (1947) से पहले भारत में दो प्रकार के राज्य थे:
- प्रांत (Provinces): इन पर अंग्रेज़ (ब्रिटिश) अधिकारियों का सीधा शासन होता था। वॉयसराय इन्हें नियुक्त करता था।
- रियासतें (Princely States): इन पर स्थानीय राजाओं या नवाबों का शासन होता था। ये राजा ब्रिटिश सरकार की संप्रभुता (प्रभुसत्ता) मानकर स्वायत्तता से शासन करते थे। (जैसे- हैदराबाद, कश्मीर, मैसूर आदि)।
(क) स्थलीय पड़ोसी देश (Land Neighbours) और उनसे जुड़े भारतीय राज्य:
भारत अपनी भूमि की सीमाएँ 7 देशों के साथ साझा करता है। परीक्षा की दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण है कि कौन सा देश किन राज्यों को छूता है:
- उत्तर-पश्चिम (North-West) में:
- पाकिस्तान: गुजरात, राजस्थान, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख की सीमा लगती है।
- अफगानिस्तान: केवल लद्दाख (पीओके क्षेत्र) की सीमा लगती है (सबसे छोटी सीमा)।
- उत्तर (North) में:
- चीन (तिब्बत): लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश।
- नेपाल: उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम।
- भूटान: सिक्किम, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश।
- पूर्व (East) में:
- म्यांमार (बर्मा): अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम।
- बांग्लादेश: पश्चिम बंगाल, मेघालय, असम, त्रिपुरा, मिज़ोरम (बांग्लादेश के साथ भारत की सबसे लंबी स्थलीय सीमा लगती है – 4096 किमी)।
🌊 समुद्री पड़ोसी देश (Island Neighbours)
दक्षिण में समुद्र पार हमारे दो पड़ोसी द्वीप राष्ट्र (Island countries) हैं:
- श्रीलंका (Sri Lanka): भारत और श्रीलंका के बीच एक छोटा समुद्री रास्ता है जिसे पाक जलसंधि (Palk Strait) और मन्नार की खाड़ी (Gulf of Mannar) कहा जाता है।
- मालदीव (Maldives): यह द्वीप समूह अरब सागर में स्थित हमारे ‘लक्षद्वीप द्वीप समूह’ के ठीक दक्षिण में स्थित है।
निष्कर्ष: अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक संबंधों के कारण भारत का अपने पड़ोसी देशों के साथ एक बहुत मज़बूत और अद्वितीय जुड़ाव है। एशिया के मानचित्र (Map) पर भारत एक अलग ही और विशिष्ट भौगोलिक इकाई (Sub-continent / उपमहाद्वीप) के रूप में दिखाई देता है।
कक्षा 9 भूगोल अध्याय 2
भारत का भौतिक स्वरूप
(Physical Features of India)
📌 अध्याय का परिचय (Chapter Introduction)
भारत विभिन्न स्थलाकृतियों (Topographies) वाला एक विशाल देश है। यहाँ पृथ्वी पर पाई जाने वाली लगभग हर प्रकार की भू-आकृतियाँ मौजूद हैं—जैसे ऊँचे पर्वत, विशाल मैदान, मरुस्थल, पठार और द्वीप समूह। यह विविधता इसलिए है क्योंकि भारत का भूभाग बहुत प्राचीन काल (करोड़ों वर्ष पूर्व) से लेकर नवीन कालों तक अनेक भूगर्भीय प्रक्रियाओं (Geological processes) जैसे—अपक्षय (Weathering), अपरदन (Erosion) और निक्षेपण (Deposition) से होकर गुज़रा है। इन भौतिक आकृतियों के निर्माण को वैज्ञानिक रूप से समझने के लिए सबसे मान्य सिद्धांत “प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत” (Theory of Plate Tectonics) है।
1. विवर्तनिक प्लेट सिद्धांत (Theory of Plate Tectonics)
इस सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी की ऊपरी पर्पटी (Crust) मुख्य रूप से सात बड़ी और कुछ छोटी प्लेटों से बनी है। पृथ्वी के अंदर पिघले हुए मैग्मा (Magma) में उठने वाली संवहनीय धाराओं के कारण ये प्लेटें हमेशा बहुत धीमी गति से खिसकती रहती हैं। प्लेटों की इस गति के कारण उनके बीच और उनके ऊपर स्थित महाद्वीपीय चट्टानों में भारी दबाव पैदा होता है, जिससे वलन (Folding – मुड़ना), भ्रंशीकरण (Faulting – दरारें पड़ना) और ज्वालामुखीय क्रियाएँ होती हैं।
प्लेटों की गतियाँ मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती हैं:
- अभिसारी परिसीमा (Convergent Boundary): जब दो प्लेटें एक-दूसरे के करीब आती हैं, तो वे टकराकर या तो टूट सकती हैं या एक प्लेट (भारी वाली) दूसरी के नीचे धंस सकती है। (इसी टकराव से हिमालय बना है)।
- अपसारी परिसीमा (Divergent Boundary): जब दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं, तो वे अपसारी परिसीमा का निर्माण करती हैं (जिससे समुद्र तल का फैलाव या दरार घाटियां बनती हैं)।
- रूपांतर परिसीमा (Transform Boundary): जब दो प्लेटें एक-दूसरे के साथ क्षैतिज दिशा (horizontally) में रगड़ खाती हुई खिसकती हैं। (इससे विनाशकारी भूकंप आते हैं)।
🏔️ भारत की भूमि और हिमालय का निर्माण (Formation of Himalayas)
प्राचीन काल में पृथ्वी पर केवल एक विशाल महाद्वीप था जिसे ‘पैंजिया’ (Pangea) कहते थे। इसके टूटने से दो हिस्से बने: उत्तरी हिस्सा अंगारालैंड (लॉरेशिया) और दक्षिणी हिस्सा ‘गोंडवानालैंड’ (Gondwanaland)। भारत का प्रायद्वीपीय पठार इसी प्राचीन गोंडवानालैंड का हिस्सा था। गोंडवानालैंड में आज का भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और अंटार्कटिका एक ही विशाल भूखंड के रूप में जुड़े हुए थे।
- संवहनीय धाराओं ने इस विशाल भूखंड को कई टुकड़ों में तोड़ दिया।
- इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट गोंडवानालैंड से अलग होकर उत्तर की ओर खिसकने लगी।
- उत्तर में यह अपने से बहुत बड़ी ‘यूरेशियन प्लेट’ (Eurasian Plate) से ज़ोरदार तरीके से टकराई।
- इस भयंकर टकराव के कारण दोनों प्लेटों के बीच स्थित ‘टेथिस सागर’ (Tethys Sea) नामक भू-अभिनति की तलछटीय चट्टानें (Sedimentary rocks) वलित (fold) होकर ऊपर उठ गईं, और इसी से हिमालय पर्वत प्रणाली और पश्चिम एशिया की पर्वत शृंखलाओं का निर्माण हुआ!
2. भारत के मुख्य भौगोलिक वितरण (Major Physiographic Divisions)
भारत की भौतिक आकृतियों को मुख्य रूप से 6 भौगोलिक वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:
(1) हिमालय पर्वत श्रृंखला (The Himalayan Mountains)
हिमालय भारत की उत्तरी सीमा पर फैला हुआ एक नवीन वलित पर्वत (Young Fold Mountain) है। यह विश्व की सबसे ऊँची और सबसे ऊबड़-खाबड़ पर्वत बाधाओं में से एक है। यह सिंधु नदी (पश्चिम) से लेकर ब्रह्मपुत्र नदी (पूर्व) तक लगभग 2400 किमी की लंबाई में एक अर्धवृत्त (Arc) के रूप में फैला है। इसकी चौड़ाई कश्मीर में 400 किमी और अरुणाचल प्रदेश में 150 किमी है। पश्चिमी भाग की तुलना में पूर्वी भाग की ऊँचाई में अधिक विविधता पाई जाती है।
उत्तर से दक्षिण की ओर देशांतरीय विस्तार के आधार पर हिमालय को तीन मुख्य समानांतर शृंखलाओं में बांटा जाता है:
- महान या आंतरिक हिमालय या हिमाद्रि (Great / Inner Himalayas / Himadri):
- यह सबसे उत्तरी, सबसे ऊँची और सबसे सतत (Continuous) शृंखला है।
- इसकी औसत ऊँचाई 6000 मीटर है। इसका क्रोड (Core) ग्रेनाइट (Granite) का बना है।
- विश्व के सबसे ऊँचे शिखर इसी में स्थित हैं: माउंट एवरेस्ट (नेपाल-8848 मी.), कंचनजंगा (भारत-8598 मी.), मकालू (नेपाल-8481 मी.), धौलागिरि (नेपाल-8172 मी.), और नंगा पर्वत (भारत-8126 मी.)। यह हमेशा बर्फ से ढकी रहती है और यहाँ कई हिमानियाँ (Glaciers) पाई जाती हैं।
- निम्न हिमालय या हिमाचल (Lesser Himalayas / Himachal):
- हिमाद्रि के दक्षिण में स्थित यह शृंखला मुख्य रूप से अत्यधिक संपीड़ित (compressed) और परिवर्तित चट्टानों से बनी है।
- औसत ऊँचाई 3700 से 4500 मीटर के बीच है, और चौड़ाई लगभग 50 किमी है। पीर पंजाल शृंखला सबसे लंबी और महत्त्वपूर्ण है। धौलाधर एवं महाभारत शृंखलाएँ भी यहीं हैं।
- यह क्षेत्र अपने खूबसूरत पहाड़ी नगरों (Hill Stations) और घाटियों के लिए प्रसिद्ध है, जैसे—कश्मीर की घाटी, हिमाचल का कांगड़ा और कुल्लू।
- शिवालिक (Shiwaliks):
- यह हिमालय की सबसे बाहरी शृंखला है। इसकी चौड़ाई 10 से 50 किमी और औसत ऊँचाई 900 से 1100 मीटर के बीच है।
- यह उत्तर की मुख्य हिमालय शृंखलाओं से नदियों द्वारा लाई गई असंपीड़ित अवसादों (Unconsolidated sediments – बजरी और जलोढ़) से बनी है।
- निम्न हिमालय (हिमाचल) और शिवालिक के बीच स्थित लंबवत घाटियों को ‘दून’ (Duns) कहा जाता है। उदाहरण: देहरादून, कोटली दून, और पाटली दून।
नदियों के आधार पर हिमालय का विभाजन (पश्चिम से पूर्व):
सतलुज, सिंधु, काली और तीस्ता जैसी नदियों की घाटियों ने हिमालय को पश्चिम से पूर्व की ओर 4 हिस्सों में बांटा है:
- पंजाब हिमालय: सिंधु और सतलुज नदियों के बीच का भाग। (इसे क्षेत्रीय रूप से कश्मीर या हिमाचल हिमालय भी कहते हैं)।
- कुमाऊँ हिमालय: सतलुज और काली नदियों के बीच का भाग।
- नेपाल हिमालय: काली और तीस्ता नदियों के बीच का भाग।
- असम हिमालय: तीस्ता और दिहांग नदियों के बीच का भाग।
पूर्वांचल (Purvanchal – पूर्वी पहाड़ियाँ): ब्रह्मपुत्र नदी हिमालय की सबसे पूर्वी सीमा बनाती है। दिहांग महाखड्ड (Gorge) के बाद हिमालय दक्षिण की ओर तेज़ी से मुड़कर भारत की पूर्वी सीमा पर फैल जाता है। इन्हें पूर्वांचल या पूर्वी पहाड़ियाँ कहते हैं। ये मुख्य रूप से मज़बूत बलुआ पत्थरों (अवसादी शैलों) से बनी हैं। यहाँ घने जंगल हैं। पूर्वांचल में पटकाई बुम (Patkai Bum), नागा, मिज़ो और मणिपुर पहाड़ियाँ शामिल हैं।
(2) उत्तरी मैदान (The Northern Plains)
हिमालय के उठने और प्रायद्वीपीय पठार के उत्तरी किनारे के नीचे धंसने से एक बहुत बड़ा बेसिन (गड्ढा) बन गया था। लाखों वर्षों में हिमालय से बहने वाली तीन प्रमुख नदी प्रणालियों—सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र तथा उनकी सहायक नदियों ने इस गड्ढे को उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी (Alluvium) से भर दिया, जिससे इस विशाल मैदान का निर्माण हुआ।
- यह मैदान लगभग 7 लाख वर्ग किमी में फैला है। यह 2400 किमी लंबा और 240-320 किमी चौड़ा है।
- समृद्ध मिट्टी, पर्याप्त पानी की उपलब्धता और अनुकूल जलवायु के कारण यह भारत का सबसे सघन जनसंख्या (Densely populated) वाला क्षेत्र है। कृषि की दृष्टि से यह भारत का सबसे उत्पादक क्षेत्र है।
💡 ‘दोआब’ और ‘पंजाब’ का अर्थ
दोआब (Doab): ‘दोआब’ का अर्थ है दो नदियों के बीच की भूमि। यह दो शब्दों से मिलकर बना है—’दो’ और ‘आब’ (पानी)।
पंजाब (Punjab): इसी प्रकार ‘पंजाब’ भी दो शब्दों से बना है—’पंज’ (पाँच) और ‘आब’ (पानी)। अर्थात् पाँच नदियों की भूमि।
उत्तरी मैदान के तीन भाग:
- पंजाब का मैदान (पश्चिमी भाग): सिंधु और इसकी सहायक नदियों (झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास, सतलुज – जो हिमालय से निकलती हैं) द्वारा निर्मित। इसका बहुत बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में है। इस मैदान में ‘दोआबों’ की संख्या बहुत अधिक है।
- गंगा का मैदान (मध्य भाग): यह मैदान घग्गर और तीस्ता नदियों के बीच फैला है। यह उत्तर भारत के राज्यों (हरियाणा, दिल्ली, यूपी, बिहार, झारखंड का कुछ हिस्सा और पश्चिम बंगाल) में फैला हुआ है।
- ब्रह्मपुत्र का मैदान (पूर्वी भाग): यह गंगा के मैदान के पूर्व में, विशेषकर असम में फैला है। (क्या आप जानते हैं? ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित माजुली (Majuli) विश्व का सबसे बड़ा नदी-द्वीप (Riverine Island) है जहाँ लोगों का निवास है।)
आकृतिक भिन्नता के आधार पर उत्तरी मैदान का विभाजन (उत्तर से दक्षिण):
नदियाँ पर्वतों से नीचे आते समय मैदानों में विभिन्न आकृतियाँ बनाती हैं:
- भाबर (Bhabar): नदियाँ पर्वतों से नीचे उतरते समय शिवालिक की ढाल के समानांतर 8-16 किमी चौड़ी पट्टी में गुटिका (Pebbles/कंकड़-पत्थर) का निक्षेपण करती हैं। यहाँ नदियाँ पत्थरों के नीचे छिप जाती हैं (अदृश्य हो जाती हैं)।
- तराई (Terai): भाबर पट्टी के दक्षिण में ये सरिताएँ (नदियाँ) फिर से धरातल पर निकल आती हैं और दलदली व नम क्षेत्र (Swampy & Marshy) बनाती हैं। इसे तराई कहते हैं। यह घने जंगलों और वन्य जीवों (जैसे दुधवा नेशनल पार्क) से भरा क्षेत्र था। (आज़ादी के बाद शरणार्थियों को बसाने के लिए इसके कई जंगल साफ कर दिए गए)।
