संघ और उसका राज्य क्षेत्र: भारतीय राज्यव्यवस्था का आधारभूत ढांचा

संघ और उसका राज्य क्षेत्र – यूपीएससी महा-गाइड

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संघ और उसका राज्य क्षेत्र: भारतीय राज्यव्यवस्था का आधारभूत ढांचा

By An Expert Educator Reading Time: 45 Mins Topic: GS Paper II

नमस्ते उम्मीदवारों! जब हम भारतीय संविधान को खोलते हैं, तो उसका पहला भाग, पहली पंक्ति ही हमारी राष्ट्रीय पहचान को परिभाषित करती है। “संघ और उसका राज्य क्षेत्र” (भाग-1, अनुच्छेद 1-4) केवल भूगोल की बात नहीं करता, बल्कि यह सदियों के संघर्ष, एकता के संकल्प और एक आधुनिक राष्ट्र के निर्माण की गाथा है।

एक UPSC अभ्यर्थी के रूप में, आपको इस टॉपिक को केवल ‘रटना’ नहीं है, बल्कि यह समझना है कि क्यों दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने अपनी सीमाओं को इतना लचीला रखा कि आज भी संसद एक साधारण बहुमत से देश का नक्शा बदल सकती है। आइए, इस महा-विश्लेषण की यात्रा शुरू करते हैं।

इस लेख में हम क्या पढ़ेंगे:
  • अनुच्छेद 1-4 का दार्शनिक और कानूनी विश्लेषण।
  • भारतीय संघ बनाम अमेरिकी संघ: एक तुलना।
  • रियासतों का एकीकरण और सरदार पटेल की भूमिका।
  • भाषाई राज्यों का उदय और विभिन्न आयोग (धर, JVP, फजल अली)।
  • राज्यों के गठन का कालक्रम (1956 से 2024 तक)।
  • बेरुबारी यूनियन से 100वें संशोधन तक: सीमा विवाद और समाधान।
  • मुख्य परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न और उत्तर लेखन की रणनीति।

1. अनुच्छेद 1: नाम और संघ का स्वरूप

संविधान का अनुच्छेद 1 कहता है – “भारत, जो कि इंडिया है, राज्यों का संघ होगा।”

यहाँ ‘इंडिया’ और ‘भारत’ दोनों शब्दों का प्रयोग संविधान सभा के बीच हुए मतभेद का समाधान था। कुछ सदस्य पारंपरिक नाम चाहते थे, कुछ आधुनिक। लेकिन यूपीएससी के नजरिए से सबसे महत्वपूर्ण शब्द है “Union of States” (राज्यों का संघ)

डॉ. अंबेडकर का तर्क:

अंबेडकर ने ‘फेडरेशन’ के बजाय ‘यूनियन’ शब्द को प्राथमिकता दी क्योंकि:

  • भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी ‘समझौते’ का परिणाम नहीं है (जैसा कि अमेरिका में है)।
  • राज्यों को संघ से अलग होने (Secede) का कोई अधिकार नहीं है।

अतः, भारत एक अखंड भौगोलिक इकाई है, जिसे प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्यों में विभाजित किया गया है।

UPSC Concept Clarification: ‘भारत का संघ’ (Union of India) और ‘भारत का राज्य क्षेत्र’ (Territory of India) में अंतर है। ‘यूनियन’ में केवल राज्य आते हैं, जबकि ‘टेरिटरी’ में राज्य, केंद्र शासित प्रदेश और वे क्षेत्र भी आते हैं जिन्हें भविष्य में भारत अधिग्रहित कर सकता है।

2. अनुच्छेद 2 और 3: संसद की जादुई शक्तियाँ

अनुच्छेद 2 संसद को शक्ति देता है कि वह ऐसे क्षेत्रों को संघ में शामिल करे जो अभी भारत का हिस्सा नहीं हैं। उदाहरण के लिए, 1975 में सिक्किम का भारत में विलय।

वहीं अनुच्छेद 3 संसद को ‘घरेलू’ मामलों में असीमित अधिकार देता है। संसद किसी भी राज्य की सीमाओं को बढ़ा सकती है, घटा सकती है, नाम बदल सकती है या दो राज्यों को काटकर नया राज्य बना सकती है।

प्रक्रिया (Procedure):

  1. ऐसा कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना संसद में पेश नहीं किया जा सकता।
  2. विधेयक पेश करने से पहले राष्ट्रपति संबंधित राज्य विधानमंडल को उनके विचार जानने के लिए भेजते हैं।
  3. महत्वपूर्ण: राज्य विधानमंडल के विचार संसद पर बाध्यकारी (Binding) नहीं हैं। संसद उन्हें स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
Main Exam Point: भारत को ‘विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ’ (Indestructible Union of Destructible States) क्यों कहा जाता है? इसका उत्तर अनुच्छेद 3 में छिपा है। केंद्र सरकार किसी राज्य का अस्तित्व मिटा सकती है, लेकिन राज्य संघ का अस्तित्व नहीं मिटा सकते।

3. रियासतों का एकीकरण: एक महान गाथा

15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ, तो हमारे सामने 552 रियासतें थीं। माउंटबेटन योजना ने उन्हें विकल्प दिया – भारत में मिलें, पाकिस्तान में मिलें या स्वतंत्र रहें।