- भांगर (Bhangar): यह उत्तरी मैदान का सबसे विशाल हिस्सा है जो पुराने जलोढ़ (Old Alluvium) से बना है। यह नदियों के बाढ़ वाले मैदान के ऊपर स्थित है और वेदियों (Terraces) जैसी सीढ़ीदार आकृति बनाता है। इस मिट्टी में चूनेदार निक्षेप पाए जाते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘कंकड़’ कहा जाता है।
- खादर (Khadar): यह बाढ़ वाले मैदानों का नया और युवा जलोढ़ (New Alluvium) है। इसका लगभग हर साल बाढ़ द्वारा नवीनीकरण होता है, इसलिए यह सबसे अधिक उपजाऊ (Highly Fertile) क्षेत्र है और गहन कृषि (Intensive agriculture) के लिए आदर्श है।
(3) प्रायद्वीपीय पठार (The Peninsular Plateau)
यह एक मेज़ (Table) की आकृति वाला स्थलरूप है जो पुराने क्रिस्टलीय, आग्नेय (Igneous) और रूपांतरित (Metamorphic) शैलों से बना है। यह प्राचीन गोंडवानालैंड के टूटने और अपवाह के कारण बना है, इसलिए यह भारत का सबसे प्राचीन भूभाग है। इसमें चौड़ी और छिछली घाटियाँ तथा गोलाकार पहाड़ियाँ हैं।
इस पठार के दो मुख्य भाग हैं (नर्मदा नदी इसे दो भागों में बांटती है):
A. मध्य उच्चभूमि (Central Highlands):
- नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित प्रायद्वीपीय पठार का वह भाग जो ‘मालवा के पठार’ के बड़े हिस्से पर फैला है।
- इसके दक्षिण में विंध्य शृंखला (Vindhya Range) और उत्तर-पश्चिम में अरावली (Aravali) की पहाड़ियाँ स्थित हैं। अरावली पहाड़ियाँ अत्यधिक अपरदित (Eroded) और खंडित हैं।
- पश्चिम में यह धीरे-धीरे राजस्थान के बलुई और पथरीले मरुस्थल में मिल जाता है।
- यहाँ बहने वाली नदियाँ (चंबल, सिंध, बेतवा और केन) दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर बहती हैं, जो इस क्षेत्र के ढाल (Slope) को दर्शाती हैं।
- यह पश्चिम में चौड़ा और पूर्व में संकीर्ण है। इसके पूर्वी विस्तार को स्थानीय रूप से बुंदेलखंड और बघेलखंड कहा जाता है। इसके सुदूर पूर्व में छोटानागपुर का पठार (Chotanagpur Plateau) स्थित है (जहाँ से दामोदर नदी बहती है और जो कोयले व लोहे जैसे खनिजों का भंडार है)।
B. दक्कन का पठार (Deccan Plateau):
- यह नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित एक त्रिभुजाकार (Triangular) भूभाग है। उत्तर में इसके चौड़े आधार पर सतपुड़ा (Satpura) की शृंखला है, जबकि महादेव, कैमूर की पहाड़ियाँ और मैकाल शृंखलाएँ इसके पूर्वी विस्तार हैं।
- यह पठार पश्चिम में ऊँचा है और पूर्व की ओर इसका ढाल कम होता जाता है।
- मेघालय का पठार: इस पठार का एक स्पष्ट हिस्सा उत्तर-पूर्व में भी देखा जाता है जिसे स्थानीय रूप से मेघालय, कार्बी-एंगलॉन्ग का पठार और उत्तर कछार पहाड़ी के नाम से जाना जाता है। यह एक भ्रंश (Fault) के कारण छोटानागपुर पठार से अलग हो गया है। पश्चिम से पूर्व की ओर यहाँ तीन महत्त्वपूर्ण पहाड़ियाँ हैं—गारो, खासी और जयंतिया।
- दक्कन ट्रैप (Deccan Trap): यह इस प्रायद्वीपीय पठार का वह हिस्सा है जहाँ काली मृदा (Black Soil) पाई जाती है। इसका निर्माण ज्वालामुखी के लावे (Volcanic Eruptions) से हुआ है, इसलिए इसकी शैलें आग्नेय (Igneous) हैं। ये शैलें समय के साथ टूटकर काली मिट्टी में बदल गई हैं जो कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
पश्चिमी घाट (Western Ghats) बनाम पूर्वी घाट (Eastern Ghats)
ये दक्कन के पठार के क्रमशः पश्चिमी और पूर्वी किनारे बनाते हैं:
- पश्चिमी घाट (Western Ghats):
- यह पश्चिमी तट के समानांतर स्थित है।
- यह सतत (Continuous) है और इसे केवल दर्रों (थाल घाट, भोर घाट, पाल घाट) से ही पार किया जा सकता है।
- यह पूर्वी घाट से अधिक ऊँचा है (इसकी औसत ऊँचाई 900-1600 मीटर है)।
- यहाँ ‘पर्वतीय वर्षा’ (Orographic rain) होती है क्योंकि पश्चिमी घाट नमी वाली हवाओं को रोकता है। इसकी ऊँचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती जाती है।
- यहाँ की सबसे ऊँची चोटियाँ अनाईमुडी (Anamudi – 2695m) और दोदाबेट्टा (Doda Betta – 2637m) हैं।
- पूर्वी घाट (Eastern Ghats):
- यह पूर्वी तट के समानांतर महानदी घाटी से दक्षिण में नीलगिरि तक फैला है।
- यह असतत और अनियमित (Discontinuous) है क्योंकि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों (गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) ने इसे काट दिया है।
- इसकी औसत ऊँचाई केवल 600 मीटर है।
- पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी महेंद्रगिरि (Mahendragiri – 1501m) है। इसके दक्षिण-पश्चिम में शेवरॉय (Shevroy) और जावेडी (Javadi) की पहाड़ियाँ स्थित हैं। प्रसिद्ध हिल स्टेशन उड़गमंडलम (ऊटी / Ooty) और कोडईकनाल यहीं स्थित हैं।
(4) भारतीय मरुस्थल (The Indian Desert)
- अरावली पहाड़ी के पश्चिमी किनारे पर ‘थार का मरुस्थल’ (Thar Desert) स्थित है।
- यह बालू के टिब्बों (Sand dunes) से ढका एक तरंगित (Undulating) मैदान है।
- यहाँ वार्षिक वर्षा बहुत कम (150 मि.मी. से भी कम) होती है। इसलिए यहाँ की जलवायु शुष्क (Arid) है और प्राकृतिक वनस्पति (पेड़-पौधे) बहुत कम है।
- बरसात के मौसम में कुछ सरिताएं (streams) दिखती हैं, पर वे जल्द ही रेत में ही विलीन हो जाती हैं और समुद्र तक नहीं पहुँच पातीं (अंतःस्थलीय अपवाह)। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी और एकमात्र प्रमुख नदी लूनी (Luni) है।
- बरकान (Barchans): ये अर्धचंद्राकार (Crescent-shaped) बालू के टीले होते हैं जो इस मरुस्थल के बहुत बड़े क्षेत्र में फैले होते हैं (विशेषकर जैसलमेर के पास इन्हें बहुत देखा जा सकता है)। हालाँकि, भारत-पाकिस्तान सीमा के पास लंबवत (longitudinal) टीले अधिक पाए जाते हैं।
(5) तटीय मैदान (The Coastal Plains)
प्रायद्वीपीय पठार के किनारों पर अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक संकीर्ण तटीय पट्टियों का विस्तार है।
- पश्चिमी तटीय मैदान (Western Coastal Plain): यह पश्चिमी घाट और अरब सागर के बीच स्थित एक संकरा (Narrow) मैदान है। इसके तीन भाग हैं:
- उत्तरी भाग: कोंकण (Konkan) – जो मुंबई तथा गोवा के बीच का तट है।
- मध्य भाग: कन्नड़ (Kannad) का मैदान।
- दक्षिणी भाग: मालाबार (Malabar) तट (मुख्यतः केरल का तट)।
- पूर्वी तटीय मैदान (Eastern Coastal Plain): यह पूर्वी घाट और बंगाल की खाड़ी के बीच स्थित एक चौड़ा और समतल (Level) मैदान है।
- उत्तरी भाग: इसे उत्तरी सरकार (Northern Circar) कहा जाता है।
- दक्षिणी भाग: इसे कोरोमंडल तट (Coromandel Coast) के नाम से जाना जाता है।
- यहाँ बहने वाली बड़ी नदियाँ (महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी) इस तट पर विशाल और उपजाऊ ‘डेल्टा’ (Delta) बनाती हैं।
- (क्या आप जानते हैं? उड़ीसा में महानदी डेल्टा के दक्षिण में स्थित चिल्का झील (Chilika Lake) भारत में खारे पानी की सबसे बड़ी झील है।)
(6) द्वीप समूह (The Islands)
मुख्य भूमि के अलावा भारत में दो प्रमुख द्वीप समूह भी हैं:
- लक्षद्वीप (Lakshadweep):
- यह अरब सागर में केरल (मालाबार तट) के पास स्थित है।
- यह प्रवाल (Corals) नामक छोटे सूक्ष्म समुद्री जीवों के कैल्शियम कार्बोनेट वाले कंकालों के जमाव से बना है।
(प्रवाल पॉलिप्स कम समय तक जीवित रहने वाले सूक्ष्म जीव हैं जो उथले, कीचड़-रहित और गर्म पानी में पनपते हैं। ऑस्ट्रेलिया की ‘ग्रेट बैरियर रीफ’ प्रवाल भित्ति का सबसे अच्छा उदाहरण है)। - पहले इन्हें लक्कादीव, मीनीकॉय और एमीनदीव कहा जाता था। 1973 में इनका नाम ‘लक्षद्वीप’ रखा गया।
- यह 32 वर्ग किमी के छोटे से क्षेत्र में फैला है। कावारत्ती द्वीप (Kavaratti) इसका प्रशासनिक मुख्यालय है। यहाँ पादप (plants) और जंतुओं (animals) की बहुत विविधता है। यहाँ एक पिटली (Pitti) द्वीप है जहाँ कोई मनुष्य नहीं रहता, वहाँ एक प्रसिद्ध पक्षी अभयारण्य (Bird Sanctuary) है।
- अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह (Andaman & Nicobar Islands):
- यह बंगाल की खाड़ी में उत्तर से दक्षिण की ओर फैली द्वीपों की एक लंबी शृंखला है। उत्तर के भाग को ‘अंडमान’ और दक्षिण को ‘निकोबार’ कहते हैं।
- ये द्वीप लक्षद्वीप से आकार में बड़े, संख्या में बहुल तथा दूर-दूर तक बिखरे हुए हैं। माना जाता है कि ये द्वीप निमज्जित पर्वत श्रेणियों (Elevated portion of submarine mountains) के शिखर हैं।
- यह द्वीप समूह देश की सुरक्षा के लिए सामरिक दृष्टि (Strategic importance) से बहुत महत्त्वपूर्ण है।
- विषुवत वृत्त (Equator) के नज़दीक होने के कारण यहाँ की जलवायु विषुवतीय (Equatorial) है और यहाँ घने विषुवतीय जंगल पाए जाते हैं।
- (क्या आप जानते हैं? भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcano) अंडमान निकोबार के बैरन द्वीप (Barren Island) पर स्थित है।)
🌟 निष्कर्ष: विविधता में एकता (Conclusion)
भारत के विभिन्न भौतिक (Physiographic) विभाग एक-दूसरे के पूरक (Complementary) हैं और देश को प्राकृतिक संसाधनों में अत्यधिक समृद्ध बनाते हैं:
- उत्तरी पर्वत (हिमालय): ये देश के लिए जल (Glaciers) और वन संपदा (Forest wealth) के सबसे प्रमुख स्रोत हैं, और मध्य एशिया से आने वाली बर्फीली हवाओं से भारत की रक्षा करते हैं।
- उत्तरी मैदान: ये देश के ‘अन्न भंडार’ (Granaries) हैं, जहाँ से हमारी विशाल आबादी को भोजन मिलता है। प्राचीन सभ्यताओं (जैसे सिंधु घाटी) का विकास भी इन्हीं नदी घाटियों में हुआ।
- प्रायद्वीपीय पठार: यह खनिजों (Minerals – कोयला, लोहा, बॉक्साइट आदि) का विशाल भंडार है, जिसने भारत के औद्योगीकरण (Industrialization) में मुख्य और ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।
- तटीय क्षेत्र और द्वीप समूह: ये मछली पकड़ने (Fishing) और समुद्री बंदरगाहों (Ports) के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए उत्कृष्ट स्थान प्रदान करते हैं।
इस प्रकार, भारत की यह अद्भुत भौतिक और भौगोलिक विविधता भविष्य में विकास की अनगिनत संभावनाएँ प्रदान करती है।
कक्षा 9 भूगोल अध्याय 3
अपवाह
(Drainage)
📌 अध्याय का परिचय एवं महत्त्वपूर्ण शब्दावली
भौतिक भूगोल में ‘अपवाह’ (Drainage) शब्द का अर्थ एक निश्चित क्षेत्र के नदी तंत्र (River system) से है। जब छोटी-छोटी धाराएँ (streams) अलग-अलग दिशाओं से आकर एक साथ मिल जाती हैं और एक मुख्य नदी का निर्माण करती हैं, तो उसे अपवाह तंत्र कहते हैं। एक नदी अपने उद्गम (Origin) से लेकर मुहाने (Mouth – जहाँ वह समुद्र या झील में मिलती है) तक कई रूपों में बहती है।
- अपवाह द्रोणी (Drainage Basin): एक मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा जिस पूरे भौगोलिक क्षेत्र का पानी बहाकर ले जाया जाता है, उस पूरे इलाके को ‘अपवाह द्रोणी’ या नदी बेसिन कहते हैं। (विश्व की सबसे बड़ी अपवाह द्रोणी अमेज़न नदी (Amazon River) की है। भारत में सबसे बड़ी अपवाह द्रोणी गंगा नदी की है।)
- जल विभाजक (Water Divide): जब कोई ऊँचा क्षेत्र, जैसे कोई पर्वत या उच्चभूमि, दो पड़ोसी अपवाह द्रोणियों को एक-दूसरे से अलग करता है, तो उस ऊँचे हिस्से को ‘जल विभाजक’ कहते हैं। उदाहरण: अंबाला (Ambala) नगर, सिंधु और गंगा नदी तंत्रों के बीच एक जल विभाजक का काम करता है। इसी कारण सिंधु का पानी पश्चिम में और गंगा का पानी पूर्व में बहता है।
🌊 अपवाह प्रतिरूप (Drainage Patterns)
नदियाँ अपने भूदृश्य की ढाल (Slope), चट्टानों की भौगोलिक संरचना और क्षेत्र की जलवायु के अनुसार विभिन्न प्रकार के ज्यामितीय प्रतिरूप (Pattern) बनाती हैं:
- दुमाकृतिक / वृक्षाकार (Dendritic): जब नदियाँ और उनकी सहायक नदियाँ एक पेड़ की शाखाओं (branches of a tree) जैसी आकृति बनाती हैं। यह तब होता है जब नदी भूखंड की ढाल के अनुसार बहती है (जैसे- गंगा नदी तंत्र)।
- जालीनुमा (Trellis): जब मुख्य नदियाँ एक-दूसरे के समानांतर बहती हैं और सहायक नदियाँ उनसे समकोण (90°) पर मिलती हैं। यह प्रतिरूप वहाँ होता है जहाँ कठोर और मुलायम चट्टानें समानांतर पाई जाती हैं।
- आयताकार (Rectangular): यह प्रतिरूप दृढ़ चट्टानी दरारों (rocky fractures/faults) वाले इलाकों में विकसित होता है जहाँ चट्टानें आयताकार खंडों में टूटी होती हैं।
- अरीय (Radial): जब एक केंद्रीय चोटी या गुंबद (Dome/Peak) से नदियाँ निकलकर चारों दिशाओं में बहती हैं (जैसे- मध्य प्रदेश में अमरकंटक पहाड़ी से निकलने वाली नदियाँ – नर्मदा पश्चिम में और सोन उत्तर-पूर्व में)।
1. भारत में अपवाह तंत्र (Drainage Systems in India)
भारत की नदियों को उनके उद्गम (Origin) और भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है:
(क) हिमालय की नदियाँ (Himalayan Rivers):
- ये नदियाँ बारहमासी (Perennial) होती हैं, अर्थात् इनमें साल भर पानी रहता है। इसका कारण यह है कि इन्हें वर्षा के पानी के साथ-साथ ऊँचे पहाड़ों पर पिघलने वाली बर्फ (Glaciers/हिमानियों) से भी पानी मिलता है।
- ये नदियाँ लंबी होती हैं और अपने उद्गम से लेकर समुद्र तक का एक लंबा और दुर्गम रास्ता तय करती हैं।
- नदी की अवस्थाएँ:
- ऊपरी भाग (पहाड़ों पर): ये नदियाँ पहाड़ों में भारी अपरदन (Erosion) करती हैं और गहरे गॉर्ज (Gorges) व V-आकार की घाटियाँ बनाती हैं। अपने साथ भारी मात्रा में गाद (Silt) और बालू बहाकर लाती हैं।
- मध्य एवं निचले भाग (मैदानों में): यहाँ नदी का बहाव धीमा हो जाता है। ये नदियाँ मैदानी भागों में विसर्प (Meanders – साँप की तरह बलखाकर बहना) और गोखुर झीलें (Ox-bow lakes) बनाती हैं।
- मुहाने पर: समुद्र में मिलने से पहले ये विशाल डेल्टा (Delta) का निर्माण करती हैं।
(ख) प्रायद्वीपीय नदियाँ (Peninsular Rivers):
- ये नदियाँ मुख्य रूप से मौसमी (Seasonal) होती हैं, क्योंकि इनका प्रवाह केवल मानसूनी वर्षा पर निर्भर करता है। शुष्क (गर्मी के) मौसम में बड़ी नदियों का पानी भी कम होकर छोटी धाराओं में बहने लगता है।
- इनकी लंबाई हिमालय की नदियों की तुलना में कम होती है और ये छिछली (Shallow) होती हैं। ये हिमालय की नदियों से अधिक पुरानी हैं।
- ज़्यादातर प्रायद्वीपीय नदियाँ पश्चिमी घाट (Western Ghats) से निकलती हैं और पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। कुछ नदियाँ (जैसे नर्मदा और तापी) मध्य उच्चभूमि से निकलकर पश्चिम की ओर बहती हैं।
2. हिमालय की नदियाँ (The Himalayan Rivers)
हिमालय से निकलने वाली तीन प्रमुख नदी प्रणालियाँ हैं: सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र। एक मुख्य नदी और उसकी सभी सहायक नदियों (Tributaries) को मिलाकर ‘नदी तंत्र’ (River System) कहा जाता है।
(I) सिंधु नदी तंत्र (The Indus River System)
- उद्गम (Origin): सिंधु नदी का उद्गम तिब्बत में मानसरोवर झील (Lake Mansarovar) के निकट बोखर चू हिमनद से होता है।
- प्रवाह मार्ग: पश्चिम की ओर बहती हुई यह नदी भारत में लद्दाख (लेह) से प्रवेश करती है। यहाँ यह एक बहुत ही सुंदर और दर्शनीय गॉर्ज (Gorge/महाखड्ड) बनाती है। फिर यह गिलगित और बाल्टिस्तान से होते हुए अटक के पास पहाड़ों से बाहर मैदानी इलाके में आती है और पाकिस्तान में चली जाती है। अंत में यह कराची के पूर्व में अरब सागर (Arabian Sea) में गिरती है।
- प्रमुख सहायक नदियाँ:
- लद्दाख क्षेत्र में (पहाड़ी सहायक नदियाँ): जास्कर, नूब्रा, श्योक और हुंजा।
- मैदानी सहायक नदियाँ: पाकिस्तान के मिठानकोट (Mithankot) के पास इसमें पाँच प्रमुख नदियाँ आकर मिलती हैं: सतलुज, ब्यास, रावी, चेनाब और झेलम (इन्हीं पाँच नदियों के कारण भारत के इस क्षेत्र का नाम ‘पंजाब’ पड़ा है)।
- लंबाई और बेसिन: सिंधु नदी की कुल लंबाई 2,900 किलोमीटर है (यह विश्व की लंबी नदियों में से एक है)। इसका एक-तिहाई से कुछ अधिक बेसिन भारत (लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब) में स्थित है, और शेष भाग पाकिस्तान में है।
- (क्या आप जानते हैं? सिंधु जल समझौता (Indus Water Treaty – 1960) के नियमों के अनुसार, भारत इस नदी तंत्र के कुल पानी का केवल 20% हिस्सा ही उपयोग कर सकता है। इस पानी का उपयोग पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के दक्षिणी-पश्चिमी भागों में सिंचाई के लिए किया जाता है।)
(II) गंगा नदी तंत्र (The Ganga River System)
- उद्गम (Origin): गंगा की मुख्य धारा, जिसे ‘भागीरथी’ कहा जाता है, उत्तराखंड के गंगोत्री हिमानी (Gangotri Glacier) से निकलती है।
- देवप्रयाग का संगम: उत्तराखंड के देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा (Alaknanda) नदियाँ आपस में मिलती हैं। इसी संगम के बाद इस नदी को पूर्ण रूप से ‘गंगा’ नाम से जाना जाता है। गंगा नदी हरिद्वार के पास पहाड़ों को छोड़कर मैदानी भाग में प्रवेश करती है।
- हिमालय से आने वाली सहायक नदियाँ (Left Bank / बाएँ किनारे की नदियाँ): घाघरा, गंडक और कोसी।
- ये नदियाँ नेपाल हिमालय से निकलती हैं।
- ये हर साल उत्तरी मैदानों के कुछ हिस्सों में भयंकर बाढ़ लाती हैं (विशेषकर कोसी, जो अपना मार्ग बदलने के लिए कुख्यात है और जिसे ‘बिहार का शोक’ कहते हैं)। इससे जान-माल का भारी नुकसान होता है, लेकिन ये बाढ़ के साथ उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी भी लाती हैं जिससे यह क्षेत्र कृषि के लिए बहुत समृद्ध हो गया है।
- दाहिने किनारे की सहायक नदियाँ (Right Bank):
- यमुना: हिमालय के यमुनोत्री हिमानी से निकलती है और गंगा के दाहिने किनारे के समानांतर बहती हुई इलाहाबाद (प्रयागराज) में गंगा में मिल जाती है।
- प्रायद्वीपीय पठार से आने वाली नदियाँ: चंबल, बेतवा और सोन। ये अर्ध-शुष्क (Semi-arid) क्षेत्रों से निकलती हैं। इनकी लंबाई कम होती है और इनमें पानी की मात्रा कम होती है, क्योंकि इन्हें बारिश का कम पानी मिलता है।
- सुंदरवन डेल्टा और समाप्ति: गंगा अपने दोनों किनारों की सहायक नदियों के जल से परिपूर्ण होकर पूर्व की ओर पश्चिम बंगाल के फरक्का (Farakka) तक बहती है। यह गंगा डेल्टा का सबसे उत्तरी बिंदु है। यहाँ नदी दो धाराओं में बंट जाती है:
- भागीरथी-हुगली (वितरिका / Distributary): जो दक्षिण की ओर बहकर डेल्टा के मैदानों से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। (कोलकाता इसी के किनारे बसा है)।
- मुख्य धारा (पद्मा): जो दक्षिण की ओर बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहाँ ब्रह्मपुत्र (जिसे वहाँ जमुना कहते हैं) इसमें आकर मिलती है। इन दोनों के अंतिम संगम के बाद इसे विशाल नदी ‘मेघना’ (Meghna) कहा जाता है।
- लंबाई और ढाल (Length & Slope): गंगा की कुल लंबाई 2,500 किमी से अधिक है। अंबाला नगर (जो सिंधु और गंगा के बीच जल विभाजक है) से सुंदरवन तक की दूरी लगभग 1800 किमी है, लेकिन इस दौरान ढाल (slope) में गिरावट केवल 300 मीटर है। इसका मतलब है प्रति 6 किलोमीटर पर ढाल में केवल 1 मीटर की गिरावट आती है। इसी अत्यंत धीमी गति के कारण गंगा नदी मैदानी इलाकों में बड़े-बड़े विसर्प (Meanders) बनाती है।
🛡️ ‘नमामि गंगे’ योजना (Namami Gange Programme)
यह भारत सरकार द्वारा जून 2014 में शुरू किया गया एक ‘एकीकृत संरक्षण मिशन’ (Integrated Conservation Mission) है। इसे एक फ्लैगशिप प्रोग्राम का दर्जा दिया गया है। इसके दो मुख्य उद्देश्य हैं:
- राष्ट्रीय नदी गंगा में प्रदूषण को प्रभावी ढंग से कम करना (सीवेज ट्रीटमेंट, औद्योगिक कचरा रोकना)।
- गंगा नदी का संरक्षण और उसका पारिस्थितिक कायाकल्प (Rejuvenation) करना, जिसमें रिवर फ्रंट विकास और घाटों की सफाई शामिल है।
(III) ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र (The Brahmaputra River System)
- उद्गम (Origin): यह भी तिब्बत की मानसरोवर झील के पूर्व से निकलती है (सिंधु और सतलुज के उद्गम के बहुत करीब से)। तिब्बत में इसे ‘सांगपो’ (Tsangpo) कहा जाता है जिसका अर्थ है ‘शोधक’ (Purifier)। इसकी ज़्यादातर लंबाई भारत के बाहर स्थित है।
- यह हिमालय के समानांतर पूर्व की ओर बहती है। नामचा बरवा (Namcha Barwa – 7757m) शिखर के पास पहुँचकर यह अंग्रेज़ी के ‘U’ (यू) अक्षर जैसा मोड़ लेकर एक गहरे गॉर्ज (दिहांग महाखड्ड) के माध्यम से भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। यहाँ इसे ‘दिहांग’ (Dihang) कहा जाता है।
- सहायक नदियाँ: दिबांग, लोहित और केनुला जैसी नदियाँ इसमें मिलती हैं और इसके बाद असम घाटी में इसे ‘ब्रह्मपुत्र’ कहा जाता है।
- विशेषताएँ (Silt & Water): तिब्बत एक शीत और शुष्क (Cold & Dry) क्षेत्र है, इसलिए वहाँ इस नदी में पानी और सिल्ट (गाद) कम होता है। लेकिन भारत में यह उच्च वर्षा वाले क्षेत्र (असम/अरुणाचल) से गुज़रती है, इसलिए इसमें पानी और सिल्ट की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती है।
- असम में ब्रह्मपुत्र एक गुंफित नदी (Braided river – कई धाराओं में बंटी हुई नदी) के रूप में बहती है और कई नदी-द्वीपों (Riverine Islands) का निर्माण करती है (जैसे माजुली द्वीप, जो विश्व का सबसे बड़ा आबाद नदी-द्वीप है)।
- हर साल बरसात के मौसम (मानसून) में यह नदी अपने किनारों से बाहर बहने लगती है और असम तथा बांग्लादेश में भयंकर बाढ़ लाती है। उत्तर भारत की अन्य नदियों के विपरीत, ब्रह्मपुत्र अपने तल में बहुत अधिक सिल्ट जमा करती है, जिससे नदी का तल (Bed) ऊपर उठ जाता है और यह बार-बार अपना रास्ता (Channel) बदलती है।
3. प्रायद्वीपीय नदियाँ (The Peninsular Rivers)
प्रायद्वीपीय भारत में मुख्य जल विभाजक का निर्माण पश्चिमी घाट (Western Ghats) द्वारा होता है, जो पश्चिमी तट के बिल्कुल पास उत्तर से दक्षिण की ओर स्थित है। इस क्षेत्र की ज़्यादातर प्रमुख नदियाँ (महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) पश्चिमी घाट से निकलकर पूर्व की ओर बहती हैं और बंगाल की खाड़ी में गिरकर मुहाने पर बड़े डेल्टा बनाती हैं। केवल दो बड़ी नदियाँ (नर्मदा और तापी) मध्य उच्चभूमि से निकलकर पश्चिम की ओर बहती हैं और अरब सागर में गिरकर डेल्टा के बजाय ज्वारनदमुख (Estuaries – एश्चुअरी / मुहाना) बनाती हैं।
(A) पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ:
- नर्मदा द्रोणी (Narmada Basin):
- उद्गम: मध्य प्रदेश में अमरकंटक (Amarkantak) की पहाड़ियाँ।
- यह एक भ्रंश घाटी (Rift Valley) में पश्चिम की ओर बहती है जो भ्रंशीकरण के कारण बनी है।
- अपने मार्ग में यह बहुत ही सुंदर दर्शनीय स्थल बनाती है। जबलपुर के पास यह संगमरमर के पत्थरों (Marble rocks) से होकर गुज़रती है जहाँ यह एक गहरे गॉर्ज से बहती है, और ‘धुआँधार प्रपात’ (Dhuandhar Falls) नामक एक बहुत सुंदर जलप्रपात बनाती है।
- नर्मदा की सहायक नदियाँ बहुत छोटी हैं और ज़्यादातर समकोण (Right angles) पर मुख्य धारा से मिलती हैं (जालीनुमा प्रतिरूप)। इसका बेसिन मध्य प्रदेश और गुजरात में है। मध्य प्रदेश सरकार ने इसके संरक्षण के लिए ‘नमामि देवी नर्मदे’ योजना शुरू की है। (सरदार सरोवर बांध इसी नदी पर गुजरात में बना है)।
- तापी द्रोणी (Tapi Basin):
- उद्गम: मध्य प्रदेश के बैतूल (Betul) जिले में सतपुड़ा की श्रृंखलाओं से।
- यह भी नर्मदा के समानांतर एक भ्रंश घाटी में बहती है, लेकिन इसकी लंबाई नर्मदा से बहुत कम है।
- इसका बेसिन मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में फैला है।
- पश्चिमी घाट और अरब सागर के बीच का तटीय मैदान बहुत संकरा है, इसलिए पश्चिम की ओर बहने वाली तटीय नदियाँ बहुत छोटी होती हैं। मुख्य नदियाँ साबरमती, माही, भरतपुझा (केरल) और पेरियार हैं।
(B) पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ (The East Flowing Rivers):
- गोदावरी द्रोणी (Godavari Basin):
- यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी नदी है। इसकी लंबाई लगभग 1500 किमी है।
- उद्गम: महाराष्ट्र के नासिक (Nasik) जिले में पश्चिमी घाट की ढलानों से।
- प्रायद्वीपीय नदियों में इसका अपवाह तंत्र (Basin) सबसे बड़ा है। इसका लगभग 50% बेसिन महाराष्ट्र में है, बाकी मध्य प्रदेश, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में है।