549 रियासतें स्वेच्छा से भारत में मिल गईं, लेकिन तीन ने ‘सिरदर्द’ पैदा किया:

  • हैदराबाद: ‘ऑपरेशन पोलो’ (पुलिस कार्रवाई) द्वारा।
  • जूनागढ़: जनमत संग्रह (Referendum) द्वारा।
  • जम्मू और कश्मीर: विलय पत्र (Instrument of Accession) द्वारा।

सरदार पटेल और वी.पी. मेनन की कूटनीति ने भारत को ‘बाल्कनीकरण’ (टुकड़ों में बँटने) से बचा लिया।

4. भाषाई राज्यों की मांग और विभिन्न आयोग

आजादी के तुरंत बाद दक्षिण भारत से भाषाई आधार पर राज्यों की मांग उठने लगी। सरकार इसके पक्ष में नहीं थी क्योंकि उसे डर था कि इससे राष्ट्रीय एकता कमजोर होगी।

1. धर आयोग (1948):

एस.के. धर की अध्यक्षता में इस आयोग ने स्पष्ट रूप से भाषाई आधार को नकार दिया और प्रशासनिक सुविधा को आधार बनाने की सलाह दी।

2. JVP समिति (1948):

जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया। इन्होंने भी भाषाई आधार को फिलहाल टालने की बात कही।

3. पोट्टी श्रीरामुलु का बलिदान और आंध्र का उदय:

1953 में 56 दिनों की भूख हड़ताल के बाद गांधीवादी नेता पोट्टी श्रीरामुलु का निधन हो गया। भारी जनाक्रोश के कारण सरकार को भाषाई आधार पर पहला राज्य आंध्र प्रदेश बनाना पड़ा।

4. फजल अली आयोग (1953-55):

इस आयोग ने ‘एक भाषा-एक राज्य’ के सिद्धांत को तो खारिज किया, लेकिन राज्यों के पुनर्गठन में भाषा को एक मुख्य आधार के रूप में स्वीकार कर लिया। इसकी सिफारिशों पर राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 पारित हुआ, जिसके तहत 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए।

5. 1956 के बाद नए राज्यों का गठन (एक नजर में)

वर्ष नया राज्य/क्षेत्र विवरण
1960 महाराष्ट्र और गुजरात बॉम्बे राज्य का विभाजन
1963 नागालैंड असम से अलग हुआ
1966 हरियाणा और हिमाचल (UT) पंजाब का पुनर्गठन
1971 हिमाचल प्रदेश पूर्ण राज्य बना
1975 सिक्किम 36वां संशोधन, पूर्ण राज्य
2000 छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड क्रमशः MP, UP और बिहार से अलग
2014 तेलंगाना आंध्र प्रदेश से अलग
2019 जम्मू-कश्मीर और लद्दाख राज्य से केंद्र शासित प्रदेश (UT) में परिवर्तन

6. न्यायिक हस्तक्षेप और सीमा विवाद

क्या संसद भारत का कोई हिस्सा किसी दूसरे देश को दे सकती है? यह प्रश्न बेरुबारी यूनियन केस (1960) में उठा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को क्षेत्र ‘देने’ की शक्ति नहीं है। इसके लिए अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन करना होगा।

यही कारण था कि 2015 में भारत और बांग्लादेश के बीच क्षेत्रों का आदान-प्रदान करने के लिए 100वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया।

UPSC Mains: विश्लेषण का कोना

“क्या छोटे राज्य बड़े राज्यों की तुलना में बेहतर शासन सुनिश्चित करते हैं?”

यह एक ऐसा प्रश्न है जो अक्सर मुख्य परीक्षा में पूछा जाता है। उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के अनुभव बताते हैं कि छोटे राज्यों में प्रशासन जनता के करीब पहुँचता है, लेकिन साथ ही वे वित्तीय आत्मनिर्भरता के लिए संघर्ष करते हैं।

निष्कर्ष के लिए बिंदु:

  • राज्यों का गठन केवल राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक व्यवहार्यता (Economic Viability) के आधार पर होना चाहिए।
  • सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देना अनिवार्य है।
  • क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन बनाना ही भाग-1 का असली उद्देश्य है।

तो दोस्तों, यह था भारतीय संविधान के भाग-1 का एक संपूर्ण विश्लेषण। याद रखिए, राजनीति शास्त्र केवल नियमों को रटना नहीं है, बल्कि उस समाज को समझना है जिसे ये नियम चलाते हैं। आपकी मेहनत और आपका संकल्प ही आपको लबासना (LBSNAA) की सीढ़ियों तक ले जाएगा।

पढ़ते रहें, बढ़ते रहें!

“मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है।”

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Manikant kumar Yadav
Manikant kumar Yadav

नमस्कार! मैं हूँ SelfShiksha का संस्थापक, और मेरा मकसद है शिक्षा को आसान बनाना। इस वेबसाइट के माध्यम से मैं छात्रों को बोर्ड परीक्षा, प्रतियोगी परीक्षा और करियर से जुड़ी सटीक जानकारी प्रदान करता हूँ, ताकि हर छात्र अपनी मंज़िल पा सके।

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