- प्रमुख सहायक नदियाँ: पूर्णा, वर्धा, प्रानहिता, मांजरा, वैनगंगा और पेनगंगा (इनमें से अंतिम तीन—मांजरा, वैनगंगा, और पेनगंगा—बहुत बड़ी हैं)।
- अपने विशाल आकार और विस्तार के कारण इसे आदर से ‘दक्षिण गंगा’ (Dakshin Ganga) के नाम से भी जाना जाता है।
- महानदी द्रोणी (Mahanadi Basin):
- उद्गम: छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) की उच्चभूमि से।
- यह ओडिशा से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसकी लंबाई 860 किमी है। इसका अपवाह बेसिन महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा में है।
- कृष्णा द्रोणी (Krishna Basin):
- उद्गम: महाराष्ट्र में महाबलेश्वर (Mahabaleshwar) के पास एक सोते (Spring) से।
- इसकी लंबाई लगभग 1400 किमी है। इसका बेसिन महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में फैला है।
- प्रमुख सहायक नदियाँ: तुंगभद्रा (Tungabhadra), कोयना, घाटप्रभा, मूसी और भीमा।
- कावेरी द्रोणी (Kaveri Basin):
- उद्गम: पश्चिमी घाट की ब्रह्मगिरि (Brahmagiri) शृंखला से।
- यह तमिलनाडु में कुड्डलूर (Cuddalore) के दक्षिण में बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसकी लंबाई 760 किमी है। इसका बेसिन कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में है।
- प्रमुख सहायक नदियाँ: अमरावती, भवानी, हेमावती और काबिनी।
- (क्या आप जानते हैं? कावेरी नदी भारत का दूसरा सबसे बड़ा जलप्रपात बनाती है, जिसे शिवसमुद्रम (Shivasamudram) कहते हैं। इससे पैदा होने वाली पनबिजली (Hydroelectricity) मैसूर, बेंगलुरु और कोलार गोल्ड फील्ड को दी जाती है। भारत का सबसे बड़ा प्रपात कर्नाटक में शरावती नदी पर स्थित ‘जोग प्रपात’ (Jog Falls) है।)
पूर्व की ओर बहने वाली कुछ अन्य छोटी लेकिन महत्त्वपूर्ण नदियाँ दामोदर, ब्राह्मणी, बैतरणी और सुवर्णरेखा हैं जो अपने-अपने बेसिन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
4. झीलें (Lakes)
कश्मीर की घाटी और डल झील (शिकारा, हाउसबोट) से हम सभी परिचित हैं। अगर झीलों का अस्तित्व न होता, तो शायद श्रीनगर, नैनीताल या उदयपुर का पर्यटन इतना आकर्षक न होता। पृथ्वी की सतह के गर्तों (Depressions) में जहाँ पानी जमा हो जाता है, उसे झील कहते हैं। बड़े आकार की झीलों को ‘सागर’ भी कहा जाता है (जैसे- कैस्पियन, मृत और अरल सागर)। झीलों में पानी स्थायी हो सकता है या केवल बारिश के मौसम में आ सकता है।
झीलों के प्रकार और उदाहरण:
- गोखुर झील (Ox-bow lakes): जब कोई विसर्पी (Meandering) नदी बाढ़ वाले मैदान में बहुत ज़्यादा मुड़ जाती है और मुख्य धारा से कट जाती है, तो वह एक अर्धचंद्राकार झील बनाती है जिसे गोखुर झील कहते हैं (जैसे गाय का खुर)।
- लैगून झीलें (Lagoons): तटीय क्षेत्रों में समुद्र की लहरों (Spits and Bars/रोदिका) द्वारा जब खारा पानी मुख्य समुद्र से कट कर एक उथली झील बन जाता है। उदाहरण: चिल्का झील (भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की झील – ओडिशा), पुलीकट झील (आंध्र प्रदेश) और कोलेरू झील।
- मीठे पानी की झीलें (Freshwater Lakes): ज़्यादातर मीठे पानी की झीलें हिमालय क्षेत्र में हैं। ये हिमानियों (Glaciers) द्वारा बनाई गई हैं। जब ग्लेशियर पिघले तो बर्फ ने उन गर्तों को पानी से भर दिया जिन्हें ग्लेशियरों ने खोदा था।
अपवाद: जम्मू-कश्मीर की वुलर झील (Wular Lake)। यह हिमानी से नहीं, बल्कि टेक्टोनिक गतिविधियों (भूगर्भीय क्रियाओं/Earthquakes) से बनी है। यह भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की प्राकृतिक झील है। अन्य उदाहरण: डल झील, भीमताल, नैनीताल, लोकताक और बारापानी। - खारे पानी की झीलें (Saltwater lakes): अंतर्देशीय जल निकासी वाले शुष्क क्षेत्रों (रेगिस्तानों) में पाई जाती हैं जहाँ वाष्पीकरण अधिक होता है। उदाहरण: राजस्थान की साँभर झील (Sambhar Lake)। इसका पानी बहुत खारा है और इसका उपयोग बड़े पैमाने पर नमक (Salt) बनाने के लिए किया जाता है। यह एक मौसमी झील है।
- कृत्रिम झीलें (Artificial Lakes): जलविद्युत उत्पादन (Hydro power) के लिए नदियों पर बड़े बांध (Dams) बनाने से भी नदी के पीछे विशाल झीलें बन जाती हैं। उदाहरण: भाखड़ा-नांगल परियोजना से बनी गुरु गोबिंद सागर (Guru Gobind Sagar) झील, और राणा प्रताप सागर, नागार्जुन सागर, हीराकुंड झील।
💧 झीलों का महत्त्व (Importance of Lakes)
झीलें मानव और पर्यावरण के लिए अत्यधिक लाभदायक होती हैं:
- ये नदी के बहाव को सुचारू (regulate) बनाती हैं। भारी बारिश के समय ये अतिरिक्त पानी को सोखकर बाढ़ को रोकती हैं और सूखे के मौसम में पानी का बहाव बनाए रखने में मदद करती हैं।
- इनका उपयोग जलविद्युत (Hydropower) पैदा करने में किया जाता है।
- ये आस-पास की जलवायु को सामान्य (Moderate) बनाए रखती हैं और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic ecosystem) को संतुलित रखती हैं।
- झीलें प्राकृतिक सुंदरता बढ़ाती हैं, पर्यटन (Tourism) को आकर्षित करती हैं और लोगों को मनोरंजन प्रदान करती हैं।
5. अर्थव्यवस्था में नदियों का महत्त्व (Role of Rivers in the Economy)
संपूर्ण मानव इतिहास में नदियों का अत्यधिक महत्त्व रहा है। नदियों का जल एक बुनियादी प्राकृतिक संसाधन है, जो मानव की अनेक दैनिक और आर्थिक गतिविधियों के लिए अनिवार्य है।
- प्राचीन काल से ही नदियों के किनारों ने मानव बस्तियों (Civilizations) को अपनी ओर आकर्षित किया है। आज ये बस्तियाँ बड़े-बड़े औद्योगिक और व्यापारिक शहरों में बदल चुकी हैं (जैसे- गंगा के किनारे कानपुर, पटना, वाराणसी, और यमुना के किनारे दिल्ली)।
- भारत जैसे एक विकासशील और कृषि प्रधान देश के लिए नदियाँ जीवन-रेखा (Lifeline) हैं। इनका पानी सिंचाई (Irrigation), नौसंचालन (Navigation/परिवहन) और जलविद्युत (Hydro-power generation) के लिए बहुत ज़रूरी है।
6. नदी प्रदूषण और संरक्षण (River Pollution and Conservation)
नदियों से बढ़ती घरेलू, औद्योगिक और कृषि माँगों के कारण, नदियों में पानी की गुणवत्ता (Quality of water) तेज़ी से गिर रही है।
- मांग बढ़ने से नदियों से बहुत ज़्यादा पानी निकाला जा रहा है, जिससे उनका आयतन (Volume of water) लगातार कम हो गया है।
- दूसरी ओर, भारी मात्रा में अनुपचारित कचरा (Untreated sewage) और विषैला रासायनिक अपशिष्ट (Industrial effluents) सीधे नदियों में बहा दिया जाता है। यह न केवल पानी की गुणवत्ता को खराब करता है बल्कि नदी की स्वतः-स्वच्छीकरण क्षमता (Self-cleansing capacity) को भी पूरी तरह नष्ट कर देता है।
(उदाहरण: यदि गंगा नदी में बहाव तेज़ और पर्याप्त हो, तो वह 20 किमी के दायरे में बड़े शहरों की गंदगी को साफ कर सकती है, लेकिन लगातार बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण और कम होते बहाव के कारण नदी प्रदूषण कम नहीं कर पा रही है।)
🛡️ राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP)
नदियों के बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए सरकार ने कई नीतियाँ और कार्य योजनाएँ बनाई हैं। भारत में नदी सफाई के कार्यक्रम की शुरुआत 1985 में ‘गंगा एक्शन प्लान’ (Ganga Action Plan – GAP) के पहले चरण के साथ हुई थी।
1995 में इस योजना का विस्तार देश की अन्य महत्त्वपूर्ण नदियों तक कर दिया गया और इसे राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (National River Conservation Plan – NRCP) का नाम दिया गया। इसका मुख्य उद्देश्य नदियों में गिरने वाले गंदे पानी (Sewage) को रोकने के लिए इंटरसेप्शन और डायवर्जन के काम करना तथा पानी को ‘सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट’ (STP) के ज़रिए साफ करके ही नदी में छोड़ना है, ताकि देश की जल गुणवत्ता में सुधार हो सके। बिना स्वच्छ जल के एक स्वस्थ मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
कक्षा 9 भूगोल अध्याय 4
जलवायु
(Climate)
📌 जलवायु और मौसम में अंतर (Climate vs Weather)
हम अक्सर इन दोनों शब्दों का इस्तेमाल एक ही अर्थ में कर देते हैं, लेकिन भूगोल में इनका अर्थ बिल्कुल अलग है:
- मौसम (Weather): एक विशेष समय में किसी क्षेत्र के वायुमंडल की अल्पकालिक अवस्था को मौसम कहते हैं। मौसम एक ही दिन में कई बार बदल सकता है (जैसे- सुबह तेज़ धूप, और दोपहर में अचानक बारिश)।
- जलवायु (Climate): एक विशाल क्षेत्र में लंबे समयावधि (कम से कम 30 वर्ष से अधिक) में मौसम की अवस्थाओं तथा विविधताओं के कुल योग (औसत) को जलवायु कहते हैं।
मौसम तथा जलवायु के तत्त्व समान होते हैं: 1. तापमान (Temperature), 2. वायुमंडलीय दाब (Atmospheric pressure), 3. पवन (Wind), 4. आर्द्रता (Humidity) और 5. वर्षण (Precipitation)। भारत की जलवायु को मोटे तौर पर ‘मानसूनी’ (Monsoon) जलवायु कहा जाता है। ‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी शब्द ‘मौसिम’ (Mausim) से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘ऋतु’ (Season)।
🌡️ भारत में तापमान और वर्षण की प्रादेशिक विविधताएँ
यद्यपि भारत की जलवायु मानसूनी है, फिर भी देश के अलग-अलग हिस्सों में भारी विविधता देखने को मिलती है:
- तापमान में अंतर: गर्मियों में राजस्थान के मरुस्थल में कुछ स्थानों (जैसे चुरू) का तापमान 50°C तक पहुँच जाता है, जबकि उसी समय जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में तापमान लगभग 20°C रहता है। सर्दियों की रात में जम्मू-कश्मीर के द्रास (Drass) का तापमान -45°C तक गिर जाता है, जबकि तिरुवनंतपुरम (केरल) में यह 22°C रहता है।
- वर्षण में अंतर: हिमालय के ऊपरी भागों में वर्षण (Precipitation) बर्फ (Snow) के रूप में होता है, जबकि देश के बाकी हिस्सों में यह बारिश (Rain) के रूप में होता है। मेघालय में वार्षिक वर्षा 400 सेमी से अधिक होती है, जबकि लद्दाख और पश्चिमी राजस्थान में यह 10 सेमी से भी कम होती है।
1. जलवायु नियंत्रण (Climatic Controls)
किसी भी क्षेत्र की जलवायु को नियंत्रित करने वाले छह (6) प्रमुख कारक होते हैं:
- अक्षांश (Latitude): पृथ्वी की गोलाई के कारण, भूमध्य रेखा (Equator) से ध्रुवों (Poles) की ओर जाने पर सूर्य की ऊर्जा कम होती जाती है। इसलिए विषुवत वृत्त से ध्रुवों की ओर तापमान घटता जाता है।
- तुंगता / ऊँचाई (Altitude): जैसे-जैसे हम पृथ्वी की सतह से ऊँचाई पर (पहाड़ों पर) जाते हैं, वायुमंडल की सघनता कम होती जाती है और तापमान घटता है। यही कारण है कि गर्मियों में भी पहाड़ (हिल स्टेशन जैसे शिमला, दार्जिलिंग) ठंडे रहते हैं।
- वायुदाब एवं पवन तंत्र (Pressure & Wind System): किसी क्षेत्र का वायुदाब वहाँ के तापमान और अक्षांश पर निर्भर करता है। यह तापमान और वर्षा के वितरण को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। हवाएँ हमेशा उच्च दाब (High Pressure) से निम्न दाब (Low Pressure) की ओर बहती हैं।
- समुद्र से दूरी (Distance from the Sea): समुद्र का जलवायु पर ‘समकारी प्रभाव’ (Moderating influence) पड़ता है। समुद्र के पास वाले इलाकों (जैसे मुंबई, चेन्नई) में न ज़्यादा गर्मी होती है न ज़्यादा सर्दी। लेकिन जैसे-जैसे समुद्र से दूरी बढ़ती है, यह प्रभाव कम होता जाता है और लोग विषम मौसम (गर्मियों में बहुत गर्मी, सर्दियों में बहुत सर्दी) महसूस करते हैं। इसे महाद्वीपीय अवस्था (Continentality) कहते हैं (जैसे- दिल्ली या कानपुर की जलवायु)।
- महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents): समुद्र तट की ओर बहने वाली हवाओं के साथ गर्म या ठंडी महासागरीय धाराएँ तटीय क्षेत्रों के तापमान को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए, कोई भी तटीय क्षेत्र जहाँ गर्म जलधारा बहती है, वह गर्म हो जाएगा यदि हवाएँ समुद्र से स्थल की ओर बह रही हों।
- उच्चावच लक्षण (Relief Features): ऊँचे पर्वत ठंडी या गर्म हवाओं को रोककर जलवायु को बदलते हैं। वे जलवाष्प से भरी हवाओं को रोककर बारिश भी कराते हैं (जैसे- पश्चिमी घाट का पवनमुखी ढाल)। पर्वतों के पीछे का हिस्सा (पवन-विमुख ढाल / Leeward side) सूखा रह जाता है, जिसे वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow area) कहते हैं (जैसे- दक्कन के पठार का भीतरी भाग)।
2. भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक
(क) अक्षांश (Latitude)
कर्क रेखा (Tropic of Cancer – 23°30′ N) देश के मध्य भाग (पश्चिम में कच्छ के रन से लेकर पूर्व में मिज़ोरम तक) से होकर गुज़रती है। देश का आधा दक्षिणी भाग ‘उष्ण कटिबंध’ (Tropical zone) में आता है और कर्क रेखा के उत्तर में स्थित बाकी उत्तरी भाग ‘उपोष्ण कटिबंध’ (Sub-tropical zone) में। इसलिए भारत में उष्ण कटिबंधीय और उपोष्ण कटिबंधीय—दोनों तरह की जलवायु की विशेषताएँ उपस्थित हैं।
(ख) ऊँचाई (Altitude)
भारत के उत्तर में महान हिमालय पर्वत है (जिसकी औसत ऊँचाई लगभग 6000 मी है) और दक्षिण में विशाल तटीय मैदान हैं (जिनकी अधिकतम ऊँचाई 30 मी है)। हिमालय पर्वत मध्य एशिया से आने वाली बर्फीली और जमा देने वाली ठंडी हवाओं (Freezing winds) को भारतीय उपमहाद्वीप में घुसने से रोकता है। इन्हीं पर्वतों के कारण भारत में मध्य एशिया की तुलना में सर्दियाँ काफी हल्की (कम कड़ाके की) होती हैं।
(ग) वायुदाब एवं पवनें (Pressure and Winds)
भारत की जलवायु और मौसम की अवस्थाएँ निम्नलिखित वायुमंडलीय अवस्थाओं से संचालित होती हैं:
🌪️ कोरिऑलिस बल (Coriolis Force)
पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने (Rotation) के कारण एक आभासी बल (Apparent force) पैदा होता है। इस बल के कारण पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दाईं ओर (Right) और दक्षिणी गोलार्द्ध में अपनी बाईं ओर (Left) मुड़ (विक्षेपित हो) जाती हैं। इसे ‘फेरल का नियम’ (Ferrel’s Law) भी कहा जाता है।
- व्यापारिक पवनें (Trade Winds): भारत उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनों वाले क्षेत्र में स्थित है। ये हवाएँ उत्तरी गोलार्द्ध के उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब (High pressure) से उत्पन्न होती हैं और दक्षिण की ओर विषुवतीय निम्न दाब (Low pressure) की ओर बहती हैं। चूँकि ये पवनें ज़मीन (स्थल) से पैदा होती हैं, इसलिए इनमें नमी (Moisture) बहुत कम होती है और ये भारत में बारिश नहीं करतीं। भारत को एक शुष्क देश होना चाहिए था, लेकिन गर्मियों में वायुदाब का पूरा सिस्टम पलट जाता है, जो ‘मानसून’ को जन्म देता है।
- जेट धाराएँ (Jet Streams): ये क्षोभमंडल (Troposphere) की अत्यधिक ऊँचाई (12,000 मी से ऊपर) पर एक संकरी पट्टी में बहने वाली बहुत तेज़ हवाएँ हैं। इनकी गति गर्मियों में 110 किमी/घंटा और सर्दियों में 184 किमी/घंटा होती है।
- उपोष्ण कटिबंधीय पश्चिमी जेट धारा (Sub-tropical westerly jet stream): यह सर्दियों में हिमालय के दक्षिण में बहती है। इसी के कारण भारत के उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भाग में पश्चिमी चक्रवाती विक्षोभ (Western Cyclonic Disturbances) आते हैं। ये विक्षोभ भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) में उत्पन्न होते हैं और सर्दियों में भारत में बारिश लाते हैं।
- उपोष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट धारा (Tropical easterly jet stream): यह गर्मियों में सूर्य की आभासी गति के साथ प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर (लगभग 14° N अक्षांश पर) बहती है।
3. भारतीय मानसून (The Indian Monsoon)
भारत की जलवायु पूरी तरह से मानसूनी पवनों द्वारा संचालित है। ऐतिहासिक काल में भारत आने वाले अरब नाविकों ने सबसे पहले मानसून की इस परिघटना को देखा था। पवनों की दिशा के पूर्ण रूप से उलट जाने (Reversal of wind system) से उन्हें अपने पाल वाले जहाज़ चलाने में मदद मिलती थी, इसलिए उन्होंने इसे ‘मानसून’ नाम दिया।
मानसून का तंत्र (Mechanism of Monsoon):
मानसून के उत्पन्न होने और इसके प्रभाव को समझने के लिए निम्नलिखित वैज्ञानिक तथ्य बहुत महत्त्वपूर्ण हैं:
- स्थल और जल का गर्म व ठंडा होना: ज़मीन पानी की तुलना में बहुत जल्दी गर्म और जल्दी ठंडी होती है। गर्मियों में भारत के विशाल भूभाग पर तीव्र निम्न दाब (Low Pressure) बन जाता है, जबकि इसके चारों ओर समुद्र के ऊपर उच्च दाब (High Pressure) रहता है। (हवाएँ हमेशा High से Low Pressure की ओर बहती हैं, इसलिए समुद्री हवाएँ ज़मीन की ओर दौड़ती हैं)।
- अंतः उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ): यह भूमध्य रेखा (विषुवत वृत्त) के पास 5°N और 5°S के बीच एक चौड़ा गर्त (trough) है जहाँ उत्तर-पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक हवाएँ आपस में मिलती हैं। गर्मियों में यह खिसक कर उत्तर में गंगा के मैदान के ऊपर आ जाता है (इसे ‘मानसूनी गर्त’ भी कहते हैं)। यह मानसून को उत्तर भारत तक खींचता है।
- हिंद महासागर में मेडागास्कर (Madagascar) के पूर्व में (लगभग 20°S अक्षांश पर) एक बहुत शक्तिशाली उच्च दाब (High Pressure) वाला क्षेत्र बनता है। यह उच्च दाब क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम मानसून की दिशा और शक्ति को प्रभावित करता है।
- गर्मियों में तिब्बत का पठार (Tibetan Plateau) सूरज की गर्मी से बहुत अधिक गर्म हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप हवाएँ ऊपर उठती हैं और पठार के ऊपर समुद्र तल से 9 किमी की ऊँचाई पर तेज़ ऊर्ध्वाधर वायु-धाराएँ और तीव्र निम्न दाब बनता है।
- पश्चिमी और पूर्वी जेट धाराओं की गति (Movement of Jet Streams): गर्मियों में हिमालय के उत्तर में पश्चिमी जेट धारा का खिसकना और भारतीय प्रायद्वीप पर उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट धारा का आना मानसून को आकर्षित करता है।
🌊 एल नीनो और दक्षिणी दोलन (ENSO – El Nino Southern Oscillation)
- दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation / SO): आमतौर पर जब उष्णकटिबंधीय पूर्वी दक्षिण प्रशांत महासागर (पेरू तट) पर उच्च दाब होता है, तब हिंद महासागर में निम्न दाब होता है। लेकिन कुछ विशेष वर्षों में यह स्थिति उलट जाती है। प्रशांत महासागर पर निम्न दाब बन जाता है। वायुदाब की इस उलटी स्थिति (Reversal of pressure conditions) को ही ‘दक्षिणी दोलन’ (SO) कहते हैं। इसकी तीव्रता की गणना डार्विन (उत्तरी ऑस्ट्रेलिया) और ताहिती (प्रशांत महासागर) के बीच वायुदाब के अंतर से की जाती है। यदि अंतर ऋणात्मक (Negative) है, तो मानसून कमज़ोर होगा।
- एल नीनो (El Nino): यह एक गर्म समुद्री जलधारा है जो पेरू (दक्षिण अमेरिका) के तट पर ठंडी ‘हम्बोल्ट धारा’ की जगह हर 2 से 5 साल में बहने लगती है। ‘एल नीनो’ एक स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है ‘बच्चा’ (Child / Baby Christ) क्योंकि यह धारा क्रिसमस के समय बहना शुरू होती है।
- ENSO का भारत पर प्रभाव: एल नीनो के कारण समुद्र की सतह का तापमान बढ़ जाता है और व्यापारिक हवाएँ कमज़ोर पड़ जाती हैं। जब भी एल नीनो आता है, तो भारत में मानसून कमज़ोर पड़ जाता है, बारिश कम होती है और सूखे (Drought) की गंभीर स्थिति पैदा हो जाती है।
4. ऋतुएँ (The Seasons)
मानसूनी जलवायु की एक स्पष्ट विशेषता है कि इसमें मौसम की अवस्थाओं में बहुत साफ और स्पष्ट बदलाव होता है। भारत के आंतरिक भागों में यह बदलाव बहुत अधिक महसूस किया जाता है (तटीय क्षेत्रों में कम)। भारत में मुख्य रूप से चार (4) ऋतुएँ पाई जाती हैं:
(क) शीत ऋतु (The Cold Weather Season)
- समय: उत्तर भारत में यह मध्य नवंबर से शुरू होकर फरवरी तक रहता है। (दिसंबर और जनवरी सबसे ठंडे महीने होते हैं)।
- तापमान: दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ने पर तापमान घटता जाता है। (चेन्नई के पूर्वी तट पर तापमान 24°-25°C रहता है, जबकि उत्तर भारत के मैदानों में यह 10°-15°C तक गिर जाता है)। हिमालय में भारी बर्फबारी होती है और उत्तर में पाला (Frost) पड़ता है।
- हवाएँ और वर्षा: इस समय देश में उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें (North-East Trade Winds) चलती हैं। ये स्थल (ज़मीन) से समुद्र की ओर बहती हैं, इसलिए पूरा देश शुष्क (Dry) रहता है। लेकिन इन हवाओं का कुछ हिस्सा बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुज़रते समय नमी उठा लेता है और तमिलनाडु के तट (कोरोमंडल तट) पर सर्दियों में बारिश करता है।
- महावट (Mahawat): भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) से आने वाले ‘पश्चिमी चक्रवाती विक्षोभों’ के कारण उत्तर-पश्चिम भारत (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली) के मैदानों में सर्दियों में हल्की बारिश होती है और पहाड़ों पर हिमपात होता है। इसे स्थानीय भाषा में ‘महावट’ कहते हैं। यद्यपि इसकी मात्रा कम होती है, फिर भी यह रबी की फसल (खासकर गेहूं) के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण और लाभदायक होती है।
(ख) ग्रीष्म ऋतु (The Hot Weather Season)
- समय: मार्च से मई तक। पृथ्वी के परिक्रमण के कारण सूर्य उत्तर की ओर खिसकता है (Northward movement of the sun), जिससे गर्मी बढ़ती है।
- तापमान: मार्च में दक्कन के पठार का तापमान 38°C, अप्रैल में गुजरात और मध्य प्रदेश का 42°C, और मई में उत्तर-पश्चिम भारत (राजस्थान आदि) का तापमान 45°C तक पहुँच जाता है। प्रायद्वीपीय भारत में समुद्री प्रभाव के कारण तापमान कम रहता है।
- लू (Loo): ये तेज़, धूल भरी, गर्म और शुष्क हवाएँ हैं जो मई और जून के महीने में दिन के समय उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत में चलती हैं। इनके सीधे प्रभाव में आने से लोगों की मौत (Heatstroke/लू लगना) भी हो सकती है। मई के दौरान उत्तर भारत में धूल भरी आंधियां (Dust storms) आम बात हैं जो तापमान को कम करके थोड़ी राहत देती हैं।
- काल बैसाखी (Kaal Baisakhi): मई के महीने में पश्चिम बंगाल में गरजने वाली तेज़ आंधियों के साथ मूसलाधार बारिश और ओले गिरते हैं। चूँकि यह वैशाख के महीने में आती है, इसलिए इसे ‘काल बैसाखी’ (विनाश की हवा) कहा जाता है।
- आम्र वर्षा (Mango Showers): ग्रीष्म ऋतु के अंत में केरल और कर्नाटक के तटीय इलाकों में मानसून से पहले (Pre-monsoon) बारिश होती है। इसके कारण आम (Mangoes) जल्दी पक जाते हैं, इसलिए इसे प्यार से ‘आम्र वर्षा’ कहा जाता है।
(ग) वर्षा ऋतु या आगे बढ़ता हुआ मानसून (The Advancing Monsoon)
- समय: जून से मध्य सितंबर तक।
- शुरुआत (Onset): जून की शुरुआत में उत्तरी मैदानों में तापमान बढ़ने से निम्न दाब (Low Pressure) बहुत तेज़ हो जाता है। यह दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवनों को अपनी ओर खींचता है। ये हवाएँ भूमध्य रेखा पार करके दक्षिण-पश्चिमी दिशा में भारत में प्रवेश करती हैं। चूँकि ये गर्म हिंद महासागर को पार करके आती हैं, इसलिए अपने साथ बहुत सारी नमी (Moisture) लाती हैं। इन्हें दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon) कहते हैं। इनकी गति लगभग 30 किमी प्रति घंटा होती है।
- मानसून का फटना (Burst of the Monsoon): मानसून के आते ही सामान्य वर्षा अचानक बढ़ जाती है और कई दिनों तक लगातार होती रहती है। इसे मानसून का ‘फटना’ या ‘प्रस्फोट’ कहते हैं। 1 जून तक मानसून केरल के दक्षिणी सिरे पर पहुँच जाता है।
- दो शाखाएँ: भारतीय प्रायद्वीप की आकृति के कारण मानसून दो शाखाओं में बँट जाता है:
- अरब सागर शाखा: यह पश्चिमी घाट से टकराकर पश्चिमी तट (मुंबई) पर लगभग 10 जून तक भारी बारिश करती है, और फिर सौराष्ट्र-कच्छ होते हुए मध्य भारत की ओर बढ़ती है।
- बंगाल की खाड़ी शाखा: यह तेज़ी से आगे बढ़ती है और जून के प्रथम सप्ताह में असम पहुँच जाती है। ऊँचे पर्वतों के कारण यह पश्चिम की ओर गंगा के मैदान की तरफ मुड़ जाती है। (दिल्ली में बारिश 29 जून के आसपास इसी शाखा से होती है)। मध्य जुलाई तक मानसून पूरे भारत को कवर कर लेता है।
- मासिनराम (Mawsynram): मेघालय की खासी पहाड़ियों के दक्षिणी भाग में स्थित मासिनराम विश्व में सबसे अधिक औसत वर्षा (Highest Rainfall in the world) प्राप्त करने वाला स्थान है। यह अपनी ‘स्टैलेग्माइट एवं स्टैलेक्टाइट’ (Stalagmite and Stalactite) गुफाओं के लिए भी प्रसिद्ध है।
- मानसून में विराम (Breaks in Monsoon): मानसून में लगातार बारिश नहीं होती। इसमें कुछ दिन बारिश होती है (Wet spells) और फिर कुछ दिन बिल्कुल सूखे (Dry spells) रहते हैं। इसे मानसून का ‘विराम’ कहते हैं। यह मानसूनी गर्त (Monsoon trough) के अक्ष (Axis) के उत्तर-दक्षिण खिसकने के कारण होता है। जब गर्त हिमालय के करीब जाता है, तो मैदानों में सूखा पड़ता है और पहाड़ों पर भारी बारिश होती है।
(घ) लौटता हुआ मानसून / शरद् ऋतु (The Retreating Monsoon / Transition Season)
- समय: अक्टूबर और नवंबर का महीना। यह गर्म वर्षा ऋतु से शीत ऋतु में परिवर्तन का काल है।
- प्रक्रिया: सूर्य के दक्षिण की ओर जाने (Autumn Equinox) के कारण उत्तरी भारत के मैदानों में निम्न दाब कमज़ोर होकर उच्च दाब में बदल जाता है। दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाएँ कमज़ोर पड़ जाती हैं और पीछे हटने लगती हैं। अक्टूबर की शुरुआत तक मानसून उत्तरी मैदानों से पूरी तरह वापस लौट जाता है।
- क्वार की उमस (October Heat): मानसून लौटने से आसमान साफ हो जाता है और दिन का तापमान ऊँचा रहता है। लेकिन ज़मीन अभी भी गीली होती है। उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता (Humidity) के कारण दिन का मौसम बहुत कष्टकारी (Oppressive) और चिपचिपा हो जाता है। इसे ही ‘अक्टूबर हीट’ या क्वार की उमस कहा जाता है। अक्टूबर के उत्तरार्ध में तापमान तेज़ी से गिरने लगता है।
- उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones): नवंबर के शुरुआत में निम्न दाब का क्षेत्र उत्तर-पश्चिमी भारत से हटकर बंगाल की खाड़ी के ऊपर चला जाता है। इसके कारण यहाँ भयानक चक्रवाती अवदाब पैदा होते हैं जो भारत के पूर्वी तट पर टकराते हैं। ये चक्रवात गोदावरी, कृष्णा, और कावेरी नदियों के घने बसे डेल्टा प्रदेशों पर अक्सर आते हैं। इन चक्रवातों से जान-माल का भारी विनाश होता है। कभी-कभी ये चक्रवात ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश तक पहुँच जाते हैं। कोरोमंडल तट पर ज़्यादातर बारिश इन्हीं चक्रवातों से होती है।
5. वर्षा का वितरण (Distribution of Rainfall)
भारत में बारिश का वितरण बहुत असमान (Uneven) है:
- अत्यधिक वर्षा (400 सेमी से अधिक): पश्चिमी तट (पश्चिमी घाट का पवनमुखी हिस्सा) और उत्तर-पूर्वी भारत (मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश)।
- न्यूनतम वर्षा (60 सेमी से कम): पश्चिमी राजस्थान, उससे सटे गुजरात, हरियाणा और पंजाब के कुछ हिस्से। इसके अलावा दक्कन के पठार का भीतरी भाग (जो पश्चिमी घाट के वृष्टि-छाया क्षेत्र में आता है) और जम्मू-कश्मीर का लेह (Leh) क्षेत्र भी शुष्क (सूखा) रहता है।
- शेष भारत में मध्यम वर्षा (100-200 सेमी) होती है। भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में बाढ़ (Floods) की समस्या रहती है, जबकि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में हर साल सूखे (Drought) की आशंका बनी रहती है।
🌟 निष्कर्ष: मानसून एकता का परिचायक (Monsoon as a Unifying Bond)
हिमालय भारत को ठंडी बर्फीली हवाओं से बचाता है (जिससे उत्तर भारत गर्म रहता है) और पश्चिमी घाट तथा पूर्वी तट वर्षा लाते हैं। लेकिन इस भारी भौगोलिक और जलवायुगत विविधता के बावजूद, पूरे भारत को जो चीज़ एक सूत्र में बांधती है, वह है—मानसून (The Monsoon)।
भारत का पूरा भूदृश्य (Landscape), उसके जीव-जंतु और वनस्पति, उसका कृषि-चक्र, और आम लोगों का पूरा जीवन तथा उनके त्योहार (Festivals) इसी मानसून के चारों ओर घूमते हैं। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक, पूरे भारत के लोग हर साल बेसब्री से मानसून के आने का इंतज़ार करते हैं। मानसून की नदियाँ हमें सिंचाई और पीने के लिए पानी देती हैं और पूरे देश को एक जल-इकाई (Single water unit) के रूप में जोड़ती हैं। इसलिए मानसून को भारत में ‘एकता का परिचायक’ माना जाता है।
कक्षा 9 भूगोल अध्याय 5
प्राकृतिक वनस्पति तथा वन्य प्राणी
(Natural Vegetation and Wildlife)
📌 अध्याय का परिचय एवं महत्त्वपूर्ण शब्दावली
हमारा देश भारत विश्व के मुख्य 12 जैव-विविधता (Mega Biodiversity) वाले देशों में से एक है। विशाल भौगोलिक क्षेत्रफल के कारण यहाँ जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की असीम विविधता है। लगभग 47,000 पादप (Plants) प्रजातियों के साथ भारत का विश्व में 10वाँ और एशिया में चौथा स्थान है। भारत में लगभग 15,000 पुष्पीय पौधे (Flowering plants) हैं जो कि विश्व के पुष्पीय पौधों का 6% है। इसके अलावा देश में बहुत से बिना फूल वाले पौधे (जैसे—फर्न, शैवाल/Algae, और कवक/Fungi) भी पाए जाते हैं। भारत में लगभग 90,000 जानवरों की प्रजातियाँ और विभिन्न प्रकार की समुद्री व मीठे पानी की मछलियाँ पाई जाती हैं।
- प्राकृतिक वनस्पति (Natural Vegetation): वनस्पति का वह भाग जो मनुष्य की सहायता के बिना अपने आप पैदा होता है और लंबे समय तक उस पर मानवीय प्रभाव नहीं पड़ता। इसे अक्षत वनस्पति (Virgin Vegetation) भी कहते हैं। (जो फसलें, फल और बागान मनुष्य उगाते हैं, वे वनस्पति तो हैं पर ‘प्राकृतिक’ नहीं)।
- देशज (Endemic) और विदेशज (Exotic): जो वनस्पति मूल रूप से भारतीय है, उसे ‘देशज’ कहते हैं। जो पौधे भारत के बाहर से लाए गए हैं, उन्हें ‘विदेशज’ कहा जाता है।
- वनस्पति जात (Flora) और प्राणि जात (Fauna): किसी विशेष क्षेत्र या समय के पेड़-पौधों को ‘वनस्पति जात’ (Flora) और जानवरों की प्रजातियों को ‘प्राणि जात’ (Fauna) कहा जाता है।
1. वनस्पति तथा वन्य प्राणियों में विविधता के कारण
भारत में इतनी अधिक जैव-विविधता (Flora and Fauna) क्यों है? इसके लिए निम्नलिखित प्राकृतिक कारक (Factors) पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार हैं:
(A) धरातल (Relief)
- भूभाग (Land): भूमि का स्वभाव वनस्पति पर बहुत गहरा प्रभाव डालता है। उपजाऊ समतल भूमि पर प्रायः कृषि (Agriculture) की जाती है, जबकि ऊबड़-खाबड़ और असमान भूभाग पर जंगल (Forests) और घास के मैदान (Grasslands) होते हैं, जो विभिन्न वन्य प्राणियों को आश्रय देते हैं।
- मृदा (Soil): अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग प्रकार की मिट्टी पाई जाती है जो विविध प्रकार की वनस्पति का आधार है।
- रेतीली मिट्टी (मरुस्थल) में कैक्टस और कंटीली झाड़ियाँ उगती हैं क्योंकि इनमें पानी रोकने की क्षमता कम होती है।
- नदियों के डेल्टा क्षेत्र की गीली और दलदली मिट्टी में मैंग्रोव वन (Mangroves) उगते हैं।
- पर्वतों की ढलानों (जहाँ मिट्टी की परत गहरी है) पर शंक्वाकार (Coniferous) पेड़ उगते हैं।
(B) जलवायु (Climate)
- तापमान (Temperature): वनस्पति की विविधता और विशेषता तापमान और हवा की नमी पर भी निर्भर करती है। हिमालय और प्रायद्वीपीय पहाड़ियों पर 915 मीटर की ऊँचाई के ऊपर जैसे-जैसे तापमान गिरता है, वनस्पति के पनपने की दर कम हो जाती है। तापमान के आधार पर वनस्पति उष्ण कटिबंधीय (Tropical) से बदलकर उपोष्ण (Sub-tropical), शीतोष्ण (Temperate) और अल्पाइन (Alpine) हो जाती है।
तापमान और वनस्पति क्षेत्र (औसत वार्षिक तापमान):
• उष्ण (Tropical): 24°C से अधिक
• उपोष्ण (Sub-tropical): 17°C से 24°C
• शीतोष्ण (Temperate): 7°C से 17°C
• अल्पाइन (Alpine): 7°C से कम - सूर्य का प्रकाश (Photoperiod / Sunlight): किसी भी स्थान पर सूर्य के प्रकाश का समय उस स्थान के अक्षांश (Latitude), ऊँचाई (Altitude) और ऋतु (Season) पर निर्भर करता है। प्रकाश अधिक समय तक मिलने के कारण गर्मियों में पेड़ बहुत तेज़ी से बढ़ते हैं। (यही कारण है कि हिमालय के दक्षिणी ढलानों पर उत्तरी ढलानों की अपेक्षा अधिक सघन वनस्पति है)।
- वर्षण (Precipitation): भारत में लगभग सारी वर्षा आगे बढ़ते हुए दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून से सितंबर) और पीछे हटते उत्तर-पूर्वी मानसून से होती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा वाले क्षेत्रों की अपेक्षा बहुत सघन (घने) वन पाए जाते हैं। (यही कारण है कि पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलान पर भारी वर्षा के कारण घने जंगल हैं, जबकि वृष्टि-छाया वाले पूर्वी ढलान पर नहीं)।
🌿 पारिस्थितिक तंत्र और जीवोम (Ecosystem and Biome)
किसी भी क्षेत्र के पादप (पौधे) और प्राणी (जानवर) अपने भौतिक पर्यावरण से आपस में जुड़े होते हैं और एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। इसे ही पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) कहते हैं। मनुष्य भी इस तंत्र का एक बहुत महत्त्वपूर्ण हिस्सा है (हालाँकि मनुष्य अपने लालच में प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन करके इसका संतुलन बिगाड़ देता है)।
धरातल पर एक विशिष्ट प्रकार की वनस्पति या प्राणी जीवन वाले बहुत बड़े पारिस्थितिक तंत्र को ‘जीवोम’ (Biome) कहा जाता है। जीवोम की पहचान वहाँ के पेड़-पौधों (Flora) के आधार पर की जाती है।
2. वनस्पतियों के प्रकार (Types of Vegetation)
भारत की विशाल भौगोलिक विविधता के कारण यहाँ मुख्य रूप से पाँच (5) प्रकार की प्राकृतिक वनस्पतियाँ पाई जाती हैं:
(1) उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests)
- क्षेत्र: ये वन 200 सेमी से अधिक भारी वर्षा और छोटे शुष्क ऋतु वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। (पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलान, लक्षद्वीप, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, असम के ऊपरी भाग और तमिलनाडु के कुछ तट)।
- विशेषताएँ: यहाँ के पेड़ 60 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई तक बढ़ते हैं। यहाँ वितान (Canopy), झाड़ियाँ और लताएँ (Creepers) एक बहु-स्तरीय (multi-layered) संरचना बनाती हैं, जिससे सूरज की रोशनी ज़मीन तक नहीं पहुँच पाती। चूँकि यहाँ साल भर गर्मी और नमी रहती है, इसलिए पेड़ों के पत्ते झड़ने का कोई एक निश्चित समय नहीं होता। अतः ये जंगल साल भर हरे-भरे (Evergreen) दिखाई देते हैं।
- प्रमुख वृक्ष: आबनूस (Ebony), महोगनी (Mahogany), रोज़वुड (Rosewood), रबर (Rubber) और सिनकोना (Cinchona – जिससे मलेरिया की दवा बनती है)।
- वन्य प्राणी: हाथी, बंदर, लैमूर और हिरण। असम और पश्चिम बंगाल के दलदली इलाकों में एक सींग वाला गैंडा (One-horned Rhino) पाया जाता है। कई प्रकार के पक्षी, चमगादड़, बिच्छू और स्लोथ (Sloth) भी यहाँ खूब मिलते हैं।
(2) उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन (Tropical Deciduous Forests)
ये भारत में सबसे बड़े क्षेत्र में फैले हुए वन हैं। इन्हें ‘मानसूनी वन’ भी कहा जाता है। ये उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ 70 सेमी से 200 सेमी तक बारिश होती है। शुष्क ग्रीष्म ऋतु में पानी बचाने के लिए (वाष्पोत्सर्जन रोकने के लिए) ये पेड़ 6 से 8 सप्ताह के लिए अपने पत्ते पूरी तरह गिरा देते हैं (Shed their leaves)। जल की उपलब्धता के आधार पर इन्हें दो भागों में बाँटा गया है:
- आर्द्र (Moist) पर्णपाती वन: (100-200 सेमी वर्षा वाले क्षेत्र)। ये देश के पूर्वी भागों, उत्तर-पूर्वी राज्यों, हिमालय के गिरिपाद (foothills), झारखंड, पश्चिमी ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिमी घाट के पूर्वी ढलानों पर पाए जाते हैं।
पेड़: सागौन (Teak) इस वन की सबसे प्रमुख और बहुमूल्य प्रजाति है। इसके अलावा बांस, साल, शीशम, चंदन (Sandalwood), खैर, कुसुम, अर्जुन और शहतूत (Mulberry) के व्यापारिक और इमारती लकड़ी वाले पेड़ मिलते हैं। - शुष्क (Dry) पर्णपाती वन: (70-100 सेमी वर्षा वाले क्षेत्र)। ये प्रायद्वीपीय पठार के अधिक वर्षा वाले भागों, और उत्तर प्रदेश व बिहार के मैदानों में पाए जाते हैं। यहाँ खुले जंगल होते हैं जहाँ चारों ओर घास उगती है।
पेड़: सागौन, साल, पीपल और नीम। इन क्षेत्रों का बहुत बड़ा हिस्सा अब खेती और पशुचारण के लिए साफ कर दिया गया है। - वन्य प्राणी: सिंह, शेर, जंगली सूअर, हिरण और हाथी। पक्षियों, छिपकलियों, साँपों और कछुओं की भी कई प्रजातियाँ यहाँ बहुतायत में पाई जाती हैं।
(3) उष्ण कटिबंधीय कंटीले वन तथा झाड़ियाँ (Thorn Forests and Scrubs)
- क्षेत्र: जिन क्षेत्रों में 70 सेमी से कम वर्षा होती है (देश के उत्तर-पश्चिमी भाग—गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के अर्ध-शुष्क क्षेत्र)।
- विशेषताएँ: पानी की भारी कमी से बचने के लिए इन पेड़ों की जड़ें बहुत लंबी होती हैं और पानी की तलाश में अरीय रूप से (चारों ओर) फैली हुई होती हैं। इनकी पत्तियाँ बहुत छोटी और मोटी (कंटीली) होती हैं ताकि वाष्पीकरण (Evaporation) कम से कम हो। तने रसीले (Succulent) होते हैं जो अपने अंदर पानी जमा रखते हैं। पेड़ बिखरे हुए होते हैं।
- प्रमुख वृक्ष: बबूल (Acacia), खजूर (Palm/Date), यूफोर्बिया (Euphorbia) और कैक्टस (नागफनी)।
- वन्य प्राणी: चूहे, खरगोश, लोमड़ी, भेड़िये, बाघ, सिंह, जंगली गधे (Wild ass – विशेषकर कच्छ के रन में), घोड़े और ऊंट (Camels)।
(4) पर्वतीय वन (Montane Forests)
पर्वतीय क्षेत्रों में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान तेज़ी से कम होता है, जिसके कारण प्राकृतिक वनस्पति में बिल्कुल वैसा ही बदलाव आता है जैसा हम उष्ण कटिबंध से टुंड्रा (ध्रुवीय) प्रदेश की ओर जाते हुए देखते हैं।
- 1000 मी – 2000 मी (आर्द्र शीतोष्ण वन): यहाँ चौड़ी पत्ती वाले ओक (Oak) और चेस्टनट (Chestnut) के पेड़ों की प्रधानता होती है। ये सदाबहार होते हैं।
- 1500 मी – 3000 मी (शंकुधारी वन / Coniferous): यहाँ नुकीली पत्ती वाले पेड़ मिलते हैं जैसे—चीड़ (Pine), देवदार (Deodar), सिल्वर फर (Silver fir), स्प्रूस और सीडर। ये वन मुख्य रूप से हिमालय के दक्षिणी ढलानों (दक्षिण और उत्तर-पूर्वी भारत के अधिक ऊँचाई वाले भागों) पर पाए जाते हैं।
- 3600 मी से अधिक (अल्पाइन वनस्पति): यहाँ सिल्वर फर, जुनिपर, पाइन और बर्च (Birch) के पेड़ मिलते हैं। हिमरेखा (Snowline) के नज़दीक पहुँचते-पहुँचते ये पेड़ छोटे होकर झाड़ियों में बदल जाते हैं और अंत में अल्पाइन घास के मैदानों (Alpine Grasslands) में विलीन हो जाते हैं।
(इन विस्तृत घास के मैदानों का उपयोग गुज्जर और बकरवाल जैसे घुमंतू चरवाहों द्वारा ऋतु-प्रवास और पशुचारण के लिए किया जाता है।) - टुंड्रा वनस्पति: और अधिक ऊँचाई पर (जहाँ साल भर बर्फ जमी रहती है) केवल मॉस (Moss) और लाइकेन (Lichens) ही ज़िंदा रह पाते हैं। यह टुंड्रा वनस्पति का हिस्सा है।
वन्य प्राणी: कश्मीरी महामृग (Stag), चित्रा हिरण, जंगली भेड़, हिम तेंदुआ (Snow leopard), याक (Yak), तिब्बती बारहसिंगा, दुर्लभ लाल पांडा (Red Panda), और घने बालों वाली भेड़ व बकरियाँ।
(5) मैंग्रोव वन (Mangrove Forests)
- क्षेत्र: ये वन तटवर्ती क्षेत्रों में जहाँ ज्वार-भाटा (Tides) आते हैं, कीचड़ और गाद (Mud and Silt) में विकसित होते हैं। ये पूर्वी तट पर गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों के डेल्टा भाग में भारी मात्रा में पाए जाते हैं।
- विशेषताएँ: मैंग्रोव एक विशेष प्रकार की वनस्पति है जिसकी जड़ें पानी (विशेषकर खारे पानी/Saltwater) में डूबी रहती हैं। यह तटीय कटाव को रोकता है और सुनामी से बचाता है।
- प्रमुख वृक्ष: गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा (सुंदरवन) में ‘सुंदरी’ (Sundari) नामक वृक्ष पाए जाते हैं जिनसे नाव बनाने के लिए बहुत मज़बूत लकड़ी मिलती है। इसके अलावा ताड़ (Palm), नारियल (Coconut), और क्योड़ा (Keora) भी मिलते हैं।
- वन्य प्राणी: इस क्षेत्र का सबसे प्रसिद्ध और राजसी जानवर रॉयल बंगाल टाइगर (Royal Bengal Tiger) है। कछुए, मगरमच्छ, घड़ियाल (Gharials) और कई तरह के ज़हरीले साँप भी इन दलदली जंगलों में मिलते हैं।
💊 भारत के औषधीय पादप (Medicinal Plants of India)
भारत प्राचीन काल से ही अपनी जड़ी-बूटियों मसालों और आयुर्वेद (Ayurveda) के लिए विख्यात है। आयुर्वेद में लगभग 2000 पादपों का वर्णन है और कम से कम 500 तो निरंतर उपयोग में आते हैं। विश्व संरक्षण संघ (IUCN) ने कई पौधों को संकटग्रस्त सूची में रखा है। कुछ प्रमुख औषधीय पौधे हैं:
- सर्पगंधा: यह रक्तचाप (Blood Pressure) के निदान के लिए प्रयोग होता है और केवल भारत में पाया जाता है।
- जामुन: इसके बीजों का पाउडर मधुमेह (Diabetes) को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसके पके हुए फल से सिरका बनता है जो वात रोग में लाभदायक है।
- अर्जुन: ताज़े पत्तों का रस कान दर्द और रक्तचाप (BP) को नियमित करता है।
- कचनार (Kachnar): फोड़े (ulcer) और दमा (Asthma) की बीमारी के लिए प्रयोग होता है।
- नीम: यह एक बेहतरीन जैविक और जीवाणु-प्रतिरोधक (Antibacterial) पौधा है।
- तुलसी: ज़ुकाम और खाँसी (Cold and Cough) की बेहतरीन दवा है।
- बबूल: इसके पत्ते आँख की फुंसी के लिए लाभदायक हैं और इसका गोंद शारीरिक शक्ति के लिए टॉनिक के रूप में उपयोग होता है।
3. वन्य प्राणी (Wildlife / Fauna)
वनस्पतियों की तरह भारत वन्य प्राणियों (जानवरों) में भी अत्यंत धनी है। भारत में जीवों की लगभग 90,000 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यहाँ पक्षियों की 2000 प्रजातियाँ (विश्व का 13%) और मछलियों की 2546 प्रजातियाँ (विश्व का 12%) हैं। भारत में विश्व के 5 से 8 प्रतिशत तक उभयचर (Amphibians), सरीसृप (Reptiles) तथा स्तनधारी (Mammals) जानवर भी पाए जाते हैं।
- हाथी (Elephants): यह स्तनधारियों (Mammals) में सबसे राजसी और विशाल जानवर है। यह असम, कर्नाटक और केरल के गर्म तथा आर्द्र (Wet) जंगलों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
- एक सींग वाला गैंडा (One-horned Rhinoceros): यह असम और पश्चिम बंगाल के दलदली (Swampy) और जंगली क्षेत्रों में रहता है।
- जंगली गधे और ऊंट: ये क्रमशः कच्छ के रन (गुजरात) और थार के मरुस्थल (राजस्थान) के शुष्क इलाकों में पाए जाते हैं।
- शेर और बाघ (Lions & Tigers): भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहाँ प्राकृतिक रूप से शेर और बाघ दोनों पाए जाते हैं।
- भारतीय शेरों (Asiatic Lions) का प्राकृतिक वास गुजरात का गिर जंगल (Gir Forest) है।
- बाघ (Tigers) मध्य प्रदेश, झारखंड के वनों, और पश्चिम बंगाल के सुंदरवन तथा हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। (बिल्ली प्रजाति के सदस्यों में तेंदुआ / Leopard भी शामिल है जो शिकारियों में मुख्य है)।
- मगरमच्छ और घड़ियाल: नदियों और झीलों में मगरमच्छ पाए जाते हैं। घड़ियाल (Gharial) मगरमच्छ की ऐसी विशिष्ट प्रजाति है जो विश्व में केवल भारत में ही पाई जाती है।
🦩 प्रवासी पक्षी (Migratory Birds)
सर्दियों के मौसम में भारत के कुछ आर्द्रभूमि (Wetlands) प्रवासी पक्षियों के लिए बहुत लोकप्रिय हो जाते हैं।
- साइबेरियन सारस (Siberian Crane): ये पक्षी कड़ाके की ठंड से बचने के लिए सुदूर साइबेरिया से भारी संख्या में भारत आते हैं।
- कच्छ का रन (Rann of Kutch): जहाँ रेगिस्तान समुद्र से मिलता है, वहाँ लाल और गुलाबी पंखों वाले हज़ारों राजहंस (Flamingos) आते हैं। वे खारे कीचड़ के ढेर बनाकर उनमें अपने घोंसले बनाते हैं और बच्चों को पालते हैं। यह भारत के अद्भुत नज़ारों में से एक है।
4. संरक्षण की आवश्यकता (Need for Conservation)
प्रकृति ने हमें जो इतनी बड़ी संपदा दी है, मनुष्य के अत्यधिक लालच (Greed) के कारण उसे भारी खतरा पैदा हो गया है।
- मनुष्यों द्वारा अपनी औद्योगिक और कृषि माँगों के लिए पेड़ों और जानवरों का अत्यधिक दोहन किया गया है। लालची व्यापारियों द्वारा व्यावसायिक लाभ के लिए शिकार (Poaching) किया जा रहा है।
- रासायनिक और औद्योगिक कचरे (Pollution) का जमाव, तेज़ाबी वर्षा (Acid rain), और विदेशी प्रजातियों (Alien species) के प्रवेश से पारिस्थितिक संतुलन (Ecological balance) पूरी तरह बिगड़ गया है।
- भारत की लगभग 1300 पादप प्रजातियाँ संकट में हैं और 20 प्रजातियाँ पूरी तरह नष्ट (Extinct) हो चुकी हैं। वन्य जीवों की भी कई प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं।
🛡️ सरकार द्वारा उठाए गए कदम (Government Initiatives)
देश की प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवन को बचाने के लिए भारत सरकार ने कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं:
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972: जानवरों के अवैध शिकार और व्यापार को रोकने के लिए भारत सरकार ने 1972 में ‘वन्यजीव संरक्षण अधिनियम’ (Wildlife Protection Act) लागू किया, जो एक बहुत ही सख्त कानूनी ढांचा है।
- जीवमंडल निचय (Biosphere Reserves): देश में 18 जीवमंडल निचय स्थापित किए गए हैं ताकि जीवों और वनस्पतियों को उनके प्राकृतिक परिवेश में बचाया जा सके।
(इनमें से 12 विश्व के ‘जीवमंडल निचय नेटवर्क’ में शामिल हैं: सुंदरवन, नंदा देवी, मन्नार की खाड़ी, नीलगिरि, नोकरेक, ग्रेट निकोबार, सिमलीपाल, पचमढ़ी, अचनकमर-अमरकंटक, अगस्त्यमलाई, कंचनजंगा, और पन्ना। अन्य 6 हैं: कच्छ, कोल्ड डेजर्ट, शेषाचलम, देहांग-देबांग, डिब्रू-सैखोवा, और मानस।) - वित्तीय और तकनीकी सहायता: 1992 से सरकार कई वनस्पति उद्यानों (Botanical Gardens) को आर्थिक और तकनीकी सहायता दे रही है।
- विशेष प्रोजेक्ट (Special Projects): बाघों को बचाने के लिए ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ (Project Tiger – 1973), गैंडों के लिए ‘प्रोजेक्ट राइनो’, और ‘प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ (गोंडावण) जैसी कई ईको-विकास (Eco-development) परियोजनाएँ चलाई जा रही हैं।
- राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य: पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा के लिए भारत में 103 से अधिक नेशनल पार्क (National Parks), 535 वन्य प्राणी अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries) और कई प्राणी उद्यान (Zoos) बनाए गए हैं।
🌟 निष्कर्ष (Conclusion)
हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र (Natural Ecosystem) का संतुलन हमारे अपने अस्तित्व (Survival) के लिए बहुत ज़रूरी है। यह तभी संभव है जब हम अपने स्वार्थ और लालच को छोड़कर अपने प्राकृतिक पर्यावरण का अंधाधुंध विनाश (Indiscriminate destruction) तुरंत रोक दें। पेड़-पौधे और जानवर इस पृथ्वी पर हमारे साथी हैं, और उनका संरक्षण हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है।
कक्षा 9 भूगोल अध्याय 6
जनसंख्या
(Population)
📌 अध्याय का परिचय: मानव संसाधन (Human Resource)
क्या आप बिना मानव (इंसान) के विश्व की कल्पना कर सकते हैं? प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और निर्माण मानव ही करता है। कोयला तब तक केवल एक चट्टान का टुकड़ा था, जब तक मानव ने उसे प्राप्त करने की तकनीक का आविष्कार करके उसे एक ‘संसाधन’ (Resource) नहीं बना दिया। प्राकृतिक घटनाएँ (जैसे बाढ़ या सुनामी) ‘आपदा’ (Disaster) तभी बनती हैं जब वे घनी आबादी वाले इलाकों को प्रभावित करती हैं। इसलिए, सामाजिक अध्ययन में ‘जनसंख्या’ (Population) एक आधारीय तत्त्व (Pivotal element) है। यह एक ऐसा संदर्भ बिंदु है जिससे बाकी सभी चीज़ों का अर्थ और महत्त्व तय होता है। संसाधन, आपदा और विनाश—इन सब का अर्थ केवल मानव आबादी के संदर्भ में ही महत्वपूर्ण है।
📊 जनगणना (Census) क्या है?
एक निश्चित समयांतराल (Interval) में जनसंख्या की आधिकारिक गणना (Official enumeration) को जनगणना (Census) कहते हैं। यह देश की जनसांख्यिकी, आर्थिक और सामाजिक डेटा का सबसे बड़ा स्रोत है।
- भारत में सबसे पहली (आंशिक) जनगणना 1872 ई. में हुई थी।
- भारत में पहली संपूर्ण और व्यवस्थित जनगणना 1881 ई. में संपन्न हुई। उसी समय से हर 10 साल के अंतराल पर नियमित रूप से जनगणना होती आ रही है।
- (नोट: 2011 की जनगणना भारत की 15वीं राष्ट्रीय जनगणना थी। इस अध्याय के सभी आँकड़े उसी पर आधारित हैं।)
1. जनसंख्या का आकार एवं वितरण (Population Size and Distribution)
(क) भारत की जनसंख्या का आकार:
- मार्च 2011 तक भारत की कुल जनसंख्या 121.06 करोड़ (1,210.6 मिलियन) थी।
- यह दुनिया की कुल जनसंख्या का 17.5 प्रतिशत (17.5%) है। यह विशाल आबादी विश्व के केवल 2.4% भूभाग (32.8 लाख वर्ग किमी) पर रहती है।
- तुलनात्मक तथ्य: भारत की यह जनसंख्या अमेरिका, इंडोनेशिया, ब्राज़ील, पाकिस्तान, बांग्लादेश और जापान की कुल संयुक्त जनसंख्या से भी अधिक है।
(ख) राज्यों के अनुसार वितरण (State-wise Distribution):
भारत में जनसंख्या का वितरण अत्यंत असमान है, जो मुख्य रूप से वहाँ की भौगोलिक और आर्थिक स्थितियों पर निर्भर करता है:
- सबसे अधिक आबादी वाला राज्य: उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh)। 2011 में यहाँ की आबादी 19.9 करोड़ थी, जो देश की कुल आबादी का 16% है।
- सबसे कम आबादी वाले क्षेत्र: सिक्किम (Sikkim) की आबादी केवल 6 लाख है, और केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप (Lakshadweep) में केवल 64,429 हज़ार लोग रहते हैं।
- भारत की लगभग आधी (50%) आबादी केवल 5 राज्यों में निवास करती है: 1. उत्तर प्रदेश, 2. महाराष्ट्र, 3. बिहार, 4. पश्चिम बंगाल और 5. आंध्र प्रदेश। (क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य राजस्थान है, लेकिन शुष्क मरुस्थल होने के कारण वहाँ देश की केवल 5.5% आबादी रहती है)।
(ग) घनत्व के आधार पर जनसंख्या वितरण (Population Density):
जनसंख्या घनत्व का अर्थ है: “प्रति इकाई क्षेत्रफल (1 वर्ग किलोमीटर) में रहने वाले लोगों की संख्या।” यह असमान वितरण को समझने का सबसे अच्छा तरीका है।
- 2011 में भारत का औसत जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था।
- सर्वाधिक घनत्व: बिहार (1,102 व्यक्ति/वर्ग किमी) और पश्चिम बंगाल (1,028 व्यक्ति/वर्ग किमी)।
कारण: समतल उपजाऊ मैदान, प्रचुर वर्षा और खेती के लिए अनुकूल जलवायु। - न्यूनतम घनत्व: अरुणाचल प्रदेश (केवल 17 व्यक्ति/वर्ग किमी)।
कारण: ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी क्षेत्र, घने जंगल और प्रतिकूल जलवायु। - असम और प्रायद्वीपीय राज्यों का घनत्व ‘मध्यम’ है। पहाड़ी, कटे-फटे और चट्टानी भूभाग, मध्यम से कम वर्षा और कम उपजाऊ (छिछली) मिट्टी इन राज्यों के जनसंख्या घनत्व को मध्यम बनाए रखती है।
2. जनसंख्या वृद्धि एवं जनसंख्या परिवर्तन (Population Growth & Change)
जनसंख्या एक परिवर्तनशील (Dynamic) प्रक्रिया है। आबादी की संख्या, वितरण और संगठन में लगातार बदलाव होता रहता है। यह बदलाव तीन मुख्य प्रक्रियाओं के आपसी प्रभाव का परिणाम है: जन्म, मृत्यु और प्रवास।
(क) जनसंख्या वृद्धि (Population Growth):
जनसंख्या वृद्धि का अर्थ है किसी विशेष समय अंतराल (जैसे 10 वर्षों के भीतर) में किसी देश या राज्य के निवासियों की संख्या में परिवर्तन (बढ़ोतरी)। इसे दो तरीकों से मापा जाता है:
- निरपेक्ष वृद्धि (Absolute Increase): वर्तमान जनसंख्या (जैसे 2011) में से पिछली जनसंख्या (जैसे 2001) को घटाने पर जो अतिरिक्त संख्या प्राप्त होती है, उसे निरपेक्ष वृद्धि कहते हैं।
- वार्षिक वृद्धि दर (Annual Growth Rate): इसे प्रतिशत (Percentage) में मापा जाता है। जैसे 2% प्रति वर्ष वृद्धि का अर्थ है कि हर 100 व्यक्तियों पर एक साल में 2 नए व्यक्ति जुड़ गए।
📈 भारत में वृद्धि की प्रवृत्तियां (Trends of Growth)
1951 से 1981 तक भारत की जनसंख्या बहुत तेज़ गति से बढ़ी (वार्षिक वृद्धि दर 2.2% तक पहुँच गई थी)। लेकिन 1981 के बाद से वृद्धि दर (Growth Rate) में धीरे-धीरे गिरावट आने लगी, जिसका मुख्य कारण परिवार नियोजन के प्रति बढ़ती जागरूकता थी।
महत्त्वपूर्ण तथ्य: हालाँकि ‘वृद्धि दर’ घट रही है, लेकिन चूँकि हमारी ‘मूल जनसंख्या’ (Base population) बहुत विशाल है, इसलिए हर साल जुड़ने वाले लोगों की ‘निरपेक्ष संख्या’ (Absolute numbers) आज भी बहुत अधिक है। (जब एक बहुत बड़ी आबादी में कम दर से भी वृद्धि होती है, तो कुल आंकड़ा बहुत बड़ा होता है)।
(ख) जनसंख्या परिवर्तन की प्रक्रियाएँ (Processes of Population Change):
जनसंख्या में बदलाव 3 मुख्य कारकों से आता है:
- जन्म दर (Birth Rate): एक वर्ष में प्रति 1000 व्यक्तियों पर जन्म लेने वाले जीवित बच्चों की संख्या। भारत में जन्म दर हमेशा मृत्यु दर से अधिक रही है, यही जनसंख्या के लगातार बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है।
- मृत्यु दर (Death Rate): एक वर्ष में प्रति 1000 व्यक्तियों पर मरने वाले व्यक्तियों की संख्या। भारत में 1980 के दशक तक मृत्यु दर में तेज़ी से गिरावट आई है (बेहतर स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाओं के कारण), जिससे जन्म और मृत्यु दर के बीच का अंतर बढ़ गया और जनसंख्या तेज़ी से बढ़ी।
- प्रवास (Migration): लोगों का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में चले जाना प्रवास कहलाता है।
- आंतरिक प्रवास (Internal Migration): देश के भीतर (एक राज्य से दूसरे राज्य या गाँव से शहर)। यह देश की कुल जनसंख्या के आकार को नहीं बदलता, लेकिन वितरण (Distribution) को बदल देता है।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रवास (International Migration): एक देश से दूसरे देश में जाना।
- शहरीकरण (Urbanization): भारत में ज़्यादातर प्रवास ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों (Rural to Urban) की ओर होता है। इसका मुख्य कारण गाँवों में गरीबी और बेरोज़गारी जैसी प्रतिकूल स्थितियाँ (अपकर्ष / Push factors) तथा शहरों में रोज़गार, अच्छी शिक्षा और बेहतर जीवन स्तर का आकर्षण (अभिकर्ष / Pull factors) है।
- (आँकड़े: 1951 में शहरी आबादी केवल 17.29% थी, जो 2011 में बढ़कर 31.80% हो गई। एक दशक (2001-2011) के भीतर ही 10 लाख से अधिक आबादी वाले नगरों, जिन्हें ‘दस लाखी नगर’ कहा जाता है, की संख्या 35 से बढ़कर 53 हो गई है।)
3. जनसंख्या के गुण या विशेषताएँ (Characteristics of Population)
(1) आयु संरचना (Age Composition):
किसी देश की जनसंख्या को सामान्यतः 3 आयु वर्गों में बाँटा जाता है। इससे हमें ‘आश्रित अनुपात’ (Dependency Ratio) का पता चलता है:
- बच्चे (Children / 0-14 वर्ष): ये आर्थिक रूप से उत्पादक (Productive) नहीं होते। इन्हें भोजन, कपड़े, शिक्षा और चिकित्सा की आवश्यकता होती है। यह ‘आश्रित’ (Dependent) जनसंख्या है। (भारत में यह 34.4% है)।
- वयस्क / कार्यशील आयु (Working Age / 15-59 वर्ष): ये आर्थिक रूप से उत्पादक और जैविक रूप से प्रजननशील (Reproductive) होते हैं। यही देश का वास्तविक कार्यशील वर्ग है। यह वर्ग देश के कर (Tax) और अर्थव्यवस्था को चलाता है। (भारत में यह 58.7% है, जिसे ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ / Demographic Dividend कहा जाता है)।
- वृद्ध (Aged / 60 वर्ष से अधिक): ये रिटायर हो चुके होते हैं। ये स्वैच्छिक रूप से काम कर सकते हैं पर भर्ती प्रक्रिया के ज़रिए रोज़गार में नहीं होते। इन्हें भी ‘आश्रित’ (Dependent) माना जाता है, विशेषकर चिकित्सा खर्च के कारण। (भारत में यह 6.9% है)।
(2) लिंग अनुपात (Sex Ratio):
लिंग अनुपात का अर्थ है: प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या। यह समाज में पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता (Gender Equality) का सबसे बड़ा सूचक है।
- 2011 में भारत का औसत लिंग अनुपात 943 महिलाएँ प्रति 1000 पुरुष था। (जो कि महिलाओं के लिए पूर्णतः प्रतिकूल है)।
- सर्वाधिक: केरल (1084 महिलाएँ प्रति 1000 पुरुष) और पुडुचेरी (1038)। यहाँ महिलाएँ पुरुषों से ज़्यादा हैं, जो उच्च साक्षरता और महिला सशक्तिकरण को दर्शाता है।
- न्यूनतम: दिल्ली (866) और हरियाणा (879)। यहाँ का लिंग अनुपात बहुत चिंताजनक है, जो कन्या भ्रूण हत्या (Female foeticide) और समाज की गहरी पितृसत्तात्मक (Patriarchal) सोच को दर्शाता है।
(3) साक्षरता दर (Literacy Rate):
किसी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए एक साक्षर (पढ़ा-लिखा) नागरिक होना सबसे ज़रूरी है। केवल एक शिक्षित नागरिक ही बुद्धिमानी से निर्णय ले सकता है, नए अनुसंधान कर सकता है और विकास कर सकता है।
साक्षर की परिभाषा (2011 के अनुसार): 7 वर्ष या उससे अधिक आयु का व्यक्ति जो किसी भी भाषा को समझकर पढ़ और लिख सकता है, उसे साक्षर माना जाता है।
- 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल साक्षरता दर 73% है।
- पुरुष साक्षरता: 80.9%
- महिला साक्षरता: 64.6% (महिलाओं की साक्षरता दर आज भी पुरुषों से काफी कम है क्योंकि समाज में लड़कियों की शिक्षा पर कम ध्यान दिया जाता है, हालाँकि यह अंतर अब कम हो रहा है)।
(4) व्यावसायिक संरचना (Occupational Structure):
कार्यशील जनसंख्या (15-59 वर्ष) विभिन्न व्यवसायों में लगी होती है। इन व्यवसायों को 3 मुख्य आर्थिक श्रेणियों में बाँटा जाता है:
- प्राथमिक क्षेत्र (Primary Sector): कृषि (Agriculture), पशुपालन, वानिकी (Forestry), मछली पालन, और खनन (Mining)। इसमें लोग सीधे प्रकृति से जुड़े होते हैं।
- द्वितीयक क्षेत्र (Secondary Sector): उद्योग (Manufacturing/Industries), भवन निर्माण (Construction) आदि। इसमें कच्चे माल को उपयोगी वस्तुओं में बदला जाता है।
- तृतीयक क्षेत्र (Tertiary Sector): सेवाएँ—जैसे व्यापार, परिवहन (Transport), संचार (Communication), बैंकिंग, प्रशासन और शिक्षा।
विकास का सूचक: विकसित देशों में ज़्यादातर लोग द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों में काम करते हैं। विकासशील देशों (जैसे भारत) में ज़्यादातर लोग प्राथमिक क्षेत्र (कृषि) पर निर्भर होते हैं। (भारत में आज भी लगभग 54.6% लोग कृषि और उससे जुड़े कार्यों में लगे हैं, हालाँकि शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण अब द्वितीयक (13%) और तृतीयक (32%) क्षेत्र में लोगों का प्रतिशत तेज़ी से बढ़ रहा है।)
(5) स्वास्थ्य (Health):
स्वास्थ्य जनसंख्या की संरचना का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण अंग है, जो विकास की प्रक्रिया को सीधे प्रभावित करता है। आज़ादी के बाद से भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public health), संक्रामक बीमारियों से बचाव और आधुनिक चिकित्सा में बहुत प्रगति हुई है।
- सुधार: मृत्यु दर (Death rate) 1951 के 25 प्रति 1000 से घटकर 2011 में 7.2 प्रति 1000 हो गई है। जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy / औसत आयु) 1951 के 36.7 वर्ष से बढ़कर 2012 में 67.9 वर्ष हो गई है।
- गंभीर चिंता का विषय: इन सुधारों के बावजूद, भारत में कुपोषण (Malnutrition) अभी भी बहुत बड़ी समस्या है। आबादी के एक बड़े हिस्से की प्रति व्यक्ति कैलोरी खपत अनुशंसित स्तर (Recommended level) से काफी कम है। इसके अलावा, भारत की ग्रामीण आबादी के केवल एक-तिहाई (1/3) हिस्से को ही पीने का साफ पानी (Safe drinking water) और बुनियादी स्वच्छता (Sanitation) सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
4. किशोर जनसंख्या (Adolescent Population)
भारत की जनसंख्या का सबसे महत्त्वपूर्ण और ऊर्जावान हिस्सा इसके किशोर (Adolescents) हैं। किशोर आमतौर पर 10 से 19 वर्ष की आयु वर्ग के लड़के-लड़कियों को कहा जाता है।
- यह भारत की कुल आबादी का लगभग पाँचवाँ (1/5) हिस्सा (लगभग 20%) है।
- यह देश का भविष्य का सबसे बड़ा मानव संसाधन है। इन्हें विकास के लिए उचित पोषण (Nutrition) की सामान्य बच्चों या वयस्कों से कहीं ज़्यादा ज़रूरत होती है।
- दुर्भाग्य से, भारत में किशोरों के नियमित आहार में पोषक तत्त्वों (Nutrients) की भारी कमी है। बड़ी संख्या में किशोर लड़कियाँ एनीमिया (रक्तहीनता / Anemia) से पीड़ित हैं। उनकी समस्याओं पर ध्यान देना, उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ देना देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए अनिवार्य है।
🛡️ राष्ट्रीय जनसंख्या नीति (National Population Policy – NPP 2000)
परिवारों के आकार को सीमित रखकर व्यक्तिगत स्वास्थ्य और कल्याण को सुधारने के उद्देश्य से भारत सरकार ने 1952 में ही ‘व्यापक परिवार नियोजन कार्यक्रम’ शुरू कर दिया था। वर्ष 2000 में सरकार ने एक नई और अधिक विस्तृत राष्ट्रीय जनसंख्या नीति (NPP 2000) की घोषणा की। इसके मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं:
- 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा (Free and Compulsory Education) प्रदान करना।
- शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality Rate) को प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 30 से कम करना।
- बच्चों को सभी तरह की रोकथाम योग्य बीमारियों के खिलाफ सार्वभौमिक टीकाकरण (Universal Immunization) का लक्ष्य प्राप्त करना।
- लड़कियों की शादी की उम्र को बढ़ाने (Delayed marriage) के लिए प्रोत्साहित करना।
- किशोरों पर विशेष ध्यान: NPP 2000 ने किशोरों की विशेष ज़रूरतों को पहचाना। इसके तहत अनचाहे गर्भ (Unwanted pregnancies) और यौन संचारित बीमारियों (Sexually Transmitted Diseases / STD) से बचाव, गर्भनिरोधक सेवाओं तक पहुँच, बाल विवाह रोकना, और बालिकाओं के पोषण (Nutrition) से संबंधित कार्यक्रमों पर विशेष ज़ोर दिया गया है।
🌟 निष्कर्ष (Conclusion)
एक देश की असली पहचान और उसकी ताकत उसके नागरिक (Citizens) होते हैं। एक स्वस्थ, शिक्षित, कुशल (Skilled) और जागरूक जनसंख्या ही देश को विकास के रास्ते पर आगे ले जा सकती है। यदि जनसंख्या अशिक्षित, बीमार और कुपोषित हो, तो वह देश की अर्थव्यवस्था पर एक बोझ बन जाती है, लेकिन यदि उसी जनसंख्या में शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल-प्रशिक्षण का निवेश (Investment) किया जाए, तो वही जनसंख्या सबसे कीमती ‘मानव पूंजी’ (Human Capital) में बदल जाती है जो राष्ट्र के निर्माण की सबसे बड़ी इकाई है।
